श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2250, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 7/162-168 सातवाँ अध्याय 233 और उपलक्षणोंको समस्त भक्तोंके निकट प्रकाशित किया ॥ 162 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'लोके करिला क्षेपण',— समस्त भक्तोंके निकट महाप्रभुने विस्तार किया ॥ 162 ॥ सातवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अभिमान-पङ्क धुञा भट्टेरे शोधिला। सेइद्वारा आर सब लोके शिखाइला ॥ 163 ॥ अनुवाद—इसी लीलाके द्वारा महाप्रभुने श्रीवल्लभ भट्टके अभिमानरूपी कीचड़को धोकर उन्हें शुद्ध किया। उन्हींके माध्यमसे अन्य सभी लोगोंको शिक्षा प्रदान की ॥ 163 ॥ बाह्यद्रष्टा बाहरी अर्थको माननेवालेका ही अधःपतन :— अन्तरे 'अनुग्रह', बाह्ये 'उपेक्षार प्राय'। बाह्यार्थ येइ लय, सेइ नाश याय ॥ 164 ॥ अनुवाद—वास्तवमें महाप्रभुके हृदयमें तो श्रीवल्लभ भट्ट और श्रीगदाधर पण्डितके प्रति कृपा थी, किन्तु उन्होंने बाहरमें उनके प्रति कुछ उपेक्षा जैसा भाव प्रदर्शित किया। जो केवल महाप्रभुके बाहरी आचरणको ही ग्रहण करता है, वास्तविक तथ्यमें प्रवेश नहीं कर पानेके कारण वह अपराध करके पतित हो जाता है॥ 164 ॥ अनुभाष्य—श्रीवल्लभ भट्टके मङ्गलाकाङ्क्षी होकर परमदयालु पतितपावन महाप्रभुने बाहरी रूपसे उनकी उपेक्षा करके उनके पण्डित-वैष्णव-अभिमानका शोधन किया; गदाधर पण्डितके द्वारा श्रीवल्लभका सम्पूर्ण रूपसे त्याग नहीं करनेपर महाप्रभुने कुछ दिनोंके लिये गदाधरके प्रति भी उपेक्षा प्रदर्शित की; वास्तविकरूपमें महाप्रभु कभी भी अपने स्वरूप-शक्ति-विग्रह श्रील गदाधरके प्रति अप्रसन्न-चित्त नहीं हुए, हो भी नहीं सकते। जो इस लीलाके निगूढ़ भावको समझनेमें असमर्थ होंगे, वे बाहरी बातोंको लेकर व्यस्त रहनेके कारण, वास्तविक अर्थको नहीं समझकर श्रीगदाधरके श्रीचरणोंमें श्रद्धाहीन होकर नरकगामी होंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ 164 ॥ सातवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रीचैतन्यके प्रति अचला भक्ति ही चैतन्यलीला-तत्त्वको जाननेका कारण :— निगूढ़ चैतन्यलीला बुझिते कां'र शक्ति? सेइ बुझे, गौरचन्द्रे याँर दृढ़ भक्ति ॥ 165 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी निगूढ़ लीलाको समझनेकी शक्ति किसमें है? इन लीलाओंको तो केवल वही समझ सकता है जिसकी श्रीगौरचन्द्रके प्रति दृढ़ भक्ति है ॥ 165 ॥ श्रीगदाधरके द्वारा सपरिकर महाप्रभुको भिक्षा-प्रदान :— दिनान्तरे पण्डित कैल प्रभुर निमन्त्रण। प्रभु ताँहा भिक्षा कैल लञा भक्तगण ॥ 166 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितने भी अन्य एक दिन महाप्रभुको निमन्त्रण किया। महाप्रभुने अपने भक्तों सहित श्रीगदाधर पण्डितके वासस्थानपर प्रसाद ग्रहण किया ॥ 166 ॥ वहींपर श्रीगदाधरसे श्रीवल्लभके द्वारा मधुररसमें किशोर-गोपाल-मन्त्रमें दीक्षा-प्राप्ति :— ताँहाइ वल्लभ-भट्ट प्रभुर आज्ञा लैल। पण्डित-ठाञि पूर्व-प्रार्थित सब सिद्धि हैल ॥ 167 ॥ अनुवाद—वहीं श्रीवल्लभ भट्टने महाप्रभुसे आज्ञा ली और उनकी श्रीगदाधर पण्डितसे दीक्षा ग्रहण करनेकी पूर्व प्रार्थना सफल हुई ॥ 167 ॥ श्रीगदाधर-श्रीवल्लभके मिलनसे गौर-प्रीतिकी प्राप्ति :— एइ त' कहिलुँ वल्लभ-भट्टेरे मिलन। याहार श्रवणे पाय गौरप्रेमधन ॥ 168 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने महाप्रभुका श्रीवल्लभ