भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2249

232 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/153-162 ] अनुवाद-श्रीगदाधर पण्डितने कहा, - "महाप्रभु तो सर्वज्ञ शिरोमणि हैं। मैं उनके साथ किसी भी प्रकारके हठ करनेको अच्छा नहीं समझता। वे जो कुछ भी कहते हैं, मैं उसे नतमस्तक होकर सहन करता हूँ। वे स्वयं मेरे गुणों और दोषोंका विचार करके मुझपर कृपा करेंगे॥" 153-154॥ श्रीपण्डितका महाप्रभुके निकट आगमन और क्रन्दन :- एत बलि' पण्डित प्रभुर स्थाने आइला। रोदन करिया प्रभुर चरणे पड़िला ॥ 155 ॥ अनुवाद-यह कहकर श्रीगदाधर पण्डित महाप्रभुके स्थानपर पहुँचे और वे रोते हुए महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े॥ 155॥ श्रीपण्डितके प्रेमके वशीभूत महाप्रभुके द्वारा स्नेह-प्रेमपूर्वक श्रीगदाधरका आलिङ्गन और आश्वासन :- ईषत् हासिया प्रभु कैला आलिङ्गन। सबारे शुनाञा कहेन मधुर वचन ॥ 156 ॥ स्वयं महाप्रभुके द्वारा श्रीगदाधरके अतुलनीय स्निग्ध सुदृढ़ गौरप्रेमका वर्णन :- “आमि चालाइलुँ तोमा, तुमि ना चलिला। क्रोधे किछु ना कहिला, सकल सहिला ॥ 157 ॥ आमार भङ्गीते तोमार मन ना चलिला। सुदृढ़ सरलभावे आमारे किनिला ॥ " 158 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए श्रीगदाधर पण्डितका आलिङ्गन किया और सभीको सुनाते हुए उन्होंने मधुर वचन कहे, - "हे गदाधर ! मैं तुम्हें रोषपूर्ण व्यवहारके द्वारा उत्तेजित करना चाहता था, किन्तु तुम उत्तेजित नहीं हुए। तुमने क्रोधमें कुछ भी नहीं कहा, अपितु सब कुछ सहन कर लिया। मेरी इस चालके द्वारा भी तुम्हारा मन विचलित नहीं हुआ और तुम अपने इसी सरल भावमें सुदृढ़ रहे। इसी भावसे तुमने मुझे खरीद लिया है॥ " 156-158॥ अनुभाष्य- 'चालाइलुँ', - रोषपूर्ण व्यवहार प्रदर्शित किया ॥ 157 ॥ महाप्रभुका “गदाधर-प्राणनाथ"-नाम :- पण्डितेर भाव-मुद्रा कहन ना याय। 'गदाधर-प्राणनाथ' नाम हैल याय ॥ 159 ॥ अनुवाद-श्रीगदाधर पण्डितके भाव और उनके उपलक्षणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता। इसलिये महाप्रभुका अन्य नाम 'गदाधर-प्राणनाथ' है॥ 159 ॥ भक्तोंके द्वारा नित्य 'गदाइ-गौराङ्ग' नामका गान :- पण्डिते प्रभुर प्रसाद कहन ना याय। 'गदाइ-गौराङ्ग' बलि' याँरे लोके गाय ॥ 160 ॥ अनुवाद-श्रीगदाधर पण्डितके प्रति महाप्रभुकी कृपाका वर्णन नहीं किया जा सकता। लोग महाप्रभुको 'गदाइ-गौराङ्ग' अर्थात् 'गदाधरके गौराङ्ग' कहकर पुकारते हैं॥ 160 ॥ अचिन्त्य चैतन्यलीलासिन्धुकी प्रत्येक-तरङ्गमें अनेक उद्देश्योंका सम्पादन :- चैतन्यप्रभुर लीला के बुझिते पारे? एकलीलाय बहे गङ्गार शत शत धारे ॥ 161 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंको कौन समझ सकता है? उनकी एक-एक लीलामें गङ्गाकी भाँति सैकड़ों-सैकड़ों धाराएँ बहती हैं ॥ 161 ॥ महाप्रभुके द्वारा-(1) श्रीपण्डितके गौरप्रेमका प्रचार, (2) श्रीवल्लभका गर्वनाश और उद्धार, (3) अक्षजज्ञानी जीवकी बाहरीरूपसे उपेक्षा ही उसके प्रति अधोक्षज-कृपा एवं (4) वैसे दुःखरूपी दण्डको भगवान्की कृपा माननेमें ही जीवके नित्यमङ्गल और बुद्धिमत्ताका प्रचार :- पण्डितेर सौजन्य, ब्रह्मण्यता-गुण। दृढ़ प्रेममुद्रा लोके करिला क्षेपण ॥ 162 ॥ अनुवाद-उपरोक्त लीलाके माध्यमसे महाप्रभुने श्रीगदाधर पण्डितकी सज्जनता, उनके ब्राह्मणोचित गुणों, दृढ़ प्रेम