भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2288, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2288

दसवाँ अध्याय कथासार—रथयात्राके उद्देश्यसे गौड़ीय भक्तोंने पुरुषोत्तमकी यात्रा की। राघव-पण्डित अपनी बहन दमयन्तीके द्वारा दिये गये झोलोंमें बहुत प्रकारकी खाद्य सामग्रीको लेकर चल दिये। पाणिहाटी-निवासी मकरध्वज-कर भी राघवकी झालिके 'मुन्सिब' (परिचालक) बनकर चले। भक्तगण जिस दिन पुरुषोत्तममें पहुँचे, उस दिन नरेन्द्र सरोवरके जलमें क्रीड़ा करनेके लिये श्रीगोविन्ददेवजी नौकामें चढ़े थे। महाप्रभुने अपने भक्तोंके साथ जलक्रीड़ा की। पूर्व वर्षोंकी भाँति गुण्डिचा-मार्जनादि हुआ। श्रीमन्दिरमें जगमोहन-परिमूण्डा कीर्तन हुआ था। कीर्तन-विश्रामके बाद प्रसाद सेवा करके महाप्रभुके गम्भीराके द्वारपर शयन करनेपर श्रीगोविन्दने जिस किसी प्रकारसे निकट जाकर उनका चरण-चापन किया; बाहर नहीं आ पानेके कारण उनकी उस दिन प्रसाद-सेवा नहीं हुई। श्रीगोविन्दके इस चरित्रके द्वारा—'सेवाके लिये अपराध स्वीकार करना उचित है, किन्तु अपने भोगके लिये अपराधके आभास तकका भी परित्याग करना उचित है'—यह शुद्धवैष्णव-सिद्धान्त बतलाया गया है। गौड़ीय भक्तोंने महाप्रभुकी सेवा करनेके लिये जो-जो दिया था, श्रीगोविन्दने महाप्रभुको सब खिलाया। वैष्णवोंने घर-घरमें महाप्रभुको निमन्त्रण देकर खिलाया। श्रीशिवानन्दके पुत्र चैतन्यदासने निमन्त्रणमें स्नेहपूर्वक दही-भात बनाया था। —(अमृतप्रवाह भाष्य) भक्तोंके द्रव्योंसे सन्तुष्ट भक्तगणोंके द्वारा पूजित श्रीगौरकी वन्दना :— वन्दे श्रीकृष्णचैतन्यं भक्तानुग्रहकारकम्। येन केनापि सन्तुष्टं भक्तदत्तेन श्रद्धया॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्तके द्वारा श्रद्धापूर्वक प्रदत्त जो कोई भी [सामान्य] वस्तुसे सन्तुष्ट, भक्तोंपर कृपा करनेवाले श्रीकृष्णचैतन्यकी वन्दना करता हूँ॥1॥ अनुभाष्य— श्रद्धया भक्तदत्तेन (भक्तेन दत्तेन अर्पितेन) येन केन अपि (सामान्येन) सन्तुष्टं [तं] भक्तानुग्रहकारकं (भक्तेषु अनुग्रहविधायकं) श्रीकृष्णचैतन्यम् अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और समस्त श्रीगौरभक्तोंकी जय हो॥2॥ महाप्रभुके दर्शनोंके लिये गौड़ीय भक्तोंकी रथयात्राके उपलक्ष्यमें पुरी-यात्रा :— वर्षान्तरे सब भक्त प्रभुरे देखिते। परम-आनन्दे सबे नीलाचल याइते॥3॥ अनुवाद—अगले वर्ष समस्त भक्त महाप्रभुके दर्शनके लिये परमानन्दसे नीलाचलके लिये चल दिये॥3॥ अद्वैतप्रमुख गौड़ीय-भक्तगण :— अद्वैत-आचार्य-गोसाञि—सर्व-अग्रगण्य। आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, श्रीवास आदि धन्य॥4॥ अनुवाद—उन गौड़ीय भक्तोंमें श्रीअद्वैताचार्य प्रभु प्रमुख थे। उनके साथ परम धन्य आचार्यरत्न, आचार्यनिधि और श्रीवासादि भक्त थे॥4॥ अनुभाष्य—'आचार्यरत्न,'—चन्द्रशेखर; 'आचार्यनिधि,'— विद्यानिधि, प्रेमनिधि पुण्डरीक॥4॥