भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2289

272 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/5-13 ] श्रीगौरके द्वारा निषेध करनेपर भी महाप्रभुके प्रेमिक श्रीनित्यानन्दकी यात्रा :- यद्यपि प्रभुर आज्ञा गौड़े रहिते। तथापि नित्यानन्द प्रेमे चलिला देखिते ॥ 5 ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको गौड़ देशमें ही रहनेकी आज्ञा दी थी, तथापि महाप्रभुके प्रति अनुराग होनेके कारण श्रीनित्यानन्द प्रभु भी श्रीजगन्नाथ पुरीके लिये चल पड़े॥5॥ श्रीनित्यानन्दका श्रीगौर-आज्ञाके उल्लङ्घनका विचार-यह अनुरागका लक्षण :- अनुरागेर लक्षण एइ,-'विधि' नाहि माने। ताँर आज्ञा भाङ्गे ताँर सङ्गेर कारणे ॥ 6 ॥ अनुवाद-विधिको नहीं मानना-यह अनुरागका लक्षण होता है। श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुके सङ्गके लिये ही उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन किया॥6॥ इसका दृष्टान्त-रासमें गोपियोंके द्वारा श्रीकृष्णसेवा :- रासे यैछे घर याइते गोपीरे आज्ञा दिला। ताँर आज्ञा भाङ्गि' ताँर सङ्गे से रहिला ॥ 7 ॥ अनुवाद-रासके समय जैसे श्रीकृष्णके द्वारा गोपियोंको घर लौट जानेकी आज्ञा देनेपर भी गोपियाँ उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके उनके सङ्गमें ही रहीं॥7॥ अनुभाष्य-भाः 10/29/18-27 श्लोक देखें॥7॥ विधि और अनुराग मार्गमें श्रीविष्णु और श्रीकृष्णको सन्तुष्ट करनेमें विचित्रता :- आज्ञा-पालने कृष्णेर यैछे परितोष। प्रेमे आज्ञा भाङ्गिले हय कोटिसुख-पोष ॥ 8 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करनेसे उनको जैसी प्रसन्नता होती है, उससे करोड़ों गुणा सुखकी प्राप्ति उन्हें भक्तके द्वारा अनुरागके कारण उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेसे होती है॥8॥ अनुभाष्य- 'कोटिसुख-पोष', - करोड़ों गुणा सुखकी पुष्टि ॥8॥ पुरीयात्री गौड़ीय-भक्तगण :- वासुदेव-दत्त, मुरारि-गुप्त, गङ्गादास। श्रीमान् सेन, श्रीमान्-पण्डित, अकिञ्चन कृष्णदास ॥ 9 ॥ मुरारि, गरुड़-पण्डित, बुद्धिमन्त-खाँन। सञ्जय-पुरुषोत्तम, पण्डित-भगवान् ॥ 10 ॥ शुक्लाम्बर, नृसिंहानन्द आर यत जन। सबाइ चलिला, नाम ना याय लिखन ॥ 11 ॥ अनुवाद-श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीगङ्गादास, श्रीमान् सेन, श्रीमान् पण्डित, श्रीअकिञ्चन कृष्णदास, श्रीमुरारि पण्डित, श्रीगरुड़ पण्डित, श्रीबुद्धिमन्त खाँन, श्रीसञ्जय, श्रीपुरुषोत्तम, श्रीभगवान् पण्डित, श्रीशुक्लाम्बर, श्रीनृसिंहानन्द आदि अनेक भक्त जो नीलाचलके लिये चले, उन सबके नामोंको लिखना सम्भवपर नहीं है॥9-11॥ कुलीनग्राम, खण्ड और कुमारहट्ट (काञ्चनपल्ली) से भक्तोंकी यात्रा :- कुलीनग्रामी, खण्डवासी मिलिला आसिया। शिवानन्द-सेन आइला सबारे लञा ॥ 12 ॥ अनुवाद-कुलीनग्रामवासी और खण्डवासी भक्त भी उनसे मार्गमें आकर मिल गये। श्रीशिवानन्द सेन समस्त भक्तोंको लेकर श्रीजगन्नाथ पुरीके लिये चल दिये॥ 12 ॥ दमयन्तीके द्वारा बनाये महाप्रभुको प्रिय द्रव्योंसे पूर्ण झोलीके साथ श्रीराघवकी यात्रा :- राघव-पण्डित चले झालि साजाञा। दमयन्ती यत द्रव्य दियाछे करिया ॥ 13 ॥ अनुवाद-श्रीराघव पण्डित अपनी बहन श्रीदमयन्तीके द्वारा बनाकर दी गयी अनेक खाद्य वस्तुओंको भिन्न-भिन्न झोलोंमें भली-भाँति सजाकर रखकर ले आये॥ 13 ॥