भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2290, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2290

[ 10/13-20 दसवाँ अध्याय 273 अनुभाष्य-इसके द्वारा ग्रन्थकारके विचित्र कृष्णनैवेद्य (भोग) को प्रस्तुत करनेकी निपुणता प्रकाशित हो रही है; मध्यलीला 14/26-34 और 15/68-91, 207-218 संख्या देखें ॥ 13 ॥ श्रीराघवकी झोलीका विवरण :- नाना अपूर्व भक्ष्यद्रव्य प्रभुर योग्य भोग। वत्सरेक प्रभु याहा करेन उपयोग ॥ 14 ॥ अनुवाद-श्रीदमयन्ती महाप्रभुके भोगके योग्य अनेक अपूर्व खाद्य सामग्रियाँ बनातीं। महाप्रभु सम्पूर्ण वर्ष उन खाद्य सामग्रियोंको ग्रहण करते थे ॥ 14 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'उपयोग',—व्यवहार, ग्रहण ॥ 14 ॥ आम्र-काशन्दि, आदा-झाल-काशन्दि नाम। नेम्बू-आदा-आम्रकलि विविध सन्धान ॥ 15 ॥ आम्सि, आमखण्ड, तैलाम्र, आमसत्ता। यत्न करि' गुण्डा करि' पुराण सुख्ता ॥ 16 ॥ अनुवाद-उन खाद्य-सामग्रियोंमें कुछ अचार और चटनी-मसाले थे- 'आम्र-कासुन्दि', 'आदा-कासुन्दि' और 'झाल-कासुन्दि' आदि अचार जो क्रमशः आम, अदरक और मिर्चको सरसों और नमक आदिमें मिलाकर बनाये गये थे। उनके झोलेमें नींबू, अदरक और आमकी कली आदिसे बनी विभिन्न भोजन सामग्रियाँ थीं। उन भोजन-सामग्रियोंमें आमसि (सूखे हुए आमके टुकड़े), आम्रखण्ड (आमका खट्टा-मीठा आचार), तैलाम्र (तेलमें बना आमका आचार) और आमसत्ता (आम-पापड़) था। श्रीदमयन्तीने सावधानीपूर्वक पीसकर चूर्ण बनाकर पुराण सुख्ता भेजा ॥ 15-16 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पुराण सुख्ता', - सुखाया हुआ कड़वा पाटका साग ॥ 16 ॥ अनुभाष्य- 'तैलाम्र', - सरसोंके तेलमें रक्षित आमका आचार; 'गुण्डा'- पिसा हुआ चूर्ण ॥ 16 ॥ 'सुख्ता' बलि' अवज्ञा ना करिह चित्ते। सुख्ताय ये सुख हय, नहे पञ्चामृते ॥ 17 ॥ अप्राकृत भावग्राही भगवान् :- भावग्राही महाप्रभु स्नेहमात्र लय। सुख्तापाता-काशन्दिते महासुख हय ॥ 18 ॥ अनुवाद-सुख्ताको तुच्छ जानकर अपने चित्तमें श्रीदमयन्तीके प्रति किसी प्रकारका अनादरका भाव मत लाना। वास्तवमें सुख्ताको खानेसे जिस सुखकी प्राप्ति होती है, वह पञ्चामृत (दूध, चीनी, घी, शहद और दही) खानेसे भी प्राप्त नहीं होती। भावग्राही महाप्रभु भक्तके स्नेहमात्रको ही ग्रहण करते हैं, उन्हें भक्तके द्वारा स्नेहपूर्वक अर्पित किये गये सुख्ता-पत्ता और कासुन्दिको खानेमें महासुख होता है ॥ 17-18 ॥ अनुभाष्य- 'भाव', - अप्राकृत अहैतुकी-कृष्णेन्द्रिय- तोषण-परायण शुद्धसत्त्वमयी हृदयकी वृत्ति; प्राकृत सहजियाओंकी स्वसुखपरायण घृणित चित्तवृत्ति नहीं ॥ 18 ॥ श्रीदमयन्तीकी शुद्ध स्वारसिकी अतीव गाढ़ श्रीगौर-प्रीतिका उदाहरण :- 'मनुष्य'-बुद्धि दमयन्ती करे प्रभुर पाय। 'गुरु-भोजने उदरे कभु 'आम' हञा याय ॥ 19 ॥ सुख्ता पाइले सेइ आम हइबेक नाश।' सेइ स्नेह मने भावि' प्रभुर उल्लास ॥ 20 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके प्रति स्वाभाविक प्रीतिके कारण श्रीदमयन्ती उनके प्रति साधारण 'मनुष्य'-बुद्धि रखती थीं। वे मनमें विचार करती थीं- 'कभी यदि भारी भोजन करनेसे महाप्रभुके उदरमें आँव (बलगम) हो जायेगा तो वह सुख्ता चूर्ण खानेसे दूर हो जायेगा।' श्रीदमयन्तीके उस स्नेहका विचार करनेसे ही महाप्रभु उल्लसित हो उठते थे ॥ 19-20 ॥ अनुभाष्य- 'मनुष्य'- बुद्धि', - गौड़-व्रजवासियोंका शुद्ध सत्त्वमय ऐश्वर्यज्ञानहीन चित्तमें मनुष्य-शरीरधारी गौर-