भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2291, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2291

274 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/19–26 ] [बायाँ स्तम्भ] कृष्णको अपने शुद्ध केवल प्रेमके वशीभूत समझना; 'आम',—जठराग्निके मन्द होनेके कारण अजीर्णता-वशतः अम्लपित्त-व्याधि॥ 19 ॥ प्रेमसे अर्पित वस्तु ही महागुणोंसे युक्त, प्रेमसे प्रदानकी गयी वस्तुके बाहरी दोषों और गुणोंका विचार नहीं :— भारवी-कृत किरातार्जुनीय (8/20) में— प्रियेण संग्रथ्य विपक्ष-सन्निधा- वुपाहितां वक्षसि पीवरस्तने। स्रजं न काचिद्विजहौ जलाविलां वसन्ति हि प्रेम्णि गुणा न वस्तुनि ॥ 21 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—किसी प्रियव्यक्तिने अपने हाथोंसे मालाको गूँथकर विपक्षीकी (सौतनकी) उपस्थितिमें उन्नत स्तनवाली पत्नीको पहनायी तो उस स्त्रीने मालाके ऊपर लगे कीचड़को देखकर भी उसका परित्याग नहीं किया, क्योंकि गुण वस्तुमें नहीं रहते, प्रेममें रहते हैं॥ 21 ॥ अनुभाष्य— काचित् (कान्ता) प्रियेण (प्रेमपात्रेण वल्लभेन) संग्रथ्य (स्वयमेव रचयित्वा) विपक्षसन्निधौ (सपत्नीजनसमीपे) पीवरस्तने (समुन्नतपयोधरे) वक्षसि (उरसि) उपाहिताम् (अर्पितां योजितां) जलाविलां (कर्द्दमादियुक्तामपि) स्रजं (मालां) न विजहौ (न त्यक्तवती); हि (यस्मात्) गुणाः प्रेम्णि वसन्ति, न वस्तुनि [प्रेमर्पितमेव वस्तु गुणवत्, अन्यत् तु गुणवदपि गुणहीनं दोषयुक्तमेव, प्रेम तु वस्तुपरीक्षां नापेक्षते इति भावः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [प्रेमसे अर्पित वस्तु ही गुणवान् है, अन्यथा वस्तु गुणवान् होनेपर भी गुणहीन (दोषयुक्त) है, प्रेम वस्तुकी परीक्षाकी अपेक्षा नहीं करता—यह भाव है] ॥ 21 ॥ धनिया-मोहरीर तण्डुल गुण्डा करिया। नाडु बान्धियाछे चिनि-पाक करिया ॥ 22 ॥ शुण्ठीखण्ड, नाडु, आर आमपित्तहर। पृथक् पृथक् बान्धि' वस्त्रेर कुथली-भितर ॥ 23 ॥ [दायाँ स्तम्भ] अनुवाद—श्रीदमयन्तीने साबुत धनिया और सौंफका चूर्ण बनाकर चीनीकी चासनीसे उनके लड्डू बना दिये। उन्होंने आँव और पित्तका हरण करनेवाले सोंठके लड्डू भी बनाये और दोनों प्रकारके लड्डुओंको पृथक्-पृथक् छोटी-छोटी थैलियोंमें बाँधकर रख दिया ॥ 22–23 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कुथली',—छोटी-छोटी थैलियाँ ॥ 23 ॥ कोलिशुन्ठि, कोलिचूर्ण, कोलिखण्ड आर। कत नाम लइब, आर शतप्रकार 'आचार' ॥ 24 ॥ अनुवाद—उन्होंने सूखे बेर, बेरोंका चूर्ण, गुड़में पकाये बेर और सैंकड़ों प्रकारके आचार बनाये, मैं कितनोंका नाम गिनाऊँ॥ 24 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'कोलिशुन्ठि',—सूखे बेर ॥ 24 ॥ नारिकेल-खण्ड, आर नाडु गङ्गाजलि। चिरस्थायी खण्डविकार करिला सकलि ॥ 25 ॥ अनुवाद—उन्होंने नारियलके छोटे-छोटे टुकड़ोंकी मिठाई और ऐसे लड्डू बनाये जो देखनेमें गङ्गाके जलकी भाँति श्वेत थे। इस प्रकार उन्होंने ऐसे-ऐसे लड्डू बनाये, जो बहुत दिनों तक उपयोग किये जा सकते थे ॥ 25 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'नाडु गङ्गाजलि',—सफेद लड्डू ॥ 25 ॥ अनुभाष्य—'चिरस्थायी खण्डविकार',—कद्मा (कदम्ब पुष्पके आकार जैसी गोल और सख्त मिठाई), काटाफेणी, ओला, मठ, तिलमें खाजा, दम्दम्-मिश्री, रेशमी मिठाई आदि ॥ 25 ॥ चिरस्थायी क्षीरसार, मण्डादि-विकार। अमृत-कर्पूर आदि अनेकप्रकार ॥ 26 ॥ अनुवाद—उन्होंने बहुत दिनों तक नष्ट नहीं होनेवाले खोये और चावलकी माँड़ आदिके अनेक

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 2291, कुल 2549 में से · BharatKosha