श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 10/26–35 दसवाँ अध्याय 275 पकवान बनाये तथा अमृत-कर्पूर आदि अनेक प्रकारके पीठे भी बनाये ॥ 26 ॥ शालिकाचटि-धान्येर 'आतप' चिड़ा करि'। नूतन-वस्त्रेर बड़ कुथली सब भरि' ॥ 27 ॥ अनुवाद—उन्होंने सूक्ष्म शालिकाचटि धानका उबाले बिना सूर्यके तापसे चिड़वा बनाकर उसे नये वस्त्रसे बनी बड़ी झोलीमें भर दिया ॥ 27 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'शालिकाचटि धान्येर'—(एक प्रकारके) सूखे धानका ॥ 27 ॥ कतेक चिड़ा हुडुम् करि' घृतेते भाजिया। चिनि-पाके नाडु कैला कर्पूरादि दिया ॥ 28 ॥ अनुवाद—उन्होंने कुछ चिड़वा और मुड़िको घीमें भूनकर तथा उसमें कर्पूर आदि मिलाकर चीनीकी चासनीमें पकाकर लड्डू बनाये ॥ 28 ॥ अनुभाष्य—'हुडुम',—(पूर्वबङ्गालमें प्रसिद्ध) मुड़ि, (पश्चिम बङ्गालमें 'हुडुम-चावल'-नामसे एक प्रकारका पृथक् चावल मिलता है) ॥ 28 ॥ शालि-धान्येर तण्डुल-भाजा चूर्ण करिया। घृतसिक्त चूर्ण कैला चिनि-पाक दिया ॥ 29 ॥ कर्पूर, मरिच, लवङ्ग, एलाचि, रसवास। चूर्ण दिया नाडु कैला परम सुवास ॥ 30 ॥ अनुवाद—उन्होंने शालि-धानके चावलको भूनकर उसका चूर्ण बनाया और पुनः उसे घीमें मिलाकर चीनीकी चासनीमें पकाया, फिर उसमें कर्पूर, काली मिर्च, लौंग, इलायची तथा रसवास आदिका चूर्ण बनाकर परम सुगन्धित लड्डू बना दिये ॥ 29–30 ॥ शालि-धान्येर खई पुनः घृतेते भाजिया। चिनि-पाक उखड़ा कैला कर्पूरादि दिया ॥ 31 ॥ अनुवाद—उन्होंने शालिधानकी बनी खीलको घीमें भूनकर उसमें कर्पूर आदि मिलाकर चीनीकी चासनीमें पकाकर मुड़कि (मुरुण्डा) बनाया ॥ 31 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उखड़ा'—मुड़कि ॥ 31 ॥ फुट्कलाइ चूर्ण करि' घृते भाजाइला। चिनि-पाके कर्पूर दिया नाडु कैला ॥ 32 ॥ अनुवाद—उन्होंने तले हुए मटरोंका चूर्ण बनाकर उसे घीमें भूना और फिर उसे कर्पूर मिश्रित चीनीकी चासनीमें पकाकर लड्डू बनाये ॥ 32 ॥ अनुभाष्य—'फुट्कलाइ',—तले हुए मटर ॥ 32 ॥ सुस्वादिष्ट खाद्यको बनानेमें परम निपुण होनेपर भी ग्रन्थकारका दैन्य :— कहिते ना जानि नाम ए-जन्मे याहार। ऐछे नाना भक्ष्यद्रव्य सहस्रप्रकार ॥ 33 ॥ अनुवाद—श्रीमदमयन्तीने ऐसी सैकड़ों खाद्य वस्तुएँ बनायी जिनके नाम मैं पूर्ण जन्ममें भी नहीं कह सकता ॥ 33 ॥ श्रीराघव और श्रीमदमयन्तीकी महाप्रभुके प्रति गाढ़ प्रीति :— राघवेर आज्ञा, आर करेन दमयन्ती। दुँहार प्रभुते स्नेह परम-भकति ॥ 34 ॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितकी आज्ञानुसार श्रीमदमयन्ती समस्त वस्तुओंको बनातीं। उन दोनोंका महाप्रभुके प्रति बहुत स्नेह और परम-भक्ति थी ॥ 34 ॥ गङ्गा-मृत्तिका आनि' वस्त्रेते छानिया। पाँचकुड़ि करिया दिला गन्धद्रव्य दिया ॥ 35 ॥ अनुवाद—श्रीमदमयन्तीने गङ्गाकी मिट्टीको लाकर उसे वस्त्रके द्वारा छाना और उसके पाँच भाग किये एवं उनमें भिन्न-भिन्न सुगन्धित द्रव्य देकर पाँच पोटलियाँ बाँध दी ॥ 35 ॥ अनुभाष्य—'पाँचकुड़ि',—पाठान्तरमें 'पाकौड़ि', पाठान्तरमें, 'पाँपड़ि' अर्थात् दला अथवा 'पर्पटी' ॥ 35 ॥