भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2293

276 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/36-44 ] पातल मृत्पात्रे चन्दनादि भरि’ । आर सब वस्तु भरे वस्त्रेर कुथली ॥ ३६ ॥ अनुवाद—उन्होंने मिट्टीके बने हल्के पात्रोंमें चन्दन आदिको भर दिया और अन्य समस्त वस्तुओंको वस्त्रोंसे बनी थैलियोंमें भर दिया ॥ ३६ ॥ अनुभाष्य—‘पातल’,—पतला, हल्का, छोटा; किसी- किसीके मतानुसार पत्थर ॥ ३६ ॥ सामान्य झालि हैते द्विगुण झालि कैला। परिपाटि करि’ सब झालि भराइला ॥ ३७ ॥ अनुवाद—उन्होंने सामान्य थैलीसे दो गुनी आकारकी थैलियाँ बनायी और बड़ी सावधानीसे सभी छोटी-छोटी थैलियोंको बड़ी थैलियोंमें भर दिया ॥ ३७ ॥ झालि बान्धि’ मोहर दिला आग्रह करिया। तिन बोझारि झालि बहे क्रम करिया ॥ ३८ ॥ अनुवाद—उन्होंने बड़ी सावधानीपूर्वक थैलियोंको बाँधा और उनपर मोहर लगा दी। तीन भारवाहक उन झोलोंको एकके बाद एक करके उठा रहे थे ॥ ३८ ॥ अनुभाष्य—‘मोहर दिला,’—अन्य लोग जिससे खोल न पायें, इस प्रकारसे सील मोहर लगा दी; ‘बोझारि’,—बोझको (भारको) अरि (कम करनेवाले)—भारवाही, ‘कुली’ अथवा बोझ उठानेवाला ॥ ३८ ॥ इसलिये ही ‘राघवकी झोली’-नाम :— संक्षेपे कहिलुँ एइ झालिर विचार। ‘राघवेर झालि’ बलि’ ख्याति याहार ॥ ३९ ॥ अनुवाद—मैंने संक्षेपमें इन झोलियोंका वर्णन किया जो ‘श्रीराघव पण्डितकी झोली’के नामसे विख्यात हैं ॥ ३९ ॥ श्रीमकरध्वजके द्वारा यत्नपूर्वक झोलियोंकी रक्षा :— झालिर उपर ‘मुन्सिब’ मकरध्वज-कर। प्राणरूपे झालि राखे हञा तत्पर ॥ ४० ॥ अनुवाद—श्रीमकरध्वज-कर उन झोलियोंके ‘मुन्सिब’ (परिचालक) बने और वे सदा तत्पर रहकर झोलियोंकी अपने प्राणोंकी भाँति देखभाल करते थे ॥ ४० ॥ अनुभाष्य—‘मुन्सिब’,—(अरबी भाषा) ‘मन्सिफ’, परिदर्शक, परिचालक; ‘मकरध्वज-कर’—पाणिहाटी ग्रामवासी, राघव पण्डितके अनुगत गौरभक्त; अब भी पाणिहाटीमें उनके घरकी नींव दिखलायी पड़ती है ॥ ४० ॥ गौड़ीयभक्तोंके पुरीमें आनेवाले दिन नरेन्द्र-सरोवरमें श्रीगोविन्द-देवके जलक्रीड़ा-उत्सवका होना :— एइमते वैष्णव सब नीलाचले आइला। दैवे जगन्नाथेर से दिन जल-लीला ॥ ४१ ॥ अनुवाद—इस प्रकार सब वैष्णव श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये। सौभाग्यसे वह दिन भगवान् श्रीजगन्नाथका जलक्रीड़ा-उत्सवका था ॥ ४१ ॥ नरेन्द्रेर जले ‘गोविन्द’ नौकाते चड़िया। जलक्रीड़ा करे सब भक्तगण लञा ॥ ४२ ॥ अनुवाद—भगवान् श्रीगोविन्ददेवने नौकापर चढ़कर नरेन्द्र सरोवरके जलमें सब भक्तोंके साथ जलक्रीड़ा की ॥ ४२ ॥ उस समय महाप्रभुका भी पुरीवासी भक्तोंके साथ श्रीकृष्णकी जल-केलिका दर्शन :— सेइकाले महाप्रभु भक्तगण-सङ्गे। नरेन्द्रे आइला देखिते जलकेलि-रङ्गे ॥ ४३ ॥ अनुवाद—उसी समय महाप्रभु भक्तोंके साथ भगवान् गोविन्दकी आनन्दमय जलक्रीड़ाको देखनेके लिये नरेन्द्र सरोवरपर आये ॥ ४३ ॥ उस समय ही महाप्रभुके साथ गौड़ीय-भक्तोंका मिलन :— सेइकाले सब गौड़ेर भक्तगण। नरेन्द्रेते प्रभु-सङ्गे हइल मिलन ॥ ४४ ॥ अनुवाद—उसी समय गौड़देशसे आये समस्त भक्तोंका नरेन्द्र सरोवरपर महाप्रभुके साथ मिलन हुआ ॥ ४४ ॥