भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2294, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2294

[ 10/45–53 दसवाँ अध्याय 277 भक्तोंके द्वारा प्रणाम, महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- भक्तगण पड़े आसि' प्रभुर चरणे। उठाञा प्रभु सबारे कैला आलिङ्गने ॥ 45 ॥ अनुवाद—सभी गौड़ीय भक्त आकर महाप्रभुके चरणकमलोंमें पड़ गये। महाप्रभुने उन सबको उठाकर उनका आलिङ्गन किया॥ 45 ॥ गौड़ीय-भक्तोंका कीर्त्तन-गान, भक्तोंके द्वारा क्रन्दन :- गौड़ीय-सम्प्रदाय सब करेन कीर्त्तन। प्रभुर मिलने उठे प्रेमेर क्रन्दन ॥ 46 ॥ अनुवाद—गौड़ीय-सम्प्रदायके समस्त भक्त कीर्त्तन कर रहे थे और महाप्रभुके साथ मिलन होनेपर वे प्रेममें क्रन्दन करने लगे ॥ 46 ॥ भक्तोंके साथ श्रीगोविन्ददेवकी जलक्रीड़ा :- जलक्रीड़ा, वाद्य, गीत, नर्त्तन, कीर्त्तन। महाकोलाहल तीरे, सलिले खेलन ॥ 47 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्द देवकी जलक्रीड़ाके उपलक्ष्यमें नरेन्द्र सरोवरके तटपर वाद्य-यन्त्र बज रहे थे, गान, नृत्य, कीर्त्तन और कोलाहल हो रहा था। कुछ भक्त नरेन्द्र सरोवरके जलमें क्रीड़ा भी कर रहे थे ॥ 47 ॥ कीर्त्तन और क्रन्दन-ध्वनिका एकसाथ मिलकर महाध्वनि होना :- गौड़ीया-सङ्कीर्त्तने आर रोदन मिलिया। महाकोलाहल-शब्द हैल ब्रह्माण्ड भरिया ॥ 48 ॥ अनुवाद—गौड़ीय भक्तोंके सङ्कीर्त्तन और उच्च स्वरसे रोदनके मिल जानेपर महाकोलाहल हुआ जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गूँज उठा ॥ 48 ॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुकी जल-क्रीड़ा :- सब भक्त लञा प्रभु नामिलेन जले। सबा लञा जलक्रीड़ा करेन कुतूहले ॥ 49 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंको लेकर महाप्रभु भी नरेन्द्र सरोवरके जलमें उतरे और उन्होंने सभी भक्तोंके साथ बड़े आनन्दसे जलक्रीड़ा की ॥ 49 ॥ चैतन्यभागवतमें महाप्रभुकी जलक्रीड़ा वर्णित :- प्रभुर एइ जलक्रीड़ा दास-वृन्दावन। 'चैतन्यमङ्गले' विस्तारि' करियाछे वर्णन ॥ 50 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी इस जलक्रीड़ाका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थ चैतन्यमङ्गलमें (श्रीचैतन्यभागवतमें) विस्तारसे वर्णन किया है॥ 50 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'चैतन्यमङ्गले', — चैतन्यभागवतमें अन्त्य-खण्डका नौवाँ अध्याय देखें ॥ 50 ॥ ग्रन्थके बड़े होनेके भयसे पुनरुक्ति नहीं :- पुनः इँहा वर्णिले पुनरुक्ति हय। व्यर्थ लिखन हय, मोर ग्रन्थ बाड़य ॥ 51 ॥ अनुवाद—पुनः इसी प्रसङ्गका वर्णन करनेसे पुनरुक्ति होगी, इसलिये इसे लिखना व्यर्थ ही होगा और मेरे ग्रन्थका आकार भी बढ़ जायेगा॥ 51 ॥ अपने-अपने भक्तोंके साथ श्रीगोविन्ददेव और महाप्रभुका अपने-अपने स्थानके लिये प्रस्थान :- जललीला करि' गोविन्द चलिला आलय। निजगण लञा प्रभु गेला देवालय ॥ 52 ॥ अनुवाद—जलक्रीड़ा करनेके उपरान्त भगवान् श्रीगोविन्द अपने मन्दिरकी ओर चल दिये। महाप्रभु भी अपने भक्तोंको साथमें लेकर श्रीजगन्नाथ मन्दिर चले गये ॥ 52 ॥ अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें विजयमूर्ति श्रीगोविन्ददेवके विग्रह हैं; वे ही नरेन्द्र सरोवरमें जलक्रीड़ा करने जाते हैं॥ 52 ॥ श्रीजगन्नाथ-दर्शनके पश्चात् भक्तोंको भोजन करानेके बाद उनको अपने-अपने स्थानपर भेजना :- जगन्नाथ देखि' पुनः निज-घरे आइला। प्रसाद आनाञा भक्तगणे खाओयाइला ॥ 53 ॥ अनुवाद—महाप्रभु भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करके

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