भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2295

278 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/53-63 ] पुनः अपने वासस्थानपर लौट आये। उन्होंने मन्दिरसे प्रसाद मँगवाकर भक्तोंको खिलाया ॥ 53 ॥ इष्टगोष्ठी सबा लञा कतक्षण कैला। निज-निज-पूर्व-वासाय सबाय पाठाइला ॥ 54 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कुछ समय तक अपने समस्त भक्तोंके साथ इष्टगोष्ठी करके सभी भक्तोंको उनके पूर्व-पूर्व वर्षोंवाले अपने-अपने वासस्थानपर भेज दिया ॥ 54 ॥ श्रीराघवके द्वारा श्रीगोविन्दको अपनी झोली देना :- गोविन्द-ठाञि राघव झालि समर्पिला। भोजन-गृहेर कोणे झालि राखिला ॥ 55 ॥ अनुवाद-श्रीराघव पण्डितने श्रीगोविन्दको झोलीको समर्पित कर दिया और श्रीगोविन्दने उस झोलीको भोजन-गृहके एक कोनेमें रख दिया ॥ 55 ॥ पूर्व-वत्सरेर झालि आजाड़ करिया। द्रव्य भरिवारे राखे अन्य गृहे लञा ॥ 56 ॥ अनुवाद-श्रीगोविन्दने पिछले वर्षमें आयी झोलीको भली-भाँति खाली और साफ करके अन्य वस्तुओंको भरनेके लिये अन्य कमरेमें रख दिया ॥ 56 ॥ अनुभाष्य- 'आजाड़'-खाली, शून्य ॥ 56 ॥ अगले दिन प्रातः महाप्रभुका भक्तोंके साथ श्रीजगन्नाथ-दर्शन :- आर दिन महाप्रभु निजगण लञा। जगन्नाथ देखिलेन शय्योत्थाने यात्रा ॥ 57 ॥ अनुवाद-अगले दिन महाप्रभुने अपने भक्तोंको साथ ले जाकर भगवान् श्रीजगन्नाथके शय्यासे उठते हुए दर्शन किये ॥ 57 ॥ सात-सम्प्रदायोंमें बेड़ा-सङ्कीर्त्तन-वर्णन :- बेड़ा-सङ्कीर्त्तन ताँहा आरम्भ करिला। सात-सम्प्रदाये तबे गाइते लागिला ॥ 58 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने वहाँ बेड़ा-सङ्कीर्त्तन आरम्भ किया। उन्होंने तब भक्तोंकी सात-मण्डलियाँ बनायीं और सभीमें कीर्तन होने लगा ॥ 58 ॥ अनुभाष्य- बेड़ा-सङ्कीर्त्तन,'-मध्यलीला 11/215-238 संख्या देखें ॥ 58 ॥ सात-सम्प्रदाये नृत्य करे सात जन। अद्वैत-आचार्य, आर प्रभु नित्यानन्द ॥ 59 ॥ वक्रेश्वर, अच्युतानन्द, पण्डित-श्रीवास। सत्यराज-खाँन, आर नरहरिदास ॥ 60 ॥ महाप्रभुके द्वारा महैश्वर्यका प्रकाश :- सात-सम्प्रदाये प्रभु करेन भ्रमण। 'मोर सम्प्रदाये प्रभु'-ऐछे सबार मन ॥ 61 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीअच्युतानन्द, श्रीवास पण्डित, श्रीसत्यराज खाँन और श्रीनरहरिदास-सात मण्डलियोंमें क्रमशः ये सात भक्त नृत्य कर रहे थे। महाप्रभु एक-एक करके सातों मण्डलियोंमें भ्रमण कर रहे थे, परन्तु सभी मण्डलियोंके भक्तोंको ऐसा प्रतीत हो रहा था, -'महाप्रभु हमारी ही मण्डलीमें हैं'॥ '59-61 ॥ महासङ्कीर्त्तन-ध्वनि :- सङ्कीर्त्तन-कोलाहले आकाश भेदिल। सब जगन्नाथवासी देखिते आइल ॥ 62 ॥ अनुवाद-सङ्कीर्त्तनमें आकाश-भेदी ध्वनि हो रही थी। समस्त जगन्नाथपुरीवासी सङ्कीर्त्तनका दर्शन करनेके लिये आये ॥ 62 ॥ रानियोंके साथ राजाके द्वारा सङ्कीर्त्तनका दर्शन :- राजा आसि' दूरे देखे निजगण लञा। राजपत्नी सब देखे अट्टाली चड़िया ॥ 63 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने भी अपने गणोंके साथ आकर दूरसे और रानियोंने अट्टालिकापर चढ़कर सङ्कीर्त्तनका दर्शन किया ॥ 63 ॥