श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 10/64-71 दसवाँ अध्याय 279 महासङ्कीर्त्तनका वेग :— कीर्त्तन-आवेशे पृथिवी करे टलमल। 'हरिध्वनि' करे लोक, हैल कोलाहल ॥ 64 ॥ अनुवाद—महाप्रभु और उनके भक्तोंके द्वारा आवेशमें किये गये कीर्त्तनसे पृथ्वी भी टलमल करने लगी। जब सब लोग 'हरि, हरि' बोलने लगे, तब कोलाहल होने लगा॥ 64॥ अनुभाष्य—'कीर्त्तन-आवेशे'—पाठान्तरमें 'कीर्त्तनाटोपे'—कीर्त्तनके वेग अथवा संरम्भ-वशतः (आवेश-वशतः) ॥ 64 ॥ महाप्रभुकी नृत्य करनेकी इच्छा :— एइमत कतक्षण कराइला कीर्त्तन। आपने नाचिते तबे प्रभुर हैल मन ॥ 65 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने इस प्रकार कुछ समय तक कीर्त्तन करवाया, तब स्वयं महाप्रभुकी नृत्य करनेकी इच्छा हुई॥ 65 ॥ सात सम्प्रदायोंमें महाप्रभुका नृत्य :— सात-दिके सात-सम्प्रदाय गाय, बाजाय। मध्ये प्रेमावेशे नाचे गौर-राय ॥ 66 ॥ अनुवाद—सातों दिशाओंमें सात मण्डलियाँ गाने-बजाने लगीं और बीचमें श्रीगौरराय महाप्रेमके आवेशमें नृत्य करने लगे॥ 66 ॥ श्रीस्वरूपको उड़िया-गानका पद गानेकी आज्ञा :— उड़िया-पद महाप्रभुर मने स्मृति हैल। स्वरूपेरे सेइ पद गाइते आज्ञा दिल ॥ 67 ॥ अनुवाद—उस समय महाप्रभुके मनमें एक उड़िया-पद स्मरण हो आया और उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरको उस पदका गान करनेकी आज्ञा दी॥ 67॥ यथा पदम् :— “जगमोहन-परिमुण्डा याङ्”॥ 68 ॥ ध्रु॥ अनुवाद—जगमोहन नामक नाट्य मन्दिरमें भगवान् श्रीजगन्नाथके प्रति मेरा मस्तक समर्पित हो॥ 68 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीजगन्नाथदेवके मन्दिरके मध्य एक बहुत बड़े स्थानको 'जगमोहन' कहते हैं। उसकी एक दिशामें (एकान्तमें) 'गरुड़-स्तम्भ' है। उस जगमोहनके जिस स्थानपर भक्त नृत्य करते हैं, उसे 'परिमण्डल' कहते हैं; परिमण्डलका ही उत्कलदेशीय अपभ्रंश— 'परिमुण्डा' है; उड़िया-पदको इस स्थानपर सम्पूर्ण रूपमें नहीं देनेसे सुन्दर अर्थ नहीं होता। इस प्रकारके पद आजकल उत्कलमें प्रसिद्ध नहीं हैं,—किन्तु अवश्य ही किसी विशेष भावके ही सूचकमात्र हैं॥ 68 ॥ अनुभाष्य—'जगमोहन',—जगमोहन-नामक श्रीजगन्नाथदेवका नाट्यमन्दिर; 'परि',—प्रति; 'मुण्डा',—मस्तक; 'याङ्',—अर्पित हो, प्रेरित हो॥ 68 ॥ प्रेमके आवेशमें महाप्रभुके नृत्यसे सभीको आनन्द :— एइ पदे नृत्य करेन आपन-आवेशे। सबलोक चौदिके प्रभुर प्रेमे भासे ॥ 69 ॥ अनुवाद—इस पदको श्रवण करके महाप्रभु अपने आवेशमें नृत्य करने लगे। चारों ओर खड़े समस्त लोग महाप्रभुके प्रेममें निमग्न हो गये॥ 69॥ महाप्रभुके मुखसे केवल 'हरिबोल' ध्वनि :— 'बोल्' 'बोल्' बलेन प्रभु श्रीबाहु तुलिया। हरिध्वनि करे लोक आनन्दे भासिया ॥ 70 ॥ अनुवाद—महाप्रभु अपनी श्रीभुजाओंको उठाकर कहने लगे—'बोलो', 'बोलो'। दिव्यानन्दमें निमग्न होकर सभी लोग हरिध्वनि करने लगे॥ 70॥ महाप्रभुके सात्त्विक विकारसमूह :— प्रभु पड़ि' मूर्च्छा याय, श्वास नाहि आर। आचम्बिते उठे प्रभु करिया हुङ्कार ॥ 71 ॥ अनुवाद—महाप्रभु मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े और उनका श्वास-प्रश्वास बन्द हो गया। तभी वे अचानक हुङ्कार करते हुए उठकर खड़े हो गये॥ 71॥