श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें280 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/72–81 ] सघन पुलक,—येन शिमुलॆर तरु। कभु प्रफुल्लित अङ्ग, कभु हय सरु॥ 72॥ अनुवाद—महाप्रभुके शरीरपर पुलक हो गया अर्थात् रोम खड़े हो गये मानो सेमलकी रुईके वृक्षके ऊपर रोयें हों। कभी महाप्रभुके समस्त अङ्ग फूल जाते और कभी वे सब सङ्कुचित हो जाते॥ 72॥ प्रति रोमे हय प्रस्वेद, रक्तोद्गम्। ‘जज’ ‘गग’ ‘परि’ ‘मुमु’—गद्गद वचन॥ 73॥ अनुवाद—महाप्रभुके प्रत्येक रोमसे पसीना और रक्त प्रवाहित होने लगा। कण्ठके अवरुद्ध होनेके कारण ‘जगमोहन परिमुण्डा याड्’ पदको पूर्ण रूपसे ना कहकर उनके मुखसे ‘जज’ ‘गग’ ‘परि’ ‘मुमु’ गद्गद वचन ही निकले॥ 73॥ दाँतोंका हिलना :— एक एक दन्त सब पृथक् पृथक् नड़े। ऐछे नड़े दन्त—येन भूमे खसि’ पड़े॥ 74॥ अनुवाद—महाप्रभुका एक-एक दाँत हिलने लगा मानो वे सब अलग-अलग हैं। उनके दाँत ऐसे हिलने लगे, मानो वे भूमिपर गिरनेवाले ही हैं॥ 74॥ आनन्द-समुद्रका वर्धन :— क्षणे क्षणे बाड़े प्रभुर आनन्द-आवेश। तृतीय प्रहर हइल, नृत्य नहे शेष॥ 75॥ अनुवाद—महाप्रभुके आनन्दका आवेश क्षण-क्षणमें वर्धित होता जा रहा था। तृतीय प्रहर हो गया, किन्तु महाप्रभुका नृत्य समाप्त नहीं हुआ॥ 75॥ सभीको ही देह अथवा बाहरी जगत्की विस्मृति :— सब लोकेर उथलिल आनन्द-सागर। सब लोक पासरिल देह-आत्म-घर॥ 76॥ अनुवाद—सभी लोगोंके हृदयमें आनन्दरूपी सागर उमड़ पड़ा और वे अपनी देह, मन तथा घरको भूल गये॥ 76॥ श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा कीर्तनको भङ्ग करनेका उपाय निकालना :— तबे नित्यानन्द प्रभु सृजिला उपाय। क्रमे-क्रमे कीर्त्तनीया राखिल सबाय॥ 77॥ अनुवाद—बहुत देर हो जानेके कारण श्रीनित्यानन्द प्रभुने कीर्तनको विराम देनेका एक उपाय निकाला। उन्होंने क्रमशः कीर्तनीयोंके उच्च स्वरके कीर्तनको बन्द करवा दिया॥ 77॥ श्रीस्वरूपादिका मृदुस्वरमें गान :— प्रधान प्रधान येबा हय सम्प्रदाय। स्वरूपेर सङ्गे सेइ मन्दस्वर गाय॥ 78॥ अनुवाद—सातों मण्डलियोंके प्रधान-प्रधान कीर्तन करनेवाले भक्त श्रीस्वरूप दामोदरके साथ मन्द-मन्द स्वरमें गान करने लगे॥ 78॥ महाप्रभुका अर्द्धबाह्यदशामें आगमन :— कोलाहल नाहि, प्रभुर किछु बाह्य हैल। तबे नित्यानन्द सबार श्रम जानाइल॥ 79॥ अनुवाद—उच्च स्वरसे कीर्तनको नहीं सुननेके कारण महाप्रभु कुछ बाह्य दशामें आये। तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुको समस्त कीर्तन और नृत्य करनेवाले भक्तोंके परिश्रमके विषयमें बतलाया॥ 79॥ श्रीनित्यानन्दके कहनेसे भक्तोंके परिश्रमको जानकर कीर्तन समाप्ति और सभीके द्वारा समुद्रस्नान :— भक्तश्रम जानि’ कैला कीर्त्तन समापन। सबा लञा आसि’ कैला समुद्रे स्नपन॥ 80॥ अनुवाद—भक्तोंके परिश्रमको जानकर महाप्रभुने कीर्तनको विश्राम दिया। तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको अपने साथमें ले आकर समुद्रमें स्नान किया॥ 80॥ सभीके द्वारा प्रसादका सम्मान :— सब लञा प्रभु कैला प्रसाद-भोजन। सबारे विदाय दिला करिते शयन॥ 81॥