भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2298, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2298

[ 10/81-90 दसवाँ अध्याय 281 अनुवाद—स्नानके पश्चात् महाप्रभुने समस्त भक्तोंको अपने साथ लेकर प्रसाद ग्रहण किया और उन्हें शयन करनेके लिये विदायी दी॥ 81 ॥ महाप्रभुका शयन, श्रीगोविन्दके द्वारा चरण दबाना :— गम्भीरार द्वारे करेन आपने शयन। गोविन्द आसिया करे पाद-सम्वाहन ॥ 82 ॥ अनुवाद—महाप्रभु गम्भीराके द्वारपर शयन करने लगे और श्रीगोविन्द उनके चरण दबानेके लिये आये ॥ 82 ॥ अनुभाष्य— 'गम्भीरा', – घरके भीतरकी कोठरी ॥ 82 ॥ प्रतिदिन धीरे-धीरे चरण दबानेके फलस्वरूप महाप्रभुके नींद आ जानेपर श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुके उच्छिष्टको प्राप्त करनेकी रीति :— सर्वकाल आछे एइ सुदृढ़ 'नियम'। 'प्रभु यदि प्रसाद पाञा करेन शयन ॥ 83 ॥ गोविन्द आसिया करे पादसम्वाहन। तबे याइ' प्रभुर 'शेष' करेन भोजन ॥' 84 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दका सर्वदाका यह सुदृढ़ नियम था,—'जब महाप्रभु प्रसाद पाकर शयन करते, तब श्रीगोविन्द आकर उनके चरण दबाते। वे उसके बाद ही जाकर महाप्रभुके उच्छिष्ट प्रसादका भोजन करते ॥' 83-84 ॥ थके हुए महाप्रभुके द्वारा पूरे द्वारको घेरकर शयन :— सब द्वार युड़ि' प्रभु करियाछेन शयन। भितरे याइते नारे, गोविन्द करे निवेदन ॥ 85 ॥ चरणको दबानेके लिये श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुको करवट लेनेकी प्रार्थना, महाप्रभुके द्वारा अपने अङ्गोंको हिलानेमें असमर्थता जतलाना :— “एकपाश हओ, मोरे देह' भितरे याइते।” प्रभु कहे,—“शक्ति नाहि अङ्ग चालाइते ॥” 86 ॥ अनुवाद—उस दिन महाप्रभु बहुत देर तक नृत्य करनेके कारण बहुत थक गये थे, इसलिये वे द्वारपर ही मार्ग अवरुद्ध करके लेट गये थे। श्रीगोविन्द भीतर नहीं जा पा रहे थे। इसलिये उन्होंने महाप्रभुसे निवेदन किया,—“आप कृपया एक ओर हो जाइये। मुझे भीतर जाने दीजिये।” महाप्रभुने कहा,—“मुझमें अपने शरीरको हिलाने तककी भी शक्ति नहीं है॥”85-86॥ श्रीगोविन्दके द्वारा पुनः पुनः प्रार्थना करनेपर भी महाप्रभुका एक ही उत्तर :— बार बार गोविन्द कहे एकदिक् हइते। प्रभु कहे,—“अङ्ग आमि नारि चालाइते ॥” 87 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीगोविन्दने महाप्रभुको बार बार एक ओर हो जानेके लिये कहा, तथापि महाप्रभुने प्रत्येक बार यही उत्तर दिया,—“मैं अपने शरीरको हिला तक भी नहीं पा रहा हूँ॥” 87 ॥ श्रीगोविन्दके द्वारा चरण दबानेकी सेवाकी इच्छा, थकावटके कारण महाप्रभुकी उदासीनता :— गोविन्द कहे,—“करिते चाहि पाद-सम्वाहन।” प्रभु कहे,—“कर वा ना कर, येइ तोमार मन ॥” 88 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने कहा,—“मैं आपके चरण दबाना चाहता हूँ।” महाप्रभुने कहा,—“तुम करो अथवा ना करो, जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो ॥” 88 ॥ श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुके बहिर्वासको महाप्रभुकी देहके ऊपर रखकर उसको पार करना :— तबे गोविन्द तार बहिर्वास उपरे दिया। भितर-घरे गेला गोविन्द प्रभुरे लङ्घिया ॥ 89 ॥ अनुवाद—तब श्रीगोविन्दने महाप्रभुके बहिर्वास (उत्तरीय वस्त्र)को उनके ऊपर डाल दिया और उनको लाँघकर गम्भीराके भीतर चले गये ॥ 89 ॥ श्रीगोविन्दके कोमल-मधुर मलनेसे महाप्रभुकी थकावट दूर होना :— पाद-सम्वाहन कैल, कटि-पृष्ठ चापिल। मधुर-मर्दने प्रभुर परिश्रम गेल ॥ 90 ॥