भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2299

282 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/90-97 ] अनुवाद—श्रीगोविन्दने प्रतिदिनकी भाँति महाप्रभुके चरणोंको दबाया और फिर उनकी कमर और पीठको भी धीरे-धीरे मला। श्रीगोविन्दके कोमल-मधुर मलनेसे महाप्रभुका सारा परिश्रम दूर हो गया॥90॥ महाप्रभुकी प्रायः एक घण्टे तक निद्रा :— सुखे निद्रा हैल प्रभुर, गोविन्द चापे अङ्ग। दण्ड-दुइ बइ प्रभुर हैल निद्रा-भङ्ग॥91॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुके अङ्गोंकी सेवा करनेपर उनको बहुत अच्छी नींद आ गयी। दो दण्ड (48 मिनट)के बाद महाप्रभुकी नींद खुल गयी॥91॥ निद्रा भङ्ग होनेके बाद भी भूखे बैठे श्रीगोविन्दको प्रतीक्षा करते देख महाप्रभुके द्वारा भर्त्सना :— गोविन्दे देखिया प्रभु बले क्रुद्ध हञा। “आजि केने एतक्षण आछिस् बसिया??92॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीगोविन्दकी शुद्धसेवा-प्रवृत्तिकी परीक्षा; महाप्रभुके सोये होनेपर भी श्रीगोविन्दके द्वारा प्रसादके सम्मानके लिये नहीं जानेके कारणकी जिज्ञासा :— मोर निद्रा हैले केने ना गेला प्रसाद लैते?” गोविन्द कहे,—“द्वारे शुइला, याइते नाहि पथे॥”93॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दको अभी तक भी वहीं बैठे देखकर कुछ क्रोधित होकर कहा, —“तुम आज अब तक भी यहाँ क्यों बैठे हुए हो? मुझे नींद आ जानेपर तुम प्रसाद पानेके लिये क्यों नहीं गये?” श्रीगोविन्दने उत्तर दिया, —“आप तो द्वारके बीचमें ही सो गये, जानेके लिये मार्ग ही नहीं था॥”92-93॥ जैसे भीतर गये, वैसे बाहर नहीं जानेके कारणकी जिज्ञासा :— प्रभु कहे,—“भितर तबे आइला केमने? तैछे केने प्रसाद लैते ना कैला गमने??”94॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, —“फिर तुम भीतर किस प्रकार आये? और फिर उसी प्रकारसे प्रसाद पानेके लिये क्यों नहीं गये?” 94॥ शुद्ध अनुरागी श्रीगौर-कृष्णके सेवककी ही सर्वोत्तम सेवाके आदर्शका वर्णन; श्रीगौर-कृष्णकी इन्द्रियोंके तर्पणकी इच्छा ही सेवकका एकमात्र लक्ष्य :— गोविन्द कहे,—“आमार सेवा से 'नियम'। अपराध हउक, किबा नरके गमन॥95॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने मन-ही-मन कहा, —“मेरा तो सेवा करनेका ही नियम है, भले ही उसमें मेरा अपराध हो या फिर नरकमें गमन॥95॥ श्रीगौर-कृष्णकी इन्द्रियोंके तर्पणमें बिन्दुमात्र आत्मेन्द्रिय तर्पणकी इच्छाके प्रति भी शुद्धभक्तकी घृणा और अपराधकी आशङ्का :— 'सेवा' लागि' कोटि 'अपराध' नाहि गणि। स्व-निमित्त 'अपराधाभासे' भय मानि॥”96॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥96॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं महाप्रभुकी सेवाके लिये करोड़ों-करोड़ों अपराधोंकी भी गिनती नहीं करता; किन्तु अपने भोगोंके लिये अपराधके आभाससे भी भय करता हूँ॥”96॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/201 संख्या देखें— “निज-प्रेमानन्दे कृष्ण-सेवानन्द बाधे। से आनन्देर प्रति भक्तेर हय महाक्रोधे।” [अर्थात् “जब प्रेममें अपने आनन्दसे श्रीकृष्णके सेवानन्दमें बाधा उत्पन्न होती है, तो उस निज आनन्दके प्रति भक्तको अत्यधिक क्रोध होता है।”]॥96॥ महाप्रसादमें साक्षात् ब्रह्म-वस्तु और तदीय-वस्तुकी भावना रहनेपर भी व्यक्तिगत निज-सम्बन्धके कारण आत्मेन्द्रिय प्रीति वाञ्छाकी आशङ्कासे श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुकी निद्रा भङ्ग होने तक प्रतीक्षा :— एत सब मने करि' गोविन्द रहिला। प्रभु ये पुछिला, तार उत्तर ना दिला॥97॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने मन-ही-मन यह सब सोचा। उन्होंने महाप्रभुकी बातका कोई उत्तर नहीं दिया॥97॥

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