श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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[ 10/98–105 दसवाँ अध्याय 283 अन्य दिनोंमें महाप्रभुके सो जानेपर श्रीगोविन्दके द्वारा प्रसादके सम्मानके लिये जाना :– प्रत्यह प्रभुर निद्राय यान प्रसाद लइते। से दिवसेर श्रम देखि' लागिला चापिते॥ 98 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्द प्रतिदिन महाप्रभुको नींद आ जानेके बाद प्रसाद ग्रहण करनेके लिये जाते थे। किन्तु उस दिन महाप्रभुकी अधिक थकानको देखकर वे महाप्रभुके सो जानेपर भी उनकी सेवा करते रहे॥ 98 ॥ उस दिन प्रसादके सम्मानके लिये जानेमें असुविधाका कारण :– याइतेह पथ नाहि, याइबेन केमने? महा-अपराध हय प्रभुर लङ्घने॥ 99 ॥ अनुवाद—बाहर जानेका मार्ग ही नहीं था, जाते तो कैसे जाते? महाप्रभुको लाँघनेसे तो महा-अपराध होता॥ 99 ॥ श्रीचैतन्य-कृपा-पात्रको ही शुद्धभक्तिके रहस्यका ज्ञान :– एइ सब हय भक्तिशास्त्र-सूक्ष्ममर्म। चैतन्येर कृपाय जाने एइ सब धर्म॥ 100 ॥ अनुवाद—ये सब भक्तिशास्त्रोंके सूक्ष्म मर्म हैं, श्रीगोविन्द श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपासे इन सब विचारोंको भली-भाँति जानते थे॥ 100 ॥ अनुभाष्य—कर्मी लोग भक्तिशास्त्रोंके सूक्ष्म मर्मको नहीं समझ पानेके कारण अनुष्ठान-मात्रको ही भक्तिके समान मानते हैं; किन्तु जिससे भगवत्सेवा साधित होती है, उसका नाम-‘भक्ति’ है और जिससे अपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि प्राकृत-फलकी प्राप्ति होती है, वही ‘कर्म’ है। प्राकृतसहजिया कर्मी लोग विश्रम्भ-सख्य, वात्सल्य और मधुरभावकी सेवा-मर्यादाको नहीं समझ पानेके कारण श्रीचैतन्यकी कृपाको प्राप्त करनेसे वञ्चित होते हैं॥ 100 ॥ अपने भक्तोंकी शुद्धभक्तिके माहात्म्यको प्रकाशित करनेवाले महाप्रभु :– भक्त-गुण प्रकाशिते प्रभु बड़ रङ्गी। एइ सब प्रकाशिते कैला एत भङ्गी॥ 101 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको भक्तोंके गुणोंको प्रकाशित करनेमें बहुत आनन्द होता है, इसलिये उन्होंने अपने सेवक श्रीगोविन्दकी महिमाको प्रकाशित करनेके उद्देश्यसे ही यह लीला की॥ 101 ॥ गौरभक्तोंके द्वारा नित्य गान किये जानेवाले महाप्रभुका मण्डली बद्ध-नृत्य :– सङ्केपे कहिलुँ एइ परिमुण्डा-नृत्य। अद्यापि गाय याहा चैतन्येर भृत्य॥ 102 ॥ अनुवाद—मैंने संक्षेपमें ही मण्डली बनाकर किये गये उस नृत्यका वर्णन किया, जिसका गान श्रीचैतन्य महाप्रभुके दास आज तक भी करते हैं॥ 102 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘परिमुण्डा-नृत्य’,—मण्डली बनाकर किया गया नृत्य॥ 102 ॥ भक्तोंके साथ गुण्डिचा-मार्जन :– एइमत महाप्रभु लञा निजगण। गुण्डिचा-गृहे कैला क्षालन, मार्जन॥ 103 ॥ अनुवाद—इस प्रकार रथयात्रासे एक दिन पहले महाप्रभुने अपने भक्तोंको साथमें लेकर गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया और उसे जल आदिके द्वारा धोया॥ 103 ॥ आइटोटामें प्रसाद-सेवन :– पूर्ववत् कैला प्रभु कीर्त्तन, नर्त्तन। पूर्ववत् टोटाय कैला वन्य-भोजन॥ 104 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पहलेकी भाँति ही कीर्त्तन और नृत्य किया तथा फिर बगीचेमें वन-भोजन किया॥ 104 ॥ रथके आगे नृत्य और हेरा-पञ्चमी-दर्शन :– पूर्ववत् रथ-आगे करिला नर्त्तन। हेरापञ्चमी-यात्रा कैला दरशन॥ 105 ॥