श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें286 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/125-133 बासा होनेपर भी ताजे बनाये गये प्रसादकी भाँति स्वादिष्ट और सुगन्धित :- यद्यपि मासेकेर बासि मुकुता नारिकेल। अमृत-गुटिकादि, पानादि सकल ॥ 125 ॥ तथापि नूतनप्राय सब द्रव्येर स्वाद। 'बासि' विस्वाद नहे, सेइ प्रभुर प्रसाद ॥ 126 ॥ अनुवाद—यद्यपि नारियलकी बनी मिठाइयाँ, अमृत-गुटिका आदि और शरबत एक मास पहलेके बने थे, तथापि सभी द्रव्योंका स्वाद ऐसा था जैसे वे अभी ही बने हों। वे बासी या स्वादरहित नहीं थे, यह महाप्रभुकी ही कृपा है॥ 125-126॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मुकुता',—मुखछोला ॥ 125 ॥ दसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। शत-जनेर भक्ष्य प्रभु दण्डके खाइला। “आर किछु आछे?” बलि' गोविन्दे पुछिला ॥ 127 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने सौ व्यक्तियोंके द्वारा खाने योग्य उन खाद्य वस्तुओंको एक दण्डमें (24 मिनटमें) ही खा लिया। फिर उन्होंने श्रीगोविन्दसे पूछा,—“और कुछ है?”127 ॥ सब प्रकारके नैवेद्योंके भोजनके अन्तमें श्रीराघवकी झोलीका बाकी रह जाना :- गोविन्द बले,—“राघवेर झालि मात्र आछे।” प्रभु कहे,—“आजि रहु, ताहा देखिमु पाछे ॥” 128 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने कहा,—“अब केवल श्रीराघव पण्डितकी झोली ही बची है।” महाप्रभुने कहा,—“उसे आज रहने दो, उसे मैं बादमें देखूँगा॥” 128 ॥ अगले दिन महाप्रभुके द्वारा अकेले भोजन करते समय श्रीराघवकी झोलीमें रखे उत्तम नैवेद्योंका भोजन और उनकी प्रशंसा :- आर दिन प्रभु यदि निभृते भोजन कैला। राघवेर झालि खुलि' सकल देखिला ॥ 129 ॥ सब द्रव्येर किछु किछु उपयोग कैला। स्वादु, सुगन्धि देखि' बहु प्रशंसिला ॥ 130 ॥ अनुवाद—अगले दिन जब महाप्रभुने एकान्तमें भोजन किया, तब उन्होंने श्रीराघव पण्डितकी झोलियोंको खोलकर उनमें रखी समस्त सामग्रियोंको देखा। महाप्रभुने उन समस्त द्रव्योंमें-से कुछ-कुछ ग्रहण किया और उनके स्वाद तथा सुगन्धकी बहुत प्रशंसा की॥ 129-130 ॥ अनुभाष्य—'उपयोग',—स्वीकार, ग्रहण॥ 130 ॥ एक वर्षके बाद भी श्रीराघवकी झोलीके विकाररहित नैवेद्य-भोजन :- वत्सरेक तरे आर राखिला धरिया। भोजनकाले स्वरूप परिवेशे खसाञा ॥ 131 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूरे वर्षके लिये खानेके लिये उन झोलियोंमें लायी वस्तुओंको सम्भालकर रख लिया। महाप्रभुके मध्याह्न-भोजनके समय श्रीस्वरूप दामोदर उन झोलियोंमें-से निकालकर उन्हें वे वस्तुएँ परोसते थे॥ 131 ॥ भक्तोंके द्वारा श्रद्धापूर्वक प्रदान किये गये नैवेद्योंको स्वीकार करना :- कभु रात्रिकाले किछु कराय उपयोग। भक्तेर श्रद्धार द्रव्य अवश्य करेन उपभोग ॥ 132 ॥ अनुवाद—कभी रात्रिके समय महाप्रभु उन झोलियोंमें-से कुछ ग्रहण करते थे। क्योंकि महाप्रभु भक्तोंके द्वारा श्रद्धापूर्वक प्रदान किये गये द्रव्योंको अवश्य ही ग्रहण करते हैं॥ 132 ॥ अपने भक्तोंके साथ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकथामें चातुर्मास्य व्यतीत करना :- एइमत महाप्रभु भक्तगण-सङ्गे। चातुर्मास्य गोङाइला कृष्णकथा-रङ्गे ॥ 133 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने अपने भक्तोंके साथ चातुर्मास्यको कृष्णकथाके आनन्दमें व्यतीत किया॥ 133 ॥