श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2304, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 10/134–144 दसवाँ अध्याय 287 अपने-अपने घरमें श्रीअद्वैताचार्यादिके द्वारा निमन्त्रण :- मध्ये मध्ये आचार्यादि करेन निमन्त्रण। घरे भात रान्धे आर विविध व्यञ्जन ॥ 134 ॥ महाप्रभुके प्रिय विचित्र नैवेद्योंका वर्णन :- मरिचेर झाल, आर मधुराम्ल आर। आदा, लवण, लेम्बु, दुग्ध, दधि, खण्डसार ॥ 135 ॥ शाक दुइ चारि, आर सुक्तार झोल। निम्ब-वार्त्ताकी, आर भृष्ट-पटोल ॥ 136 ॥ भृष्ट-फुलबड़ी, आर मुद्ग-डालि-सूप। विविध व्यञ्जन रान्धे प्रभुर अनुरूप ॥ 137 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तगण महाप्रभुको बीच-बीचमें निमन्त्रण करते थे और वे अपने घरपर ही चावल और विविध व्यञ्जनोंको पकाते थे। वे महाप्रभुके प्रिय मिर्च डालकर बनाये गये तीखे, कुछ खट्टे-मीठे व्यञ्जन, अदरक, नमक, नींबू, दूध, दही और खण्डसारका उपयोग करके अन्य कुछ व्यञ्जन, दो-चार प्रकारके साग, सूखे कड़वे पाट सागको पीसकर बनाया गया सुख्ताका झोल, नीम-बैंगन, भरे हुए परवल, भरी हुई फूलवड़ी, पतली मूँगकी दाल आदि विविध व्यञ्जनोंको प्रस्तुत करते थे॥ 134-137॥ अनुभाष्य—यहाँपर ग्रन्थकारकी पाककलाकी निपुणता प्रकाशित हुई है॥ 135-137॥ महाप्रभुका प्रसादके साथ नैवेद्य-भोजन :- जगन्नाथेर प्रसाद आने करिते मिश्रित। काँहा एका यायेन, काँहा गणेर सहित ॥ 138 ॥ अनुवाद—वे इन सब सामग्रियोंको भगवान् श्रीजगन्नाथके प्रसादके साथ मिलाकर महाप्रभुको खिलाते। महाप्रभु कहीं-कहींपर तो अकेले ही जाते थे और कहीं-कहींपर अपने भक्तोंके साथमें जाते थे॥ 138 ॥ निमन्त्रण करनेवाले अन्यान्य गौड़ीय भक्तगण :- आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, नन्दन, राघव। श्रीवास-आदि यत भक्त, विप्र सब ॥ 139 ॥ एइमत निमन्त्रण करेन यत्न करि'॥ वासुदेव, गदाधर, गुप्त-मुरारि ॥ 140 ॥ कुलीनग्रामी, खण्डवासी, आर यत जन। जगन्नाथेर प्रसाद आनि' करेन निमन्त्रण ॥ 141 ॥ अनुवाद—श्रीआचार्य रत्न, श्रीआचार्य निधि, श्रीनन्दन आचार्य, श्रीराघव पण्डित, श्रीवास पण्डित आदि जितने सब ब्राह्मण भक्त थे, वे इस प्रकार महाप्रभुको निमन्त्रण करके अत्यन्त प्रीतिपूर्वक भोजन कराते थे। श्रीवासुदेव दत्त, श्रीगदाधर दास, श्रीमुरारि गुप्त, कुलीन-ग्रामवासी, खण्डवासी तथा अन्य जितने समस्त भक्त जो ब्राह्मण नहीं थे, वे सभी महाप्रभुको निमन्त्रण करके श्रीजगन्नाथदेवके प्रसादको लाकर उन्हें भोजन कराते थे॥ 139-141॥ अनुभाष्य—'कुलीनग्रामी',—सत्यराज-खाँन, रामानन्द वसु आदि; 'खण्डवासी',—मुकुन्ददास, नरहरि-दास, रघुनन्दनादि॥ 141 ॥ श्रीशिवानन्दके पुत्र श्रीचैतन्यदासके वृत्तान्तका वर्णन :- शिवानन्द-सेनेर शुन निमन्त्रणाख्यान। शिवानन्देर बड़-पुत्रेरे 'चैतन्यदास' नाम ॥ 142 ॥ अनुवाद—अब श्रीशिवानन्द सेनके निमन्त्रणके उपाख्यानका श्रवण करो। श्रीशिवानन्द सेनके बड़े पुत्रका नाम 'चैतन्यदास' था॥ 142॥ अनुभाष्य—'चैतन्यदास',—कृष्णकर्णामृतकी संस्कृत-टीका इन्हींके द्वारा रचित है; कोई-कोई कहते हैं कि चैतन्यचरितामृत-महाकाव्यके भी यही रचियता हैं॥ 142 ॥ प्रभुरे मिलाइते ताँरे सङ्गेइ आनिला। मिलाइले, प्रभु ताँर नाम त' पुछिला ॥ 143 ॥ निज-दास्यसूचक नामको सुनकर महाप्रभुके द्वारा आत्मगोपन और अज्ञानता दिखलाना :- 'चैतन्यदास' नाम शुनि' कहे गौरराय। “कि नाम धराञाछ, बुझन ना याय ॥” 144 ॥