भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2305

288 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/143-153 ] अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन अपने पुत्र श्रीचैतन्यदासको महाप्रभुसे मिलवानेके लिये अपने साथ लेकर आये। महाप्रभुने उन दोनोंसे मिलनेपर श्रीशिवानन्दसे उनके पुत्रका नाम पूछा। उनके पुत्रका 'चैतन्यदास' नाम सुनकर श्रीगौररायने कहा,—“आपने अपने पुत्रका कैसा नाम रखा है? इसे समझना बड़ा कठिन है॥”143-144 ॥ श्रीशिवानन्दका उत्तर और महाप्रभुको निमन्त्रण :— सेन कहे,—“ये जानिलुँ, सेइ नाम धरिल।” एत बलि' महाप्रभुरे निमन्त्रण कैल ॥ 145 ॥ जगन्नाथेर बहुमूल्य प्रसाद आनाइला। भक्तगणे लञा प्रभु भोजने बसिला ॥ 146 ॥ बहुत अधिक भोजनके कारण महाप्रभुकी अप्रसन्नता :— शिवानन्देर गौरवे प्रभु करिला भोजन। अतिगुरु-भोजने प्रसन्न नहे मन ॥ 147 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने उत्तर दिया,—“मुझे जो समझमें आया, मैंने उसके अनुसार नाम रखा है।” यह कहकर श्रीशिवानन्द सेनने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। श्रीशिवानन्द सेनने श्रीजगन्नाथदेवका बहुमूल्य प्रसाद मँगवाया था और उसे महाप्रभुको निवेदन किया। महाप्रभु भक्तोंको अपने साथ लेकर भोजनके लिये बैठे। महाप्रभुने श्रीशिवानन्द सेनके सम्मान हेतु वह सब भोजन तो खाया, किन्तु मात्रामें बहुत अधिक और गरिष्ठ (कठिनतासे पचनेवाला भारी) होनेके कारण उनका मन प्रसन्न नहीं हुआ॥ 145-147 ॥ महाप्रभुके अभिप्रायको समझकर श्रीशिवानन्दके पुत्र श्रीचैतन्यदासके द्वारा जठराग्नि-मन्दनाशक द्रव्यके द्वारा 'स्वारसिकी' सेवा :— आर दिन चैतन्यदास कैला निमन्त्रण। प्रभुर 'अभीष्ट' बुझि' आनिला व्यञ्जन ॥ 148 ॥ दधि, लेम्बु, आदा, आर फुलबड़ा-लवण। सामग्री देखि' प्रभुर प्रसन्न हैल मन ॥ 149 ॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीचैतन्यदासने महाप्रभुको निमन्त्रण किया और उन्होंने महाप्रभुके अभीष्टको समझकर व्यञ्जन मँगवाये और दही, नींबू, अदरक, फूल-बड़ी तथा नमक आदिको महाप्रभुको निवेदन किया। यह सब सामग्री देखकर महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ 148-149 ॥ अन्तर्यामी महाप्रभुको श्रीचैतन्यदासकी यथार्थ शुद्धसेवा-प्रवृत्ति देखकर आनन्द :— प्रभु कहे,—“ए बालक आमार मत जाने। सन्तुष्ट हइलाङ् आमि इहार निमन्त्रणे॥” 150 ॥ अपने दासको महाप्रभुके द्वारा अपना उच्छिष्ट प्रदान :— एत बलि' दधि-भात करिला भोजन। चैतन्यदासरे दिला उच्छिष्ट-भाजन ॥ 151 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“यह बालक मेरे मनको जानता है, मैं इसके निमन्त्रणसे अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ हूँ।” यह कहकर महाप्रभुने दही-भातका भोजन किया और श्रीचैतन्यदासको अपना उच्छिष्ट दे दिया॥ 150-151 ॥ अनुभाष्य—'भाजन',—सहभाजन (साँझा करना), पात्र ॥ 151 ॥ चार मास तक भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :— चारिमास एइमत निमन्त्रणे याय। कोन कोन वैष्णव 'दिवस' नाहि पाय ॥ 152 ॥ अनुवाद—चार मास इसी प्रकार महाप्रभुके द्वारा प्रतिदिन निमन्त्रण स्वीकार करते हुए व्यतीत हो गये। किसी-किसी वैष्णवको तो निमन्त्रण करनेके लिये खाली दिन ही नहीं मिला ॥ 152 ॥ श्रीगदाधर और श्रीसार्वभौमका महाप्रभुको निमन्त्रण करनेका निर्दिष्ट नियम :— गदाधर-पण्डित, आचार्य-सार्वभौम। इँहा सबार आछे भिक्षार दिवस-नियम ॥ 153 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके