भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2306, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2306

[ 10/153–162 दसवाँ अध्याय 289

मासमें दिन निर्धारित थे जब महाप्रभु उनके निमन्त्रणको स्वीकार करते थे॥ 153 ॥ बीच-बीचमें निमन्त्रण करनेवाले भक्त :— गोपीनाथाचार्य, जगदानन्द, काशीश्वर। भगवान्, रामभद्राचार्य, शङ्कर, वक्रेश्वर ॥ 154 ॥ मध्ये मध्ये घर–भाते करे निमन्त्रण। अन्येर निमन्त्रणे प्रसादे कौड़ि दुइपण ॥ 155 ॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथ आचार्य, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीकाशीश्वर पण्डित, श्रीभगवान् आचार्य, श्रीरामभद्राचार्य, श्रीशङ्कर पण्डित और श्रीवक्रेश्वर पण्डित बीच-बीचमें अपने घरपर अन्न-व्यञ्जन आदि बनाकर महाप्रभुको निमन्त्रण करते थे। अन्य भक्त महाप्रभुको निमन्त्रण करके दो पण कौड़ीका (दो आनेका) प्रसाद मँगवाते थे॥ 154-155 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभु जो जन्मसे ब्राह्मण थे उनके घरमें बना भोजन स्वीकार करते थे। अथवा जो जन्मसे ब्राह्मण थे, किन्तु उनके घरका बना भोजन नहीं खाया जा सकता था अथवा अन्यान्य व्यक्तियोंके निमन्त्रणमें महाप्रभु दो पण अथवा चार पण कौड़ीके मूल्यका महाप्रसाद स्वीकार करते थे॥ 154-155 ॥ रामचन्द्रपुरीके भयसे आधा-भोजन :— प्रथमे आछिल ‘निर्वन्ध’ कौड़ि चारिपण। रामचन्द्रपुरी-भये घटाइला निमन्त्रण ॥ 156 ॥ अनुवाद—पहले महाप्रभुके प्रसादके लिये चार पण कौड़ी खर्च करने तकका नियम था, किन्तु रामचन्द्रपुरीके भयसे उसे कम करके आधा कर दिया गया था॥ 156 ॥ अनुभाष्य—'घटाइला',—कम कर दिया॥ 156 ॥ दसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। गौड़ीयभक्तोंका गौड़में जाना, पुरीवासियोंका पुरीमें रहना :— चारिमास रहि' गौड़ेर भक्ते विदाय दिला। नीलाचलेर सङ्गी भक्त सङ्गेइ रहिला ॥ 157 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने गौड़देशसे आये भक्तोंको चार मास तक रहनेके बाद विदायी दी। उसके बाद श्रीजगन्नाथपुरीके सङ्गी भक्त ही महाप्रभुके साथ रहे॥ 157 ॥ महाप्रभुकी भिक्षाकी रीति, भक्तोंके द्वारा प्रदान किये गये द्रव्य और परिमुण्डा-नृत्यादि वर्णित :— एइ त' कहिलुँ प्रभुर भिक्षा-निमन्त्रण। भक्त-दत्त वस्तु यैछे कैला आस्वादन ॥ 158 ॥ तार मध्ये राघवेर झालि-विवरण। तार मध्ये परिमुण्डा-नृत्य-कथन ॥ 159 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने यह बतलाया कि महाप्रभुने कैसे भोजनके निमन्त्रणको स्वीकार किया और कैसे उन्होंने भक्तोंके द्वारा प्रदत्त वस्तुओंका आस्वादन किया। मैंने इसी प्रसङ्गके बीचमें ही श्रीराघव पण्डितकी झोलीका विवरण और महाप्रभुके परिमुण्डा (मण्डलीबद्ध) नृत्यका वर्णन किया है॥ 158-159 ॥ श्रीकृष्णचैतन्य-कथाके श्रवणसे श्रीगौर-कृष्णके चरणोंमें प्रेमका उदय :— श्रद्धा करि' शुने येइ चैतन्येर कथा। चैतन्यचरणे प्रेम पाइबे सर्वथा ॥ 160 ॥ श्रीगौरकथा—जीवोंके हृदय और कानोंके लिये रसायन :— शुनिते अमृत-सम जुड़ाय कर्ण-मन। सेइ भाग्यवान्, येइ करे आस्वादन ॥ 161 ॥ अनुवाद—जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कथाका श्रवण करता है, उसे अवश्य ही श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंमें प्रेमकी प्राप्ति होगी। महाप्रभुकी कथा सुननेमें अमृतके समान है और वह कानों तथा मनको परम तृप्त कर देती है। जो व्यक्ति इसका आस्वादन करता है, वह अत्यन्त सौभाग्यशाली है॥ 160-161 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 162 ॥