भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2310

[ 11/16-25 ग्यारहवाँ अध्याय 293 श्रीहरिदास ठाकुरके अप्रकट कालकी अवस्था :- देखे,—हरिदास-ठाकुर करियाछेन शयन। मन्द मन्द करितेछेन संख्या-सङ्कीर्त्तन ॥ 17 ॥ अनुवाद—एकदिन जब महाप्रभुके सेवक श्रीगोविन्द आनन्दित होकर श्रीहरिदास ठाकुरको महाप्रसाद देनेके लिये गये, तब उन्होंने देखा कि श्रीहरिदास ठाकुर लेटे हुए मन्द-मन्द ध्वनिसे संख्यापूर्वक नामसङ्कीर्तन कर रहे हैं॥ 16-17 ॥ श्रीगोविन्दके द्वारा प्रसाद ग्रहण करनेके लिये अनुरोध, श्रीहरिदासकी नहीं लेनेकी इच्छा :- गोविन्द कहे,—“उठ आसि’ करह भोजन।” हरिदास कहे,—“आजि करिमु लङ्घन ॥ 18 ॥ श्रीहरिदासके द्वारा नामाश्रित साधकके प्रसादके सम्मानके विषयमें आदर्श-व्यवहारका प्रदर्शन :- संख्या-कीर्त्तन पूरे नाहि, केमते खाइमु? महाप्रसाद आनियाछ, केमते उपेक्षिमु??” 19 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने कहा,—“कृपया उठिये और आकर भोजन कीजिये।” श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“आज मैं उपवास ही करूँगा। अभी तक मेरे नामकीर्तनकी संख्या पूर्ण नहीं हुई है, इसलिये मैं कैसे खा सकता हूँ? किन्तु आप महाप्रसाद लाये हैं, तो मैं उसकी उपेक्षा भी कैसे कर सकता हूँ?”18-19 ॥ एत बलि’ महाप्रसाद करिला वन्दन। एक रञ्च लञा तार करिला भक्षण ॥ 20 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रसादकी वन्दना की और उसमें-से एक कण लेकर उसे खा लिया॥ 20 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘रञ्च’,—कण॥ 20 ॥ एकदिन महाप्रभुका श्रीहरिदासके पास आना और उनका कुशल पूछना :- आर दिन महाप्रभु ताँर ठाञि आइला। “सुस्थ हओ, हरिदास”—बलि’ ताँरे पुछिला ॥ 21 ॥ अनुवाद—अगले दिन महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरके वासस्थानपर आये और उनसे पूछा,—“हे हरिदास! आप स्वस्थ तो हैं ना!”21 ॥ श्रीहरिदासकी दैन्य-उक्ति :- नमस्कार करि’ तँहो कैला निवेदन। “शरीर सुस्थ हय मोर, असुस्थ बुद्धि-मन ॥”22 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने उनको प्रणाम करके निवेदन किया,—“मेरा शरीर तो स्वस्थ है, किन्तु मन और बुद्धि अस्वस्थ हैं॥”22 ॥ महाप्रभुके प्रश्नोत्तरमें संख्यानाम-कीर्तन-अभावसे उत्पन्न अपने दुःखके विषयमें बतलाना :- प्रभु कहे,—“कोन व्याधि, कह त’ निर्णय?” तँहो कहे,—“संख्या-कीर्त्तन ना पूरय ॥” 23 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,—“क्या आप बता सकते हो आपको क्या रोग है?” श्रीहरिदास ठाकुरने उत्तर दिया,—“मेरा संख्यापूर्वक नामकीर्तन पूर्ण नहीं हो पाता॥” 23 ॥ अनुभाष्य—यहाँपर भी जाना जा रहा है कि संख्या-ग्रहणपूर्वक नियमितरूपसे ठाकुर श्रीहरिदासके आनुगत्यमें (सोलह नाम बत्तीस अक्षर) “हरे कृष्ण”-महामन्त्रकी उच्चस्वरमें कीर्तनकी विधि ही प्रत्येक नामाश्रित साधकके लिये एकमात्र पालनीय है। अन्त्यलीला 3/99, 113-115, 120, 123-124, 129, 175, 223, 227, 238-242 आदि संख्या देखें॥ 23 ॥ महाप्रभुके द्वारा अप्राकृत सिद्धदेह श्रीहरिदासको साधनके अभिनयको कम करनेका आदेश :- प्रभु कहे,—“वृद्ध हइला ‘संख्या’ अल्प कर। सिद्ध-देह तुमि, साधने आग्रह केने कर? ? 24 ॥ स्वयं महाप्रभुके वचन—“नामके आचार्य और प्रचारकके रूपमें श्रीहरिदास अवतीर्ण” :- लोक निस्तारिते एइ तोमार ‘अवतार’। नामेर महिमा लोके करिला प्रचार ॥ 25 ॥