भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2311

294 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/24-33 ] एबे अल्प संख्या करि' कर सङ्कीर्त्तन।” हरिदास कहे, —“शुन मोर निवेदन ॥ 26 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, —“अब आप वृद्ध हो गये हैं, आप नाम-संख्याको कम कर दीजिये। आप सिद्ध-देहको प्राप्त कर चुके हैं, तो आपका साधनमें इतना आग्रह क्यों हैं? आपका यह अवतार लोगोंका उद्धार करनेके लिये ही हुआ है। आपने कृष्णनामकी महिमाका इस जगत्में बहुत प्रचार किया है। अब आप संख्याको कुछ कम करके नाम-सङ्कीर्तन कीजिये।” श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, —“आप मेरा निवेदन सुनिये— ॥ 24-26 ॥ अनुभाष्य- 'तोमार अवतार',—भगवद्भक्त और पार्षदगण भगवान्की इच्छासे उनकी सेवाके उद्देश्यसे पृथ्वीपर अवतीर्ण होते हैं ॥ 25 ॥ श्रीहरिदासके पत्थरको भी पिघला देनेवाले दीनतापूर्ण वचन और महाप्रभुकी महिमाका गान :- हीन-जाति जन्म मोर निन्द्य-कलेवर। हीनकर्मे रत मुञि अधम पामर ॥ 27 ॥ अदृश्य, अस्पृश्य मोरे अङ्गीकार कैला। रौरव हइते मोरे वैकुण्ठे चढ़ाइला ॥ 28 ॥ स्वतन्त्र ईश्वर तुमि हओ इच्छामय। जगत्नाचाओ, यारे यैछे इच्छा हय ॥ 29 ॥ अनेक नाचाइला मोरे प्रसाद करिया। विप्रेर श्राद्धपात्र खाइनु 'म्लेच्छ' हञा ॥ 30 ॥ अनुवाद-मेरा जन्म हीन जातिमें हुआ है और मेरी यह देह अति निन्दनीय है। मैं हीन कर्मोंमें ही रत रहता हूँ, इसलिये मैं अधम और पापी हूँ। यद्यपि मैं देखने और स्पर्श करने योग्य भी नहीं हूँ, तथापि आपने मुझे अङ्गीकार करके रौरव-नरकसे उठाकर वैकुण्ठमें पहुँचा दिया है। आप स्वतन्त्र ईश्वर होनेके कारण जो चाहे कर सकते हैं। आपकी जैसी इच्छा होती है, आप जगत्‌को वैसे ही नचाते हैं। आपने कृपा करके मुझे भी बहुत नचाया है, मैंने म्लेच्छ होनेपर भी ब्राह्मणके श्राद्ध-पात्रको खाया है ॥ 27-30 ॥ अनुभाष्य- 'श्राद्धपात्र', —विष्णुस्मृतिमें— “ब्राह्मणापसदा ह्येते कथिताः पङ्क्तिदूषकाः। एतान् विवर्जयेद्यत्नात् श्राद्धकर्मणि पण्डितः ॥” अर्थात् “ब्राह्मणकुलमें जन्म होनेपर भी स्मृतिमें बतलाये गये पंक्तिदूषक [जिसके साथ बैठकर भोजन करनेमें दूषण लगे, ऐसे समाजको दूषित करनेवाले] 'अपसदाख्य' [नीच कहे जानेवाले] ब्राह्मणको श्राद्ध-पात्र मत देना।” यहाँपर शुद्ध ब्राह्मणको प्राप्त होनेवाला श्राद्धपात्र [अप्राकृत] दीक्षित-ब्राह्मण श्रीहरिदासको दिया गया। म्लेच्छ-कुलमें उत्पन्न होनेपर भी 'हरिजन' होनेके कारण उनका उसमें अधिकार है ॥ 30 ॥ महाप्रभुसे अपना अभिप्राय बतलाना :- एक वाञ्छा हय मोर बहु दिन हैते। लीला सम्वरिबे तुमि, —लय मोर चित्ते ॥ 31 ॥ महाप्रभुके अप्रकट होनेसे पहले ही अपनी लीलाको सम्वरण करनेकी इच्छा :- सेइ लीला प्रभु मोरे कभु ना देखाइबा। आपनार आगे मोर शरीर पड़िबा ॥ 32 ॥ अनुवाद-बहुत दिनोंसे मेरी एक इच्छा है। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप शीघ्र ही अपनी लीला सम्वरण करेंगे, इसलिये हे महाप्रभो ! आप मुझे अपनी वह अन्तर्धान-लीला कभी मत दिखाना। उसके पूर्व ही आपके सामने ही मेरा यह शरीर छूट जाय ॥ 31-32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'सेइ लीला'-आपकी अन्तर्धान- लीला ॥ 32 ॥ काय-मन-वाक्यसे श्रीगौर-कृष्णसेवासुखपरायण अपनी अभिलाषाके साथ अप्रकट होनेकी इच्छाका ज्ञापन :- हृदये धरिमु तोमार कमल-चरण। नयने देखिमु तोमार चाँद-वदन ॥ 33 ॥