भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2312

[ 11/33-44 ग्यारहवाँ अध्याय 295 जिह्वाय उच्चारिमु तोमार 'कृष्णचैतन्य'-नाम। एइमत मोर इच्छा,-छाड़िमु पराण ॥ 34 ॥ मोर एइ इच्छा यदि तोमार प्रसादे हय। एइ निवेदन मोर कर, दयामय ॥ 35 ॥ एइ नीच देह मोर पड़ुक तव आगे। एइ वाञ्छा-सिद्धि मोर तोमाते लागे ॥”36 ॥ अनुवाद—मैं अपने हृदयमें आपके चरणकमलोंको धारण करूँ, अपने नेत्रोंसे आपके चन्द्र जैसे मुखका दर्शन करूँ और मैं अपनी जिह्वासे आपके 'कृष्णचैतन्य'-नामका उच्चारण करूँ—मैं ऐसे करते हुए देहत्याग करूँ, मेरी ऐसी इच्छा है। आपकी कृपासे मेरी यह वाञ्छा पूर्ण हो सकती है। हे दयामय! आप मेरे इस निवेदनको स्वीकार कीजिये। मेरी यह नीच देह आपके सामने ही छूट जाय, मेरी यह वाञ्छासिद्धि आपके द्वारा ही हो सकती है॥”33-36 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासकी इच्छा पूर्ण करना :- प्रभु कहे,—“हरिदास, ये तुमि मागिबे। कृष्ण कृपामय ताहा अवश्य करिबे ॥ 37 ॥ लीला-परिकरके विच्छेदके स्मरणसे महाप्रभुके अति मर्मस्पर्शी और करुण वचन :- किन्तु आमार ये किछु सुख, सब तोमा लञा। तोमार योग्य নহে,-याबे आमारे छाड़िया ॥”38 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे हरिदास! आप जो कुछ भी माँगोगे, कृपामय कृष्ण आपकी इच्छाको अवश्य ही पूर्ण करेंगे। किन्तु मेरा जो कुछ सुख है, वह सब आपके सङ्गके कारण ही है। आपके लिये मुझे इस प्रकारसे छोड़कर जाना उचित नहीं है॥”37-38 ॥ श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुकी निष्कपट कृपाकी याचना :- चरणे धरि' कहे हरिदास,—“ना करिह 'माया'। अवश्य मो-अधमे, प्रभु, कर एइ 'दया' ॥ 39 ॥ पुनः दैन्यपूर्ण उक्ति :- मोर शिरोमणि कत कत महाशय। तोमार लीलार सहाय कोटिभक्त हय ॥ 40 ॥ आमा-हेन यदि एक कीट मरि' गेल। पिपीलिका मैले पृथिवीर काँहा हानि हैल??41 ॥ भक्तवत्सल-महाप्रभुके निकट श्रीहरिदासके द्वारा स्वयंका उनके दासाभासके रूपमें वर्णन और अपने अभीष्टकी सिद्धिके विषयमें आशाबन्ध :- 'भकतवत्सल' तुमि, मुइ 'भक्ताभास'। अवश्य पूरिबे, प्रभु, मोर एइ आश ॥”42 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर उनसे कहा,—“आप अपनी मायाका विस्तार मत कीजिये। हे प्रभो! इस अधमपर आप यह दया अवश्य ही कीजिये। ऐसे करोड़ों महाशय हैं जो मेरे शिरोमणि हैं और वे आपकी लीलामें सहायता कर रहे हैं। मेरे जैसे एक कीटके मर जानेपर आपकी क्या हानि होगी? जैसे एक चींटीके मर जानेपर पृथ्वीकी कोई भी हानि नहीं होती। हे महाप्रभो! यद्यपि आप तो भक्तवत्सल हैं और मैं भक्तका आभासमात्र ही हूँ, तथापि मुझे यह पूर्ण आशा है कि आप मेरी इच्छाको अवश्य पूर्ण करेंगे॥”39-42 ॥ महाप्रभुका प्रस्थान और अगले दिन महाप्रभुके द्वारा आनेके विषयमें आश्वासन :- मध्याह करिते प्रभु चलिला आपने। ईश्वर देखिया कालि दिबेन दरशने ॥ 43 ॥ तबे महाप्रभु ताँरे करि' आलिङ्गन। मध्याह करिते समुद्रे करिला गमन ॥ 44 ॥ अनुवाद—मध्याह्न कृत्य करनेका समय हो जानेके कारण महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरसे कहा कि मैं कल भगवान् जगन्नाथके दर्शन करके आपके पास आऊँगा। तब उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरका आलिङ्गन किया और