भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2313

296 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/43-55 ] मध्याह्न कृत्य और स्नान करनेके लिये समुद्रकी ओर गमन किया ॥ 43-44 ॥ अगले दिन प्रातः भक्तोंके साथ श्रीजगन्नाथ-दर्शनके बाद श्रीहरिदासको दर्शन देनेके लिये महाप्रभुका आगमन :- प्रातःकाले ईश्वर देखि' सब भक्त लञा। हरिदासे देखिते आइला शीघ्र करिया ॥ 45 ॥ श्रीहरिदासके निर्याणका वर्णन, श्रीहरिदासके द्वारा भक्त और भगवान्‌के चरणोंकी वन्दना :- हरिदासेर आगे आसि' दिला दरशन। हरिदास वन्जिला प्रभुर आर वैष्णव-चरण ॥ 46 ॥ अनुवाद-अगले दिन प्रातःकालमें महाप्रभुने सब भक्तोंको अपने साथ लेकर भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन किया और फिर वे शीघ्रतासे श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलनेके लिये आ गये और उन्हें अपने दर्शन प्रदान किये। श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभु और समस्त वैष्णवोंके चरणोंकी वन्दना की ॥ 45-46 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासके कुशलकी जिज्ञासा; श्रीहरिदासके द्वारा गोलोक गमन करनेका प्रयास :- प्रभु कहे, - "हरिदास, कह समाचार।" हरिदास कहे, - "प्रभु, ये-आज्ञा तोमार ॥" 47 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - 'हे हरिदास ! सुनाओ, क्या समाचार है?" श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - "हे महाप्रभो ! जैसी आपकी आज्ञा हो ॥" 47 ॥ श्रीहरिदासकी कुटियाके सामने भक्तोंसहित महाप्रभुके द्वारा महाकीर्तन-आरम्भ :- अङ्गने आरम्भिला प्रभु महासङ्कीर्त्तन । वक्रेश्वर-पण्डित ताँहा करेन नर्त्तन ॥ 48 ॥ स्वरूप-गोसाञि आदि यत प्रभुर गण। हरिदासे बेड़ि' करे नाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 49 ॥ अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभुने वहीं आङ्गनमें महा-सङ्कीर्तन आरम्भ किया। श्रीवक्रेश्वर पण्डितने नृत्य आरम्भ किया। श्रीस्वरूप दामोदर आदि महाप्रभुके समस्त परिकर श्रीहरिदास ठाकुरको चारों ओरसे घेरकर नाम-सङ्कीर्तन करने लगे ॥ 48-49 ॥ सभीके सामने महाप्रभुके द्वारा महा-आनन्दसे भक्त श्रीहरिदासके गुणोंका वर्णन :- रामानन्द, सार्वभौम, सबार अग्रेते। हरिदासेर गुण प्रभु लागिला कहिते ॥ 50 ॥ हरिदासेर गुण कहिते हइला पञ्चमुख। कहिते कहिते प्रभुर बाड़े महासुख ॥ 51 ॥ सभी भक्तोंका विस्मय और श्रीहरिदासके चरणोंकी वन्दना :- हरिदासेर गुणे सबार विस्मित हय मन। सर्वभक्त वन्दे हरिदासेर चरण ॥ 52 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीरामानन्द राय तथा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य आदि समस्त भक्तोंके सामने श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंका वर्णन करने लगे। श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंका वर्णन करते समय महाप्रभु मानो पाँच मुखवाले हो गये अर्थात् जैसे पाँच मुखोंसे वर्णन कर रहे हों। जैसे वे गुणोंका गान करते जा रहे थे, वैसे उनकी प्रसन्नता बढ़ती जा रही थी। श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंको सुनकर सभी भक्त आश्चर्यचकित हो गये और वे सब श्रीहरिदास ठाकुरके चरणकमलोंकी वन्दना करने लगे ॥ 50-52 ॥ अपने सामने महाप्रभुका दर्शन और महाप्रभुके नामका कीर्तन करते-करते श्रीठाकुरका निर्याण या देहत्याग :- हरिदास निजाग्रेते प्रभुरे बसाइला। निज-नेत्र-दुइ भृङ्ग-मुखपद्मे दिला ॥ 53 ॥ स्व-हृदये आनि' धरि' प्रभुर चरण। सर्वभक्त-पदरेणु मस्तक-भूषण ॥ 54 ॥ 'श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु' बलेन बार बार। प्रभुमुख-माधुरी पिये, नेत्रे जलधार ॥ 55 ॥