भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2314

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[ 11/53-64 ग्यारहवाँ अध्याय 297 [बायाँ स्तम्भ] 'श्रीकृष्णचैतन्य'-शब्द करिते उच्चारण। नामेर सहित प्राण करिला उत्क्रमण॥ ५६॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुको प्रार्थना करके उन्हें अपने समक्ष बैठाया और उन्होंने अपने भ्रमररूपी दोनों नेत्रोंको महाप्रभुके मुखकमलपर स्थिर कर दिया। उन्होंने अपने हृदयमें महाप्रभुके चरणकमलोंको धारण किया और समस्त भक्तोंकी चरण-रजको लेकर अपने मस्तकके भूषणरूपमें धारण किया। वे पुनः पुनः 'श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु' नामका उच्चारण करने लगे। जैसे ही वे महाप्रभुके मुखकी माधुरीका पान करने लगे उनके नेत्रोंसे अश्रुऑकी धारा प्रवाहित होने लगी। उन्होंने 'श्रीकृष्णचैतन्य'-नाम उच्चारण करते हुए नामके साथ अपने प्राणोंको छोड़ दिया॥ ५३-५६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उत्क्रमण',—बाहर, निर्गमन (निकलना)॥ ५६॥ सभीके द्वारा द्वापरयुगके भीष्मकी इच्छा-मृत्युका स्मरण :— महायोगेश्वर-प्राय स्वच्छन्दे मरण। 'भीष्मेर निर्याण' सबार हइल स्मरण॥ ५७॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरके महा-योगेश्वरकी भाँति स्वेच्छामय देहत्यागको देखकर समस्त भक्तोंको श्रीभीष्म पितामहके निर्याणका स्मरण हो आया॥ ५७॥ अनुभाष्य—'भीष्मेर निर्याण',—भाः 1/9/29-43 संख्या देखें॥ ५७॥ महाकीर्तन-कोलाहल, महाप्रभुकी प्रेम-विह्वलता :— 'हरि' 'कृष्ण'-शब्दे सबे करे कोलाहल। प्रेमानन्दे महाप्रभु हइला विह्वल॥ ५८॥ गोदमें श्रीहरिदासकी अप्राकृत देहको लेकर महाप्रभुके द्वारा नृत्य :— हरिदासेर तनु प्रभु कोले उठाइा। अङ्गने नाचेन प्रभु प्रेमाविष्ट हञा॥ ५९॥ [दायाँ स्तम्भ] सभीके द्वारा प्रेमावेशमें कीर्तन और नृत्य :— प्रभुर आवेशे अवश सर्वभक्तगण। प्रेमावेशे सबे नाचे, करेन कीर्त्तन॥ ६०॥ अनुवाद—सभी भक्त लोग 'हरि', 'कृष्ण' बोलकर उच्च स्वरसे कीर्तन करने लगे। महाप्रभु प्रेमानन्दमें विह्वल हो उठे। उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरकी देहको अपनी गोदमें उठा लिया और प्रेमाविष्ट होकर आङ्गनमें नृत्य करने लगे। महाप्रभुके आवेशके कारण सभी भक्त भी अपनेको वशमें नहीं रख सके और वे भी कीर्तन तथा प्रेमावेशमें नृत्य करने लगे॥ ५८-६०॥ एइमते नृत्य प्रभु कैला कतक्षण। स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे कैला निवेदन॥ ६१॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुके द्वारा कीर्तन करते हुए ठाकुर श्रीहरिदासको समुद्रतटपर लाना :— हरिदास-ठाकुरे तबे विमाने चड़ाइा। समुद्रे लञा गेला कीर्त्तन करिया॥ ६२॥ अनुवाद—इसी प्रकार महाप्रभुने कुछ देर तक नृत्य किया और तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुको कुछ निवेदन किया। उनकी बात सुनकर तब महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरको रथपर चढ़ाकर कीर्तन करते हुए समुद्रके तटपर ले गये॥ ६१-६२॥ आगे महाप्रभु चलेन नृत्य करिते करिते। पाछे नृत्य करे वक्रेश्वर भक्तगण-साथे॥ ६३॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरकी अन्तिम-यात्राके समय महाप्रभु नृत्य करते-करते उनसे आगे चल रहे थे और श्रीहरिदास ठाकुरके पीछे श्रीवक्रेश्वर पण्डित भक्तोंके साथ नृत्य करते हुए चल रहे थे॥ ६३॥ श्रीहरिदासको समुद्रमें स्नान कराना, उस समय उनके स्पर्शसे समुद्रका 'महातीर्थ' बनना :— हरिदासे समुद्र-जले स्नान कराइला। प्रभु कहे,—"समुद्र एइ 'महातीर्थ' हइला॥" ६४॥