भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2315, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2315

298 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/64-73 ] अनुवाद—महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरको समुद्रके जलमें स्नान कराया और कहा,—“आजसे यह समुद्र 'महातीर्थ' बन गया है॥”64॥ भक्तोंके द्वारा श्रीहरिदासके अप्राकृत शरीरके चरणोंके जलका पान :— हरिदासेर पादोदक पिये भक्तगण। हरिदासेर अङ्गे दिला प्रसाद-चन्दन॥65॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने श्रीहरिदास ठाकुरका चरणामृत पान किया और श्रीहरिदास ठाकुरके अङ्गोंपर भगवान् श्रीजगन्नाथदेवका प्रसादी चन्दन लगाया॥65॥ कीर्तन करते हुए समाधि-प्रदान करनेकी रीति :— डोर, कड़ार, प्रसाद, वस्त्र अङ्गे दिला। बालुकार गर्त्त करि' ताहे शोयाइला॥66॥ अनुवाद—बालूमें गड़ढा बनाकर उसमें श्रीहरिदास ठाकुरको बैठा दिया। भगवान् श्रीजगन्नाथदेवकी प्रसादी रेशमी-डोर, प्रसादी चन्दन, प्रसाद और वस्त्र आदि उनके शरीरके ऊपर रखे गये॥66॥ अनुभाष्य—'डोर',—श्रीजगन्नाथकी प्रसादी रेशमी-डोरी; 'कड़ार',—प्रसादी चन्दन॥66॥ भक्तोंके द्वारा कीर्तन और नृत्य :— चारिदिके भक्तगण करेन कीर्त्तन। वक्रेश्वर-पण्डित करेन आनन्दे नर्त्तन॥67॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरकी देहके चारों ओर भक्त कीर्तन करने लगे और श्रीवक्रेश्वर पण्डित आनन्दपूर्वक नृत्य करने लगे॥67॥ महाप्रभुके द्वारा अपने श्रीकरकमलोंसे श्रीठाकुरको समाधि देना :— 'हरिबोल' 'हरिबोल' बलेन गौरराय। आपनि श्रीहस्ते बालु दिला ताँर गाय॥68॥ अनुवाद—श्रीगौररायने हरिबोल, हरिबोल बोलते हुए स्वयं अपने श्रीकरकमलोंसे श्रीहरिदास ठाकुरके दिव्य कलेवरपर बालू दी॥68॥ समाधि-पीठका निर्माण :— ताँरे बालु दिया उपरे पिण्डा बाँधाइला। चौदिके पिण्डेर महा-आवरण कैला॥69॥ अनुवाद—महाप्रभुने अन्य-अन्य भक्तोंके द्वारा भी श्रीहरिदास ठाकुरकी देहपर बालू दिलवाकर उसे ढककर उसके ऊपर बेदी अथवा चबूतरा बनवा दिया। फिर उस चबूतरेके चारों ओर बाढ़ लगवा दी॥69॥ भक्तोंके साथ कीर्त्तन-नृत्यके बाद समुद्र-स्नान करनेके बाद समाधि-पीठकी परिक्रमा करके मन्दिरमें आना :— तबे महाप्रभु कैला कीर्त्तन, नर्त्तन। हरिध्वनि-कोलाहले भरिल भुवन॥70॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने कीर्तन और नृत्य करना प्रारम्भ किया। सभीके द्वारा की जानेवाली उच्च हरिध्वनिसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गुञ्जायमान हो उठा॥70॥ तबे महाप्रभु सब भक्तगण-सङ्गे। समुद्रे करिला स्नान जलकेलि रङ्गे॥71॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंके साथ समुद्रमें आनन्दपूर्वक जलकेलि करते हुए स्नान किया॥71॥ हरिदासे प्रदक्षिण करि' आइल सिंहद्वारे। हरिकीर्त्तन-कोलाहल सकल नगरे॥72॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरकी समाधिकी परिक्रमा करके सिंहद्वारपर आ गये। सम्पूर्ण श्रीजगन्नाथ पुरीमें उच्च स्वरसे हरिकीर्तन होने लगा॥72॥ श्रीहरिदासके विरह-महोत्सवके उद्देश्यसे सिंहद्वारपर दुकानदारोंसे स्वयं महाप्रभुके द्वारा प्रसादकी भिक्षा :— सिंहद्वारे आसि' प्रभु पसारिर ठाँइ। आँचल पातिया प्रसाद मागिला तथाइ॥73॥

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