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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2316

[ 11/73-82 ग्यारहवाँ अध्याय 299

“हरिदास-ठाकुरेर महोत्सवेर तरे। प्रसाद मागिये भिक्षा देह त' आमारे॥” 74 ॥

अनुवाद—महाप्रभुने सिंहद्वारपर आकर पंसारियोंसे आँचल फैलाकर प्रसादकी भिक्षा माँगनी प्रारम्भ कर दी,—“मैं हरिदास ठाकुरके महोत्सवके आयोजन हेतु आप लोगोंसे प्रसादकी भिक्षा माँग रहा हूँ, आप लोग कृपा करके मुझे भिक्षा प्रदान कीजिये॥” 73-74 ॥

दुकानदारोंके द्वारा सम्पूर्ण प्रसाद देनेकी इच्छा :— शुनिया पसारि सब चाङ्गड़ा उठाञा। प्रसाद दिते आसे तारा आनन्दित हञा॥ 75 ॥

अनुवाद—यह सुनकर सब पंसारी लोग प्रसादकी बड़ी-बड़ी टोकरियोंको उठाकर आनन्दपूर्वक देनेके लिये आये॥ 75 ॥

अनुभाष्य—'चाङ्गड़ा',—बड़ी टोकरी॥ 75 ॥

श्रीस्वरूपके द्वारा उन्हें मना करना :— स्वरूप-गोसाञि पसारिके निषेधिल। चाङ्गड़ा लञा पसारि पसारे बसिल॥ 76 ॥

अनुवाद—किन्तु श्रीस्वरूप दामोदरने पंसारियोंको इसके लिये निषेध किया। पंसारी उन टोकरियोंको लेकर पुनः अपनी दुकानोंपर बैठ गये॥ 76 ॥

महाप्रभुको घर भेजकर स्वयं श्रीस्वरूपके द्वारा महोत्सवके कार्यभारको अपने हाथोंमें लेना :— स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे घर पाठाइला। चारि-वैष्णव, चारि पिछाड़ा सङ्गे राखिला॥ 77 ॥

अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुको उनके वासस्थानमें भेज दिया और उन्होंने अपने साथ चार वैष्णवों तथा बोझा उठानेवाले चार व्यक्तियोंको रख लिया॥ 77 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'पिछाड़ा',—पीछे चलनेवाले लोग (मतान्तरमें 'झुड़ि' अथवा 'झोला',—79 संख्या देखें)॥ 77 ॥

स्वरूप-गोसाञि कहिलेन सब पसारिरे।” “एक एक द्रव्येर एक एक पुआ देह' मोरे॥” 78 ॥

अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने समस्त पंसारियोंको कहा,—“आप सभी मुझे प्रत्येक वस्तुमें-से उसका चौथाई भाग प्रसाद दे दीजिये॥” 78 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'पुआ',—चार-चार करके एक भाग॥ 78 ॥

प्रचुर प्रसादका संग्रह :— एइमते नानाप्रसाद बोझा बान्धाञा। लञा आइला चारि-जनेर मस्तके चड़ाञा॥ 79 ॥

अनुवाद—इस प्रकार श्रीस्वरूप दामोदरने अनेक प्रकारके प्रसाद द्रव्योंको एकत्रित करके बँधवा लिया और उसे चार व्यक्तियोंके सिरपर रखवाकर ले आये॥ 79 ॥

श्रीवाणीनाथ और श्रीकाशीमिश्रके द्वारा प्रसादका संग्रह :— वाणीनाथ-पट्टनायक प्रसाद आनिला। काशीमिश्र अनेक प्रसाद पाठाइला॥ 80 ॥

अनुवाद—श्रीवाणीनाथ पट्टनायक भी प्रसाद लेकर आये और श्रीकाशीमिश्रने भी बहुत-सा प्रसाद भेजा॥ 80 ॥

विरह-महोत्सवमें वैष्णवोंको महाप्रभुके द्वारा अपने श्रीहस्तसे प्रचुर प्रसाद बाँटना :— सब वैष्णवे प्रभु बसाइला सारि सारि। आपने परिवेशे प्रभु लञा जना चारि॥ 81 ॥

अनुवाद—महाप्रभुने समस्त वैष्णवोंको पंक्तिमें बैठाया और वे स्वयं चार लोगोंको अपने साथ लेकर प्रसाद वितरण करने लगे॥ 81 ॥

महाप्रभुर श्रीहस्ते अल्प ना आइसे। एक एक पाते पञ्चजनार भक्ष्य परिवेशे॥ 82 ॥

अनुवाद—महाप्रभुके हाथमें प्रसाद अल्प मात्रामें