श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2317, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें300 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/82-92 ] नहीं आ रहा था, वे तो एक-एक व्यक्तिके पत्तलमें पाँच व्यक्तियोंके खाने योग्य प्रसाद दे रहे थे॥82॥ महाप्रभुको मना करके श्रीस्वरूपका तीन भक्तोंके साथ प्रसाद वितरण करना :- स्वरूप कहे,—“प्रभु, बसि' करह दर्शन। आमि इँहा-सबा लञा करि परिवेश्न॥"83॥ अनुवाद- श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, — "हे महाप्रभो! आप कृपा बैठकर देखिये। मैं इन सभीको लेकर प्रसाद परोसता हूँ॥" 83॥ स्वरूप, जगदानन्द, काशीश्वर, शङ्कर। चारिजन परिवेश्न करे निरन्तर ॥ 84 ॥ अनुवाद- श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीकाशीश्वर पण्डित और श्रीशङ्कर पण्डित-ये चारों जन निरन्तर प्रसाद परोसने लगे ॥ 84 ॥ भक्तोंके द्वारा महाप्रभुके भोजनकी अपेक्षा, महाप्रभुको काशीमिश्रके द्वारा प्रसाद-भिक्षा-प्रदान :- प्रभु ना खाइले केह ना करे भोजन। प्रभुरे से दिने काशीमिश्रेर निमन्त्रण ॥ 85 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके नहीं खानेके कारण किसीने भी खाना आरम्भ नहीं किया। महाप्रभुने इसलिये नहीं खाया, क्योंकि उस दिन उनका श्रीकाशीमिश्रके घरमें निमन्त्रण था॥ 85॥ आपने काशीमिश्र आइला प्रसाद लञा। प्रभुरे भिक्षा कराइला आग्रह करिया ॥ 86 ॥ अनुवाद—इसलिये श्रीकाशीमिश्र स्वयं महाप्रभुके लिये प्रसाद लेकर आये और आग्रहपूर्वक महाप्रभुको भोजन कराया ॥ 86 ॥ संन्यासियोंके साथ महाप्रभुके द्वारा प्रसादका सम्मान :- पुरी-भारतीर सङ्गे प्रभु भिक्षा कैला। सकल वैष्णव तबे भोजन करिला ॥ 87 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारतीके साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करना आरम्भ किया, तब समस्त वैष्णवोंने भी भोजन करना प्रारम्भ किया ॥ 87 ॥ सभी भक्तोंको गले तक भरकर भोजन कराना :- आकण्ठ पूराञा सबाय कराइला भोजन। 'देह' देह' बलि' प्रभु बलेन वचन ॥ 88 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने सभीको गले तक भरकर भोजन कराया, क्योंकि वे प्रसाद-वितरण करनेवाले भक्तोंको कहते रहे कि भक्तोंको और प्रसाद दो, और प्रसाद दो ॥ 88 ॥ सभीको आचमन करनेके बाद महाप्रभुके द्वारा माला और चन्दन पहनाना :- भोजन करिया सबे कैला आचमन। सबारे पराइला प्रभु माल्य-चन्दन ॥ 89 ॥ अनुवाद-जब सभी भक्तोंने भोजन करनेके बाद आचमन कर लिया, तब महाप्रभुने सभीको माला पहनाकर चन्दन लगाया ॥ 89 ॥ प्रेमके आवेशमें महाप्रभुके द्वारा भक्तोंको वरदान देना :- प्रेमाविष्ट हञा प्रभु करेन वर-दान। शुनि' भक्तगणेर जुड़ाय मनस्काम ॥ 90 ॥ अनुवाद—प्रेमाविष्ट होकर महाप्रभुने भक्तोंको वरदान दिया जिसे सुनकर भक्त अपनी मनोवाञ्छा पूर्ण होनेसे सन्तुष्ट हो गये॥ 90 ॥ श्रीहरिदासके विरहोत्सवमें जिस-किसी भी प्रकारसे योगदान करनेवालेको श्रीकृष्णप्राप्तिका वर-लाभ :- "हरिदासेर विजयोत्सव ये कैल दर्शन। ये इँहा नृत्य कैल, ये कैल कीर्त्तन ॥ 91 ॥ ये ताँरे बालुका दिते करिल गमन। तार मध्ये महोत्सवे ये कैल भोजन ॥ 92 ॥