भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2318

[ 11/91-101 ग्यारहवाँ अध्याय 301 अचिरे सबाकार हवे 'कृष्णप्राप्ति'। हरिदास-दरशने हय ऐछे 'शक्ति' ॥ 93 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “जिसने भी हरिदास ठाकुरके विजयोत्सवका दर्शन किया है, जिसने उसमें नृत्य और कीर्तन किया है, जिसने हरिदास ठाकुरकी समाधिपर बालू दिया है और जिसने इस महोत्सवमें प्रसाद ग्रहण किया है, उन सभीको अतिशीघ्र श्रीकृष्णकी प्राप्ति होगी। हरिदास ठाकुरके दर्शनमें ऐसी शक्ति है॥ 91-93 ॥ अनुभाष्य— 'विजयोत्सव', — विरह-महोत्सव ॥ 91 ॥ प्रियभक्तके विरहमें भगवान्‌की विलाप-उक्ति :- कृपा करि' कृष्ण मोरे दियाछिला सङ्ग। स्वतन्त्र कृष्णेर इच्छा, —कैला सङ्ग-भङ्ग ॥ 94 ॥ अनुवाद—कृष्णने कृपा करके मुझे हरिदास ठाकुरका सङ्ग प्रदान किया था। किन्तु कृष्णकी इच्छा स्वतन्त्र होनेके कारण उन्होंने अब मेरा वह सङ्ग भङ्ग कर दिया है॥ 94 ॥ हरिदासेर इच्छा यबे हइल चलिते। आमार शकति ताँरे नारिल राखिते ॥ 95 ॥ इच्छामात्रे कैला निजप्राण निष्क्रामण। पूर्वे येन शुनियाछि भीष्मेर मरण ॥ 96 ॥ अनुवाद—जब हरिदास ठाकुरकी इस जगत्‌से जानेकी इच्छा हुई, तब उन्हें रोकना मेरे बसमें नहीं था। उन्होंने अपने प्राणोंको अपनी इच्छामात्रसे ऐसे छोड़ दिया, जैसे हमने पूर्वकालमें भीष्म पितामहके शरीर त्यागनेके विषयमें सुना है ॥ 95-96 ॥ ठाकुर-श्रीहरिदासके गुणोंका वर्णन :- हरिदास आछिल पृथिवीर 'शिरोमणि'। ताहा बिना रत्न-शून्या हइल मेदिनी ॥ 97 ॥ अनुवाद—हरिदास ठाकुर पृथिवीके शीशपर विराजित सर्वोत्तम मणि स्वरूप थे, उनके बिना यह पृथवी अपने उस रत्नसे शून्य हो गयी है॥ 97 ॥ श्रीहरिदासकी जयध्वनि और महाप्रभुके द्वारा नृत्य :- 'जय जय हरिदास' बलि' कर हरिध्वनि।” एत बलि' महाप्रभु नाचेन आपनि ॥ 98 ॥ अनुवाद—आप सभी हरिदासकी जयध्वनि कीजिये और हरिनामका कीर्तन कीजिये।” यह कहकर महाप्रभु स्वयं नृत्य करने लगे ॥ 98 ॥ सबे गाय, — “जय जय जय हरिदास। नामेर महिमा यँह करिला प्रकाश ॥”99 ॥ अनुवाद—सभी भक्त गान करने लगे, — “श्रीहरिदास ठाकुरकी जय हो, जय हो, जय हो, जिन्होंने कृष्णनामकी महिमाको जगत्‌में प्रकाशित किया है ॥”99 ॥ भक्तोंको विदायी देना और भक्त (श्रीहरिदास)के विरह और विजय (देहत्याग) -ऐश्वर्यको देखकर हर्ष और विषादके साथ महाप्रभुका विश्राम :- तबे महाप्रभु सब भक्ते विदाय दिला। हर्ष-विषादे प्रभु विश्राम करिला ॥ 100 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको विदायी दी और स्वयं उन्होंने हर्ष एवं विषादके मिश्रित भावोंके साथ विश्राम किया ॥ 100 ॥ भक्तश्रेष्ठ नामाचार्य श्रीहरिदासके तिरोभावके वृत्तान्तको सुननेसे श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :- एइ त' कहिलुँ हरिदासेर विजय। याहार श्रवणे कृष्णे दृढ़भक्ति हय ॥ 101 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने श्रीहरिदास ठाकुरके विजयोत्सवका वर्णन किया है। जो भी इसे सुनता है उसे भगवान् श्रीकृष्णमें दृढ़भक्ति होती है ॥ 101 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'हरिदासेर विजय', —श्रीपुरुषोत्तम-