श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 11/33-44 ग्यारहवाँ अध्याय 295 जिह्वाय उच्चारिमु तोमार 'कृष्णचैतन्य'-नाम। एइमत मोर इच्छा,-छाड़िमु पराण ॥ 34 ॥ मोर एइ इच्छा यदि तोमार प्रसादे हय। एइ निवेदन मोर कर, दयामय ॥ 35 ॥ एइ नीच देह मोर पड़ुक तव आगे। एइ वाञ्छा-सिद्धि मोर तोमाते लागे ॥”36 ॥ अनुवाद—मैं अपने हृदयमें आपके चरणकमलोंको धारण करूँ, अपने नेत्रोंसे आपके चन्द्र जैसे मुखका दर्शन करूँ और मैं अपनी जिह्वासे आपके 'कृष्णचैतन्य'-नामका उच्चारण करूँ—मैं ऐसे करते हुए देहत्याग करूँ, मेरी ऐसी इच्छा है। आपकी कृपासे मेरी यह वाञ्छा पूर्ण हो सकती है। हे दयामय! आप मेरे इस निवेदनको स्वीकार कीजिये। मेरी यह नीच देह आपके सामने ही छूट जाय, मेरी यह वाञ्छासिद्धि आपके द्वारा ही हो सकती है॥”33-36 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासकी इच्छा पूर्ण करना :- प्रभु कहे,—“हरिदास, ये तुमि मागिबे। कृष्ण कृपामय ताहा अवश्य करिबे ॥ 37 ॥ लीला-परिकरके विच्छेदके स्मरणसे महाप्रभुके अति मर्मस्पर्शी और करुण वचन :- किन्तु आमार ये किछु सुख, सब तोमा लञा। तोमार योग्य নহে,-याबे आमारे छाड़िया ॥”38 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे हरिदास! आप जो कुछ भी माँगोगे, कृपामय कृष्ण आपकी इच्छाको अवश्य ही पूर्ण करेंगे। किन्तु मेरा जो कुछ सुख है, वह सब आपके सङ्गके कारण ही है। आपके लिये मुझे इस प्रकारसे छोड़कर जाना उचित नहीं है॥”37-38 ॥ श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुकी निष्कपट कृपाकी याचना :- चरणे धरि' कहे हरिदास,—“ना करिह 'माया'। अवश्य मो-अधमे, प्रभु, कर एइ 'दया' ॥ 39 ॥ पुनः दैन्यपूर्ण उक्ति :- मोर शिरोमणि कत कत महाशय। तोमार लीलार सहाय कोटिभक्त हय ॥ 40 ॥ आमा-हेन यदि एक कीट मरि' गेल। पिपीलिका मैले पृथिवीर काँहा हानि हैल??41 ॥ भक्तवत्सल-महाप्रभुके निकट श्रीहरिदासके द्वारा स्वयंका उनके दासाभासके रूपमें वर्णन और अपने अभीष्टकी सिद्धिके विषयमें आशाबन्ध :- 'भकतवत्सल' तुमि, मुइ 'भक्ताभास'। अवश्य पूरिबे, प्रभु, मोर एइ आश ॥”42 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर उनसे कहा,—“आप अपनी मायाका विस्तार मत कीजिये। हे प्रभो! इस अधमपर आप यह दया अवश्य ही कीजिये। ऐसे करोड़ों महाशय हैं जो मेरे शिरोमणि हैं और वे आपकी लीलामें सहायता कर रहे हैं। मेरे जैसे एक कीटके मर जानेपर आपकी क्या हानि होगी? जैसे एक चींटीके मर जानेपर पृथ्वीकी कोई भी हानि नहीं होती। हे महाप्रभो! यद्यपि आप तो भक्तवत्सल हैं और मैं भक्तका आभासमात्र ही हूँ, तथापि मुझे यह पूर्ण आशा है कि आप मेरी इच्छाको अवश्य पूर्ण करेंगे॥”39-42 ॥ महाप्रभुका प्रस्थान और अगले दिन महाप्रभुके द्वारा आनेके विषयमें आश्वासन :- मध्याह करिते प्रभु चलिला आपने। ईश्वर देखिया कालि दिबेन दरशने ॥ 43 ॥ तबे महाप्रभु ताँरे करि' आलिङ्गन। मध्याह करिते समुद्रे करिला गमन ॥ 44 ॥ अनुवाद—मध्याह्न कृत्य करनेका समय हो जानेके कारण महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरसे कहा कि मैं कल भगवान् जगन्नाथके दर्शन करके आपके पास आऊँगा। तब उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरका आलिङ्गन किया और
296 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/43-55 ] मध्याह्न कृत्य और स्नान करनेके लिये समुद्रकी ओर गमन किया ॥ 43-44 ॥ अगले दिन प्रातः भक्तोंके साथ श्रीजगन्नाथ-दर्शनके बाद श्रीहरिदासको दर्शन देनेके लिये महाप्रभुका आगमन :- प्रातःकाले ईश्वर देखि' सब भक्त लञा। हरिदासे देखिते आइला शीघ्र करिया ॥ 45 ॥ श्रीहरिदासके निर्याणका वर्णन, श्रीहरिदासके द्वारा भक्त और भगवान्के चरणोंकी वन्दना :- हरिदासेर आगे आसि' दिला दरशन। हरिदास वन्जिला प्रभुर आर वैष्णव-चरण ॥ 46 ॥ अनुवाद-अगले दिन प्रातःकालमें महाप्रभुने सब भक्तोंको अपने साथ लेकर भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन किया और फिर वे शीघ्रतासे श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलनेके लिये आ गये और उन्हें अपने दर्शन प्रदान किये। श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभु और समस्त वैष्णवोंके चरणोंकी वन्दना की ॥ 45-46 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासके कुशलकी जिज्ञासा; श्रीहरिदासके द्वारा गोलोक गमन करनेका प्रयास :- प्रभु कहे, - "हरिदास, कह समाचार।" हरिदास कहे, - "प्रभु, ये-आज्ञा तोमार ॥" 47 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - 'हे हरिदास ! सुनाओ, क्या समाचार है?" श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - "हे महाप्रभो ! जैसी आपकी आज्ञा हो ॥" 47 ॥ श्रीहरिदासकी कुटियाके सामने भक्तोंसहित महाप्रभुके द्वारा महाकीर्तन-आरम्भ :- अङ्गने आरम्भिला प्रभु महासङ्कीर्त्तन । वक्रेश्वर-पण्डित ताँहा करेन नर्त्तन ॥ 48 ॥ स्वरूप-गोसाञि आदि यत प्रभुर गण। हरिदासे बेड़ि' करे नाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 49 ॥ अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभुने वहीं आङ्गनमें महा-सङ्कीर्तन आरम्भ किया। श्रीवक्रेश्वर पण्डितने नृत्य आरम्भ किया। श्रीस्वरूप दामोदर आदि महाप्रभुके समस्त परिकर श्रीहरिदास ठाकुरको चारों ओरसे घेरकर नाम-सङ्कीर्तन करने लगे ॥ 48-49 ॥ सभीके सामने महाप्रभुके द्वारा महा-आनन्दसे भक्त श्रीहरिदासके गुणोंका वर्णन :- रामानन्द, सार्वभौम, सबार अग्रेते। हरिदासेर गुण प्रभु लागिला कहिते ॥ 50 ॥ हरिदासेर गुण कहिते हइला पञ्चमुख। कहिते कहिते प्रभुर बाड़े महासुख ॥ 51 ॥ सभी भक्तोंका विस्मय और श्रीहरिदासके चरणोंकी वन्दना :- हरिदासेर गुणे सबार विस्मित हय मन। सर्वभक्त वन्दे हरिदासेर चरण ॥ 52 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीरामानन्द राय तथा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य आदि समस्त भक्तोंके सामने श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंका वर्णन करने लगे। श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंका वर्णन करते समय महाप्रभु मानो पाँच मुखवाले हो गये अर्थात् जैसे पाँच मुखोंसे वर्णन कर रहे हों। जैसे वे गुणोंका गान करते जा रहे थे, वैसे उनकी प्रसन्नता बढ़ती जा रही थी। श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंको सुनकर सभी भक्त आश्चर्यचकित हो गये और वे सब श्रीहरिदास ठाकुरके चरणकमलोंकी वन्दना करने लगे ॥ 50-52 ॥ अपने सामने महाप्रभुका दर्शन और महाप्रभुके नामका कीर्तन करते-करते श्रीठाकुरका निर्याण या देहत्याग :- हरिदास निजाग्रेते प्रभुरे बसाइला। निज-नेत्र-दुइ भृङ्ग-मुखपद्मे दिला ॥ 53 ॥ स्व-हृदये आनि' धरि' प्रभुर चरण। सर्वभक्त-पदरेणु मस्तक-भूषण ॥ 54 ॥ 'श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु' बलेन बार बार। प्रभुमुख-माधुरी पिये, नेत्रे जलधार ॥ 55 ॥
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[ 11/53-64 ग्यारहवाँ अध्याय 297 [बायाँ स्तम्भ] 'श्रीकृष्णचैतन्य'-शब्द करिते उच्चारण। नामेर सहित प्राण करिला उत्क्रमण॥ ५६॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुको प्रार्थना करके उन्हें अपने समक्ष बैठाया और उन्होंने अपने भ्रमररूपी दोनों नेत्रोंको महाप्रभुके मुखकमलपर स्थिर कर दिया। उन्होंने अपने हृदयमें महाप्रभुके चरणकमलोंको धारण किया और समस्त भक्तोंकी चरण-रजको लेकर अपने मस्तकके भूषणरूपमें धारण किया। वे पुनः पुनः 'श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु' नामका उच्चारण करने लगे। जैसे ही वे महाप्रभुके मुखकी माधुरीका पान करने लगे उनके नेत्रोंसे अश्रुऑकी धारा प्रवाहित होने लगी। उन्होंने 'श्रीकृष्णचैतन्य'-नाम उच्चारण करते हुए नामके साथ अपने प्राणोंको छोड़ दिया॥ ५३-५६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उत्क्रमण',—बाहर, निर्गमन (निकलना)॥ ५६॥ सभीके द्वारा द्वापरयुगके भीष्मकी इच्छा-मृत्युका स्मरण :— महायोगेश्वर-प्राय स्वच्छन्दे मरण। 'भीष्मेर निर्याण' सबार हइल स्मरण॥ ५७॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरके महा-योगेश्वरकी भाँति स्वेच्छामय देहत्यागको देखकर समस्त भक्तोंको श्रीभीष्म पितामहके निर्याणका स्मरण हो आया॥ ५७॥ अनुभाष्य—'भीष्मेर निर्याण',—भाः 1/9/29-43 संख्या देखें॥ ५७॥ महाकीर्तन-कोलाहल, महाप्रभुकी प्रेम-विह्वलता :— 'हरि' 'कृष्ण'-शब्दे सबे करे कोलाहल। प्रेमानन्दे महाप्रभु हइला विह्वल॥ ५८॥ गोदमें श्रीहरिदासकी अप्राकृत देहको लेकर महाप्रभुके द्वारा नृत्य :— हरिदासेर तनु प्रभु कोले उठाइा। अङ्गने नाचेन प्रभु प्रेमाविष्ट हञा॥ ५९॥ [दायाँ स्तम्भ] सभीके द्वारा प्रेमावेशमें कीर्तन और नृत्य :— प्रभुर आवेशे अवश सर्वभक्तगण। प्रेमावेशे सबे नाचे, करेन कीर्त्तन॥ ६०॥ अनुवाद—सभी भक्त लोग 'हरि', 'कृष्ण' बोलकर उच्च स्वरसे कीर्तन करने लगे। महाप्रभु प्रेमानन्दमें विह्वल हो उठे। उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरकी देहको अपनी गोदमें उठा लिया और प्रेमाविष्ट होकर आङ्गनमें नृत्य करने लगे। महाप्रभुके आवेशके कारण सभी भक्त भी अपनेको वशमें नहीं रख सके और वे भी कीर्तन तथा प्रेमावेशमें नृत्य करने लगे॥ ५८-६०॥ एइमते नृत्य प्रभु कैला कतक्षण। स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे कैला निवेदन॥ ६१॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुके द्वारा कीर्तन करते हुए ठाकुर श्रीहरिदासको समुद्रतटपर लाना :— हरिदास-ठाकुरे तबे विमाने चड़ाइा। समुद्रे लञा गेला कीर्त्तन करिया॥ ६२॥ अनुवाद—इसी प्रकार महाप्रभुने कुछ देर तक नृत्य किया और तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुको कुछ निवेदन किया। उनकी बात सुनकर तब महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरको रथपर चढ़ाकर कीर्तन करते हुए समुद्रके तटपर ले गये॥ ६१-६२॥ आगे महाप्रभु चलेन नृत्य करिते करिते। पाछे नृत्य करे वक्रेश्वर भक्तगण-साथे॥ ६३॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरकी अन्तिम-यात्राके समय महाप्रभु नृत्य करते-करते उनसे आगे चल रहे थे और श्रीहरिदास ठाकुरके पीछे श्रीवक्रेश्वर पण्डित भक्तोंके साथ नृत्य करते हुए चल रहे थे॥ ६३॥ श्रीहरिदासको समुद्रमें स्नान कराना, उस समय उनके स्पर्शसे समुद्रका 'महातीर्थ' बनना :— हरिदासे समुद्र-जले स्नान कराइला। प्रभु कहे,—"समुद्र एइ 'महातीर्थ' हइला॥" ६४॥
298 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/64-73 ] अनुवाद—महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरको समुद्रके जलमें स्नान कराया और कहा,—“आजसे यह समुद्र 'महातीर्थ' बन गया है॥”64॥ भक्तोंके द्वारा श्रीहरिदासके अप्राकृत शरीरके चरणोंके जलका पान :— हरिदासेर पादोदक पिये भक्तगण। हरिदासेर अङ्गे दिला प्रसाद-चन्दन॥65॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने श्रीहरिदास ठाकुरका चरणामृत पान किया और श्रीहरिदास ठाकुरके अङ्गोंपर भगवान् श्रीजगन्नाथदेवका प्रसादी चन्दन लगाया॥65॥ कीर्तन करते हुए समाधि-प्रदान करनेकी रीति :— डोर, कड़ार, प्रसाद, वस्त्र अङ्गे दिला। बालुकार गर्त्त करि' ताहे शोयाइला॥66॥ अनुवाद—बालूमें गड़ढा बनाकर उसमें श्रीहरिदास ठाकुरको बैठा दिया। भगवान् श्रीजगन्नाथदेवकी प्रसादी रेशमी-डोर, प्रसादी चन्दन, प्रसाद और वस्त्र आदि उनके शरीरके ऊपर रखे गये॥66॥ अनुभाष्य—'डोर',—श्रीजगन्नाथकी प्रसादी रेशमी-डोरी; 'कड़ार',—प्रसादी चन्दन॥66॥ भक्तोंके द्वारा कीर्तन और नृत्य :— चारिदिके भक्तगण करेन कीर्त्तन। वक्रेश्वर-पण्डित करेन आनन्दे नर्त्तन॥67॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरकी देहके चारों ओर भक्त कीर्तन करने लगे और श्रीवक्रेश्वर पण्डित आनन्दपूर्वक नृत्य करने लगे॥67॥ महाप्रभुके द्वारा अपने श्रीकरकमलोंसे श्रीठाकुरको समाधि देना :— 'हरिबोल' 'हरिबोल' बलेन गौरराय। आपनि श्रीहस्ते बालु दिला ताँर गाय॥68॥ अनुवाद—श्रीगौररायने हरिबोल, हरिबोल बोलते हुए स्वयं अपने श्रीकरकमलोंसे श्रीहरिदास ठाकुरके दिव्य कलेवरपर बालू दी॥68॥ समाधि-पीठका निर्माण :— ताँरे बालु दिया उपरे पिण्डा बाँधाइला। चौदिके पिण्डेर महा-आवरण कैला॥69॥ अनुवाद—महाप्रभुने अन्य-अन्य भक्तोंके द्वारा भी श्रीहरिदास ठाकुरकी देहपर बालू दिलवाकर उसे ढककर उसके ऊपर बेदी अथवा चबूतरा बनवा दिया। फिर उस चबूतरेके चारों ओर बाढ़ लगवा दी॥69॥ भक्तोंके साथ कीर्त्तन-नृत्यके बाद समुद्र-स्नान करनेके बाद समाधि-पीठकी परिक्रमा करके मन्दिरमें आना :— तबे महाप्रभु कैला कीर्त्तन, नर्त्तन। हरिध्वनि-कोलाहले भरिल भुवन॥70॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने कीर्तन और नृत्य करना प्रारम्भ किया। सभीके द्वारा की जानेवाली उच्च हरिध्वनिसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गुञ्जायमान हो उठा॥70॥ तबे महाप्रभु सब भक्तगण-सङ्गे। समुद्रे करिला स्नान जलकेलि रङ्गे॥71॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंके साथ समुद्रमें आनन्दपूर्वक जलकेलि करते हुए स्नान किया॥71॥ हरिदासे प्रदक्षिण करि' आइल सिंहद्वारे। हरिकीर्त्तन-कोलाहल सकल नगरे॥72॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरकी समाधिकी परिक्रमा करके सिंहद्वारपर आ गये। सम्पूर्ण श्रीजगन्नाथ पुरीमें उच्च स्वरसे हरिकीर्तन होने लगा॥72॥ श्रीहरिदासके विरह-महोत्सवके उद्देश्यसे सिंहद्वारपर दुकानदारोंसे स्वयं महाप्रभुके द्वारा प्रसादकी भिक्षा :— सिंहद्वारे आसि' प्रभु पसारिर ठाँइ। आँचल पातिया प्रसाद मागिला तथाइ॥73॥
[ 11/73-82 ग्यारहवाँ अध्याय 299
“हरिदास-ठाकुरेर महोत्सवेर तरे। प्रसाद मागिये भिक्षा देह त' आमारे॥” 74 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने सिंहद्वारपर आकर पंसारियोंसे आँचल फैलाकर प्रसादकी भिक्षा माँगनी प्रारम्भ कर दी,—“मैं हरिदास ठाकुरके महोत्सवके आयोजन हेतु आप लोगोंसे प्रसादकी भिक्षा माँग रहा हूँ, आप लोग कृपा करके मुझे भिक्षा प्रदान कीजिये॥” 73-74 ॥
दुकानदारोंके द्वारा सम्पूर्ण प्रसाद देनेकी इच्छा :— शुनिया पसारि सब चाङ्गड़ा उठाञा। प्रसाद दिते आसे तारा आनन्दित हञा॥ 75 ॥
अनुवाद—यह सुनकर सब पंसारी लोग प्रसादकी बड़ी-बड़ी टोकरियोंको उठाकर आनन्दपूर्वक देनेके लिये आये॥ 75 ॥
अनुभाष्य—'चाङ्गड़ा',—बड़ी टोकरी॥ 75 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा उन्हें मना करना :— स्वरूप-गोसाञि पसारिके निषेधिल। चाङ्गड़ा लञा पसारि पसारे बसिल॥ 76 ॥
अनुवाद—किन्तु श्रीस्वरूप दामोदरने पंसारियोंको इसके लिये निषेध किया। पंसारी उन टोकरियोंको लेकर पुनः अपनी दुकानोंपर बैठ गये॥ 76 ॥
महाप्रभुको घर भेजकर स्वयं श्रीस्वरूपके द्वारा महोत्सवके कार्यभारको अपने हाथोंमें लेना :— स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे घर पाठाइला। चारि-वैष्णव, चारि पिछाड़ा सङ्गे राखिला॥ 77 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुको उनके वासस्थानमें भेज दिया और उन्होंने अपने साथ चार वैष्णवों तथा बोझा उठानेवाले चार व्यक्तियोंको रख लिया॥ 77 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पिछाड़ा',—पीछे चलनेवाले लोग (मतान्तरमें 'झुड़ि' अथवा 'झोला',—79 संख्या देखें)॥ 77 ॥
स्वरूप-गोसाञि कहिलेन सब पसारिरे।” “एक एक द्रव्येर एक एक पुआ देह' मोरे॥” 78 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने समस्त पंसारियोंको कहा,—“आप सभी मुझे प्रत्येक वस्तुमें-से उसका चौथाई भाग प्रसाद दे दीजिये॥” 78 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पुआ',—चार-चार करके एक भाग॥ 78 ॥
प्रचुर प्रसादका संग्रह :— एइमते नानाप्रसाद बोझा बान्धाञा। लञा आइला चारि-जनेर मस्तके चड़ाञा॥ 79 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीस्वरूप दामोदरने अनेक प्रकारके प्रसाद द्रव्योंको एकत्रित करके बँधवा लिया और उसे चार व्यक्तियोंके सिरपर रखवाकर ले आये॥ 79 ॥
श्रीवाणीनाथ और श्रीकाशीमिश्रके द्वारा प्रसादका संग्रह :— वाणीनाथ-पट्टनायक प्रसाद आनिला। काशीमिश्र अनेक प्रसाद पाठाइला॥ 80 ॥
अनुवाद—श्रीवाणीनाथ पट्टनायक भी प्रसाद लेकर आये और श्रीकाशीमिश्रने भी बहुत-सा प्रसाद भेजा॥ 80 ॥
विरह-महोत्सवमें वैष्णवोंको महाप्रभुके द्वारा अपने श्रीहस्तसे प्रचुर प्रसाद बाँटना :— सब वैष्णवे प्रभु बसाइला सारि सारि। आपने परिवेशे प्रभु लञा जना चारि॥ 81 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने समस्त वैष्णवोंको पंक्तिमें बैठाया और वे स्वयं चार लोगोंको अपने साथ लेकर प्रसाद वितरण करने लगे॥ 81 ॥
महाप्रभुर श्रीहस्ते अल्प ना आइसे। एक एक पाते पञ्चजनार भक्ष्य परिवेशे॥ 82 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके हाथमें प्रसाद अल्प मात्रामें
300 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/82-92 ] नहीं आ रहा था, वे तो एक-एक व्यक्तिके पत्तलमें पाँच व्यक्तियोंके खाने योग्य प्रसाद दे रहे थे॥82॥ महाप्रभुको मना करके श्रीस्वरूपका तीन भक्तोंके साथ प्रसाद वितरण करना :- स्वरूप कहे,—“प्रभु, बसि' करह दर्शन। आमि इँहा-सबा लञा करि परिवेश्न॥"83॥ अनुवाद- श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, — "हे महाप्रभो! आप कृपा बैठकर देखिये। मैं इन सभीको लेकर प्रसाद परोसता हूँ॥" 83॥ स्वरूप, जगदानन्द, काशीश्वर, शङ्कर। चारिजन परिवेश्न करे निरन्तर ॥ 84 ॥ अनुवाद- श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीकाशीश्वर पण्डित और श्रीशङ्कर पण्डित-ये चारों जन निरन्तर प्रसाद परोसने लगे ॥ 84 ॥ भक्तोंके द्वारा महाप्रभुके भोजनकी अपेक्षा, महाप्रभुको काशीमिश्रके द्वारा प्रसाद-भिक्षा-प्रदान :- प्रभु ना खाइले केह ना करे भोजन। प्रभुरे से दिने काशीमिश्रेर निमन्त्रण ॥ 85 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके नहीं खानेके कारण किसीने भी खाना आरम्भ नहीं किया। महाप्रभुने इसलिये नहीं खाया, क्योंकि उस दिन उनका श्रीकाशीमिश्रके घरमें निमन्त्रण था॥ 85॥ आपने काशीमिश्र आइला प्रसाद लञा। प्रभुरे भिक्षा कराइला आग्रह करिया ॥ 86 ॥ अनुवाद—इसलिये श्रीकाशीमिश्र स्वयं महाप्रभुके लिये प्रसाद लेकर आये और आग्रहपूर्वक महाप्रभुको भोजन कराया ॥ 86 ॥ संन्यासियोंके साथ महाप्रभुके द्वारा प्रसादका सम्मान :- पुरी-भारतीर सङ्गे प्रभु भिक्षा कैला। सकल वैष्णव तबे भोजन करिला ॥ 87 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारतीके साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करना आरम्भ किया, तब समस्त वैष्णवोंने भी भोजन करना प्रारम्भ किया ॥ 87 ॥ सभी भक्तोंको गले तक भरकर भोजन कराना :- आकण्ठ पूराञा सबाय कराइला भोजन। 'देह' देह' बलि' प्रभु बलेन वचन ॥ 88 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने सभीको गले तक भरकर भोजन कराया, क्योंकि वे प्रसाद-वितरण करनेवाले भक्तोंको कहते रहे कि भक्तोंको और प्रसाद दो, और प्रसाद दो ॥ 88 ॥ सभीको आचमन करनेके बाद महाप्रभुके द्वारा माला और चन्दन पहनाना :- भोजन करिया सबे कैला आचमन। सबारे पराइला प्रभु माल्य-चन्दन ॥ 89 ॥ अनुवाद-जब सभी भक्तोंने भोजन करनेके बाद आचमन कर लिया, तब महाप्रभुने सभीको माला पहनाकर चन्दन लगाया ॥ 89 ॥ प्रेमके आवेशमें महाप्रभुके द्वारा भक्तोंको वरदान देना :- प्रेमाविष्ट हञा प्रभु करेन वर-दान। शुनि' भक्तगणेर जुड़ाय मनस्काम ॥ 90 ॥ अनुवाद—प्रेमाविष्ट होकर महाप्रभुने भक्तोंको वरदान दिया जिसे सुनकर भक्त अपनी मनोवाञ्छा पूर्ण होनेसे सन्तुष्ट हो गये॥ 90 ॥ श्रीहरिदासके विरहोत्सवमें जिस-किसी भी प्रकारसे योगदान करनेवालेको श्रीकृष्णप्राप्तिका वर-लाभ :- "हरिदासेर विजयोत्सव ये कैल दर्शन। ये इँहा नृत्य कैल, ये कैल कीर्त्तन ॥ 91 ॥ ये ताँरे बालुका दिते करिल गमन। तार मध्ये महोत्सवे ये कैल भोजन ॥ 92 ॥
[ 11/91-101 ग्यारहवाँ अध्याय 301 अचिरे सबाकार हवे 'कृष्णप्राप्ति'। हरिदास-दरशने हय ऐछे 'शक्ति' ॥ 93 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “जिसने भी हरिदास ठाकुरके विजयोत्सवका दर्शन किया है, जिसने उसमें नृत्य और कीर्तन किया है, जिसने हरिदास ठाकुरकी समाधिपर बालू दिया है और जिसने इस महोत्सवमें प्रसाद ग्रहण किया है, उन सभीको अतिशीघ्र श्रीकृष्णकी प्राप्ति होगी। हरिदास ठाकुरके दर्शनमें ऐसी शक्ति है॥ 91-93 ॥ अनुभाष्य— 'विजयोत्सव', — विरह-महोत्सव ॥ 91 ॥ प्रियभक्तके विरहमें भगवान्की विलाप-उक्ति :- कृपा करि' कृष्ण मोरे दियाछिला सङ्ग। स्वतन्त्र कृष्णेर इच्छा, —कैला सङ्ग-भङ्ग ॥ 94 ॥ अनुवाद—कृष्णने कृपा करके मुझे हरिदास ठाकुरका सङ्ग प्रदान किया था। किन्तु कृष्णकी इच्छा स्वतन्त्र होनेके कारण उन्होंने अब मेरा वह सङ्ग भङ्ग कर दिया है॥ 94 ॥ हरिदासेर इच्छा यबे हइल चलिते। आमार शकति ताँरे नारिल राखिते ॥ 95 ॥ इच्छामात्रे कैला निजप्राण निष्क्रामण। पूर्वे येन शुनियाछि भीष्मेर मरण ॥ 96 ॥ अनुवाद—जब हरिदास ठाकुरकी इस जगत्से जानेकी इच्छा हुई, तब उन्हें रोकना मेरे बसमें नहीं था। उन्होंने अपने प्राणोंको अपनी इच्छामात्रसे ऐसे छोड़ दिया, जैसे हमने पूर्वकालमें भीष्म पितामहके शरीर त्यागनेके विषयमें सुना है ॥ 95-96 ॥ ठाकुर-श्रीहरिदासके गुणोंका वर्णन :- हरिदास आछिल पृथिवीर 'शिरोमणि'। ताहा बिना रत्न-शून्या हइल मेदिनी ॥ 97 ॥ अनुवाद—हरिदास ठाकुर पृथिवीके शीशपर विराजित सर्वोत्तम मणि स्वरूप थे, उनके बिना यह पृथवी अपने उस रत्नसे शून्य हो गयी है॥ 97 ॥ श्रीहरिदासकी जयध्वनि और महाप्रभुके द्वारा नृत्य :- 'जय जय हरिदास' बलि' कर हरिध्वनि।” एत बलि' महाप्रभु नाचेन आपनि ॥ 98 ॥ अनुवाद—आप सभी हरिदासकी जयध्वनि कीजिये और हरिनामका कीर्तन कीजिये।” यह कहकर महाप्रभु स्वयं नृत्य करने लगे ॥ 98 ॥ सबे गाय, — “जय जय जय हरिदास। नामेर महिमा यँह करिला प्रकाश ॥”99 ॥ अनुवाद—सभी भक्त गान करने लगे, — “श्रीहरिदास ठाकुरकी जय हो, जय हो, जय हो, जिन्होंने कृष्णनामकी महिमाको जगत्में प्रकाशित किया है ॥”99 ॥ भक्तोंको विदायी देना और भक्त (श्रीहरिदास)के विरह और विजय (देहत्याग) -ऐश्वर्यको देखकर हर्ष और विषादके साथ महाप्रभुका विश्राम :- तबे महाप्रभु सब भक्ते विदाय दिला। हर्ष-विषादे प्रभु विश्राम करिला ॥ 100 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको विदायी दी और स्वयं उन्होंने हर्ष एवं विषादके मिश्रित भावोंके साथ विश्राम किया ॥ 100 ॥ भक्तश्रेष्ठ नामाचार्य श्रीहरिदासके तिरोभावके वृत्तान्तको सुननेसे श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :- एइ त' कहिलुँ हरिदासेर विजय। याहार श्रवणे कृष्णे दृढ़भक्ति हय ॥ 101 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने श्रीहरिदास ठाकुरके विजयोत्सवका वर्णन किया है। जो भी इसे सुनता है उसे भगवान् श्रीकृष्णमें दृढ़भक्ति होती है ॥ 101 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'हरिदासेर विजय', —श्रीपुरुषोत्तम-
302 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/101-104 ] क्षेत्रमें तोटा-गोपीनाथसे समुद्रके तटपर जानेपर समुद्रके ऊपर ही ठाकुर श्रीहरिदासकी समाधि अभी भी विद्यमान है। प्रत्येक वर्ष 'अनन्तचतुर्दशी'के दिन ठाकुर श्रीहरिदासका विजयोत्सव होता है ॥ 101 ॥ ग्यारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। भक्त-वाञ्छाको पूर्ण करनेवाले भक्तवत्सल श्रीगौर-भगवान् :- चैतन्येर भक्तवात्सल्य इहातेइ जानि। भक्तवाञ्छा पूर्ण कैला न्यासी-शिरोमणि ॥ 102 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदासके निर्याण और महाप्रभुके द्वारा उन्हें समाधि एवं उनके विजयोत्सवको मनानेकी घटनासे ही श्रीचैतन्य महाप्रभुका भक्त-वात्सल्य जाना जा सकता है। महाप्रभुने संन्यासी-शिरोमणि होनेपर भी अपने भक्त श्रीहरिदास ठाकुरकी इच्छाको पूर्ण किया ॥ 102 ॥ गोलोक-गमनकालमें श्रीहरिदासको साक्षात् कृपा दान :- शेषकाले दिला ताँरे दर्शन-स्पर्शन। ताँरे कोले करि' कैला आपने नर्त्तन ॥ 103 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरके अन्तिम समयमें उन्हें अपना दर्शन और स्पर्श प्रदान किया एवं उनके दिव्य कलेवरको अपनी गोदमें लेकर नृत्य किया ॥ 103 ॥ आपने श्रीहस्ते कृपाय ताँरे बालु दिला। आपने प्रसाद मागि' महोत्सव कैला ॥ 104 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कृपा करके अपने हाथोंसे श्रीहरिदास ठाकुरके दिव्य कलेवरको बालूसे ढक दिया और उन्होंने स्वयं ही प्रसाद भिक्षा माँगकर श्रीहरिदास ठाकुरका विरह-महोत्सव आयोजित किया ॥ 104 ॥ अनुभाष्य—श्रीहरिदास ठाकुरके समाधि-क्षेत्रमें लगभग एक सौ वर्ष पूर्व श्रीगौर, नित्यानन्द और अद्वैताचार्य-इन तीनों विग्रहोंकी सेवा स्थापित हुई है। केन्द्रापाड़ाके 'भ्रमरधर' नामक एक उत्कलवासी भक्तकी वित्त सहायतासे पुरीके स्वर्गद्वारमें स्थायी श्रीमन्दिर बना। यहाँकी सेवा-तोटा-गोपीनाथके सेवायत गोस्वामियोंकी देखरेखमें थी। किन्तु अब यह सम्पत्ति बिककर अन्योंके हाथोंमें चली गयी है और वे ही सेवा चला रहे हैं। श्रीहरिदास ठाकुरकी समाधि स्थलीके निकट ही श्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुरने अपनी भजन-स्थली 'भक्तिकुटी'का निर्माण किया। बङ्गाब्द 1329 सालमें इस भक्तिकुटीमें श्रीपुरुषोत्तम मठ संस्थापित हुआ है। भक्तिरत्नाकरकी तृतीय तरङ्गमें वर्णन आता है— “श्रीनिवास शीघ्र समुद्रेर कूले गेला। हरिदास-ठाकुरेर समाधि देखिला ॥ भूमिते पडिया कैला प्रणति विस्तर। भागवतगण श्रीसमाधि-सन्निधाने। श्रीनिवासे स्थिर कैला सस्नेह-वचने ॥ पुनः श्रीनिवास श्रीसमाधि प्रणमिया। ये विलाप कैला, ता शुनिते द्रवे हिया॥” [अर्थात् “श्रीनिवासाचार्य जगन्नाथ पुरीमें आकर शीघ्रतासे समुद्रके तटपर गये। वहाँ उन्होंने श्रीहरिदास-ठाकुरकी समाधिके दर्शन किये और भूमिपर गिरकर बहुत देर तक प्रणाम किया। श्रीसमाधिके निकट जितने भक्तगण थे, उन्होंने अत्यन्त स्नेहपूर्ण वचनोंके द्वारा श्रीनिवासाचार्यको शान्त किया।
[ 11/104-108 ग्यारहवाँ अध्याय 303
श्रीनिवासाचार्यने पुनः श्रीहरिदास ठाकुरकी समाधिको प्रणाम करके जो विलाप किया, उसे सुनने मात्रसे हृदय द्रवित हो जाता है।"] ॥ 104 ॥
श्रीचैतन्यचरितसिन्धुका बिन्दु भी हृदय और कानोंके लिये रसायन :- चैतन्यचरित्र एइ-अमृतेर सिन्धु। कर्ण-मन तृप्त करे यार एकबिन्दु ॥ 106 ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र तो अमृतका सिन्धु है, उसकी एक बूँद भी कानों तथा मनको तृप्त कर देती है ॥ 106 ॥
महाभागवत विद्वत्-संन्यासी परमहंसवर ठाकुर-श्रीहरिदास :- महाभागवत हरिदास-परम-विद्वान्। ए सौभाग्य लागि' आगे करिला प्रयाण ॥ 105 ॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुर उत्तम श्रेणीके भक्त अर्थात् महाभागवत तो थे ही, साथमें वे परम विद्वान् भी थे। उनका यह परम सौभाग्य था कि उन्होंने महाप्रभुके सामने उनके दर्शन करते हुए और उनका नाम लेते हुए देह त्याग दी ॥ 105 ॥
मायासे पार होकर श्रीकृष्णसेवाके इच्छुक व्यक्तिके लिये श्रीचैतन्यचरितको श्रवण करनेकी कर्त्तव्यता :- भवसिन्धु तरिवारे आछे यार चित्त। श्रद्धा करि' शुन सेइ चैतन्यचरित ॥ 107 ॥
अनुवाद-जिसकी भवसागरसे पार होनेकी इच्छा है, वह श्रद्धापूर्वक श्रीचैतन्यचरितका श्रवण करे ॥ 107 ॥
अनुभाष्य-'परम-विद्वान्', -जिसके द्वारा अविद्यारूपी संसार-बन्धनसे मुक्त होकर अप्राकृत अक्षर वस्तु विष्णु, अच्युत अथवा अधोक्षज-विषयक ज्ञान प्राप्त हो, वही 'विद्या' है। श्रीहरिदास ठाकुर सर्वोत्तमा कृष्णविद्यामें पारदर्शी थे, क्योंकि वे विद्यावधू-जीवन श्रीहरिनामसङ्कीर्तनके आचार्य और प्रचारकके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं; विशेषतः “इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा। क्रियेत भगवत्यधा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्॥" (भा: 7/5/24) भागवत-वाक्यमें श्रीकृष्णकी नवविधा भक्तिके मध्य सर्वश्रेष्ठ अङ्ग कीर्तनके अनुशीलनकारीको ही 'सर्वशास्त्राधीती' अर्थात् समस्त शास्त्रोंको जाननेवाला कहा गया है ॥ 105 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 108 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे श्रीहरिदास-निर्वाण-वर्णनं नाम एकादशः परिच्छेदः।
अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 108 ॥
ग्यारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें श्रीहरिदास-निर्वाण-वर्णन नामक ग्यारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
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बारहवाँ अध्याय कथासार—महाप्रभुका रात्रिमें प्रेमविकार और दिनमें भी उसकी आलोचना चलने लगी। इधर (भक्तोंके साथ) गौड़देशसे श्रीशिवानन्द-सेनने अपनी पत्नी और तीनों पुत्रोंको साथ लेकर यात्रा की। मार्गमें श्रीनित्यानन्दप्रभुको वासस्थान प्राप्त करनेमें देरी होनेपर उन्होंने श्रीशिवानन्दके प्रति प्रेमकोप दिखाकर लात मारी थी। श्रीशिवानन्दके उससे कृतार्थ होनेपर भी उनका भाँजा श्रीकान्त-सेन दुःखी होकर पहले ही महाप्रभुके पास चला गया। उस वर्ष परमेश्वरदास-मोदक सपरिवार महाप्रभुके दर्शनोंके लिये गये थे। पूर्व-पूर्व वर्षोंकी भाँति भक्तोंने महाप्रभुको निमन्त्रण किया। उनकी विदायीके समय महाप्रभुने अनेक विनय-वाक्य प्रकाशित किये। पिछले वर्ष श्रीजगदानन्द-पण्डितको श्रीशचीमाताके लिये प्रसाद-वस्त्र साथ लेकर भेजा गया था। श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीशिवानन्दके घरसे 'चन्दनादि' नामक सुगन्धित तेलको एक कलसी (मटकी)में लेकर आये और उन्होंने उस तेलको श्रीगोविन्दको देकर उन्हें महाप्रभुके सिरपर लगानेकी प्रार्थना की। महाप्रभुके द्वारा उस तेलको स्वीकार नहीं करनेपर, श्रीजगदानन्दने उस तेल-सहित मटकीको फेंककर तोड़ दिया और दो दिन तक उपवास किया। महाप्रभुने उन्हें शान्त करनेके लिये उनसे भिक्षाके (भोजनके) लिये प्रार्थना की, श्रीजगदानन्द पण्डितने अन्न-व्यञ्जन आदि पकाकर महाप्रभुकी सेवा करके प्रसादादि ग्रहण किया। —(अमृतप्रवाह भाष्य) भक्तोंको सदैव श्रीचैतन्यचरितामृतके श्रवण, कीर्तन और स्मरण करनेका अनुरोध :— श्रूयतां श्रूयतां नित्यं गीयतां गीयतां मुदा। चिन्त्यतां चिन्त्यतां भक्ताश्चैतन्यचरितामृतम् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे भक्तगण, इस चैतन्यचरितामृतका नित्य श्रवण करो, गान करो और आनन्दपूर्वक चिन्तन करो॥ 1 ॥ अनुभाष्य— हे भक्ताः, मुदा (आनन्देन) चैतन्यचरितामृतं नित्यं (पुनः पुनः) श्रूयतां श्रूयतां, (पुनः पुनः) गीयतां गीयतां, (पुनः पुनः) चिन्त्यतां, चिन्त्यताम्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय दयामय। जय जय नित्यानन्द कृपासिन्धु जय ॥ 2 ॥ अनुवाद—दयामय श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो। कृपासिन्धु श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो॥ 2 ॥ जयाद्वैतचन्द्र जय करुणा सागर। जय गौरभक्तगण कृपा-पूर्णान्तर ॥ 3 ॥ अनुवाद—करुणाके सागर श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, जय हो। हृदयमें कृपासे परिपूर्ण श्रीगौरभक्तोंकी जय हो॥ 3 ॥ महाप्रभुकी कृष्ण-विरहकी स्फूर्ति :— अतःपर महाप्रभु विषण्ण-अन्तर । कृष्णेर वियोग-दशा स्फुरे निरन्तर ॥ 4 ॥ महाप्रभुकी कृष्णसङ्गके लिये व्याकुलता :— “हा हा कृष्ण प्राणनाथ व्रजेन्द्रनन्दन ! काँहा याङ, काँहा पाङ मुरलीवदन ! !” 5 ॥ अनुवाद—हृदयमें निरन्तर कृष्णसे वियोग-दशा स्फुरित
306 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/4-14 ] होनेके कारण महाप्रभुका हृदय अत्यन्त दुःखी रहता था और वे यह कहकर विलाप करते, — “हा हा कृष्ण! हे प्राणनाथ! हे व्रजेन्द्रनन्दन! मैं कहाँ जाऊँ? कहाँ जानेसे हे मुरलीवदन आप मिलेंगे!”4-5 ॥ दिन-रात श्रीकृष्णविरहकी ज्वाला :- रात्रिदिन एइ दशा, स्वस्ति नाहि मने। कष्टे रात्रि गोङाय स्वरूप-रामानन्द-सने॥ 6 ॥ अनुवाद—महाप्रभु रात-दिन इसी दशामें रहते। मनमें कभी शान्ति नहीं होनेपर वे श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायके साथ अत्यन्त कष्टमें रात्रि व्यतीत करते॥ 6 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—'स्वास्थ्य नाहि माने' (अर्थात् मनमें शान्ति नहीं थी अथवा मनमें दुःखका अभाव नहीं था)॥ 6 ॥ प्रत्येक वर्षकी भाँति गौड़ीयभक्तोंका महाप्रभुके दर्शनके लिये पुरीमें आनेका प्रयास :- एथा गौड़देशे प्रभुर यत भक्तगण। प्रभु देखिबारे सबे करिला गमन॥ 7 ॥ अनुवाद—इधर गौड़देशमें महाप्रभुके जितने भक्त थे, वे सभी महाप्रभुके दर्शनोंके लिये चल पड़े॥ 7 ॥ सभी भक्तोंका नवद्वीपमें आगमन :- शिवानन्द-सेन आर आचार्य-गोसाञि। नवद्वीपे सब भक्त हैला एकठाञि॥ 8 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन और श्रीअद्वैताचार्य गोसाईं आदि समस्त भक्त श्रीनवद्वीपमें एकत्रित हुए॥ 8 ॥ कुलीनग्रामवासी आर यत खण्डवासी। एकत्र मिलिला सब नवद्वीपे आसि' ॥ 9 ॥ अनुवाद—कुलीनग्रामवासी और श्रीखण्डवासी सब भक्त भी नवद्वीपमें आकर एकत्रित हुए॥ 9 ॥ महाप्रभुके द्वारा निषेध किये जानेपर भी श्रीनित्यानन्दकी यात्रा :- नित्यानन्द-प्रभुरे यद्यपि आज्ञा नाइ। तथापि देखिते चलेन चैतन्य-गोसाञि॥ 10 ॥ अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको आनेके लिये निषेध किया था, तथापि वे श्रीचैतन्य महाप्रभुके दर्शनके लिये श्रीजगन्नाथ पुरीकी ओर चल पड़े॥ 10 ॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला 10/5-8 संख्या देखें॥ 10 ॥ सपरिवार गृहस्थ गौरभक्तोंके द्वारा यात्रा :- श्रीवासादि चारि भाइ, सङ्गेते मालिनी। आचार्यरत्नेर सङ्गे ताँहार गृहिणी॥ 11 ॥ अनुवाद—श्रीवास पण्डितादि चारों भाई और उनके साथमें श्रीवास पण्डितकी पत्नी श्रीमालिनी देवी भी जगन्नाथ पुरीकी ओर चले। इसी प्रकार श्रीआचार्यरत्न भी अपनी पत्नीके साथ आये॥ 11 ॥ शिवानन्द-पत्नी चले तिन-पुत्र लञा। राघवपण्डित चले झालि साजाञा॥ 12 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनकी पत्नी भी अपने तीनों पुत्रोंको साथमें लेकर चल दीं। श्रीराघव पण्डित अपनी झोलीको सजाकर चले॥ 12 ॥ दत्त, गुप्त, विद्यानिधि, आर यत जन। दुइ-तिन शत भक्त करिला गमन॥ 13 ॥ अनुवाद—श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि और अन्य बहुतसे भक्त महाप्रभुसे मिलनेके लिये चले। कुल मिलाकर दो-तीन सौ भक्त एक साथ श्रीजगन्नाथपुरीकी ओर चल दिये॥ 13 ॥ शचीमाताको प्रणाम करके कीर्तन करते हुए सभीके द्वारा यात्रा :- शचीमाता देखि' सबे ताँर आज्ञा लञा। आनन्दे चलिला कृष्णकीर्त्तन करिया॥ 14 ॥
[ 12/14-21 बारहवाँ अध्याय 307
अनुवाद—सभी भक्तोंने पहले श्रीशचीमाताके दर्शन किये और उनकी आज्ञा ली। तब वे आनन्दपूर्वक कृष्ण-कीर्तन करते हुए श्रीजगन्नाथ पुरीकी ओर चल दिये ॥ 14 ॥
सम्पन्न श्रीशिवानन्दके द्वारा मार्गका कर देना और भक्तोंको साथ लाते हुए उनकी सेवा :— शिवानन्द-सेन करे घाटी-समाधान। सबारे पालन करि' सुखे लञा यान॥ 15 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द-सेन मार्गमें सब प्रकारके कर-शुल्क आदि देते हुए और सभीका पालन करते हुए सुखपूर्वक उन्हें श्रीजगन्नाथपुरी लेकर जा रहे थे॥ 15 ॥
अनुभाष्य—'घाटि-समाधान,'—जमींदारके अधिकार क्षेत्रमें यात्रियों अथवा पथिकोंके आवागमन करनेपर ही कर लिया जाता था। पहलेसे ही पथकर जमा नहीं कराये जानेपर, मार्ग-घाटके मालिक ही यह कर प्राप्त करते थे। श्रीशिवानन्द-सेन जगन्नाथपुरीकी ओर जा रहे यात्रियोंके द्वारा देय पथकरको स्थान-स्थानपर घाटपालोंको चुका देते थे॥ 15 ॥
श्रीशिवानन्दको उड़ीसाके पथके विषयमें पूर्ण जानकारी :— सबार सब कार्य करेन, देन वासस्थान। शिवानन्द जाने उड़िया-पथेर सन्धान ॥ 16 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन सभी भक्तोंकी सब प्रकारसे देखभाल करते थे और उन्हें मार्गमें आवश्यकतानुसार वासस्थान प्रदान करते थे। श्रीशिवानन्द सेन उड़ीसा जानेके मार्गको भली-भाँति जानते थे ॥ 16 ॥
अनुभाष्य—'उड़िया-पथेर,'—उड़ीसा जानेके मार्गके ॥ 16 ॥
एकदिन सबलोक घाटिते राखिला। सबा छाड़ाञा शिवानन्द अकेला रहिला ॥ 17 ॥
अनुवाद—एकदिन घाटपालने समस्त भक्तोंको रोक लिया, किन्तु श्रीशिवानन्द सेनने उन सबको छुड़ाकर आगे भेज दिया और स्वयं अकेले पथकर देनेके लिये वहीं रह गये ॥ 17 ॥
अनुभाष्य—घाटपाल अन्यायपूर्वक यात्रियोंसे अधिक कर लेने और निर्धारित करसे अतिरिक्त राशि प्राप्त करनेके लिये यात्रियोंको घाटीपर अटकाकर रखते थे। श्रीशिवानन्दने सभी यात्रियोंकी ओरसे स्वयं उनका दायित्व लेकर उन्हें छुड़ा दिया ॥ 17 ॥
सबे गिया रहिला ग्राम-भितर वृक्षतले। शिवानन्द बिना वासस्थान नाहि मिले ॥ 18 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके नहीं होनेके कारण उन्हें वासस्थान नहीं मिल सकता था, इसलिये सभी भक्त गाँवके अन्दर जाकर वृक्षके नीचे बैठ गये ॥ 18 ॥
श्रीनित्यानन्दका अप्राकृत व्रजगोपबालकके वेशमें भूखके कारण श्रीशिवानन्दपर कृत्रिम रोषाभासका प्रदर्शन :— नित्यानन्दप्रभु भोके व्याकुल हञा। शिवानन्दे गालि पाड़े वासा ना पाञा ॥ 19 ॥ “तिन पुत्र मरुक शिवार, एखन ना आइल। भोके मरि' गेनु, मोरे वासा ना देओयाइल॥” 20 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु भूखसे व्याकुल हो रहे थे और उन्हें रहनेके लिये स्थान भी नहीं मिला, इसलिये वे श्रीशिवानन्द सेनको गाली निकालते हुए कहने लगे,—“शिवानन्द अभी तक भी नहीं आया है। मैं भूखसे मर रहा हूँ और ऊपरसे उसने मुझे रहनेका स्थान भी नहीं दिलवाया, इसलिये उसके तीनों पुत्र मर जाँय ॥” 19-20 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भोके,'—भूखसे ॥ 19 ॥
श्रीनित्यानन्दके शापको सुनकर श्रीशिवानन्दकी पत्नीका रोदन और श्रीशिवानन्दको शापके वृत्तान्तका वर्णन :— शुनि' शिवानन्देर पत्नी कान्दिते लागिला। हेनकाले शिवानन्द घाटि हैते आइला ॥ 21 ॥
308 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/21-30 ] अनुवाद—इस शापको सुनकर श्रीशिवानन्द सेनकी पत्नी विलाप करने लगीं, उसी समय श्रीशिवानन्द सेन करका भुगतान करके लौट आये॥21॥ शिवानन्देर पत्नी ताँरे कहेन कान्दिया। “पुत्रे शाप दिछेन गोसाञि वासा ना पाञा॥”22॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनकी पत्नी रोते हुए उनसे कहने लगीं,—“श्रीनित्यानन्द गोसाईंको रहनेका स्थान नहीं मिला, इसलिये उन्होंने हमारे पुत्रोंको मरनेका शाप दिया है॥”22॥ श्रीशिवानन्दके द्वारा पत्नीको आश्वासन :— तेंहो कहे,—“बाउलि, केने मरिस् कान्दिया? मरुक आमार तिन पुत्र ताँर बालाइ लञा॥”23॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने कहा,—“पगली, तुम रो-रोकर हताश क्यों हो रही है? उन्हें जो कष्ट मेरे कारण हुआ है, उसके लिये मेरे तीनों पुत्र मरते हैं तो मर जाँय॥”23॥ अनुभाष्य—‘बाउली’,—‘पगली’; पाठान्तरमें, ‘बाउनी’,— ब्राह्मणी; शौक्र-ब्राह्मण नहीं होनेपर भी उन दिनों भद्र महिलाओंको वैसा कहकर पुकारना उचित था॥23॥ श्रीशिवानन्दको श्रीनित्यानन्दके चरणके आघातरूपी सौभाग्यकी प्राप्ति :— एत बलि’ प्रभु-पाशे गेला शिवानन्द। उठि’ ताँरे लाथि माइला प्रभु-नित्यानन्द॥24॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीशिवानन्द सेन श्रीनित्यानन्द प्रभुके पास गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उठकर उन्हें लात मारी॥24॥ आनन्दित हैला शिवाइ पादप्रहार पाञा। शीघ्र वासा-घर कैला गौड़-घरे गिया॥25॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन लात खाकर बड़े आनन्दित हुए और उन्होंने शीघ्र ही किसी ग्वालेके घरमें जाकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके रहनेकी व्यवस्था की॥25॥ अनुभाष्य—‘गौड़-घरे’,—ग्वालेके घरमें॥25॥ श्रीनित्यानन्द प्रभुको उनके लिये चुने घरमें लाकर उनकी स्तुति :— चरणे धरिया प्रभुरे वासाय लञा गेला। वासा दिया हृष्ट हञा कहिते लागिला॥26॥ निजजन मानकर ही प्रभुके द्वारा सेवककी भर्त्सना :— “आजि मोरे भृत्य करि’ अङ्गीकार कैला। येमन अपराध भृत्येर्, योग्य फल दिला॥27॥ ईश्वरके द्वारा दिया दण्ड अथवा दुःख ही ढकी हुई परमकृपा और सुख :— ‘शास्ति’-छले कृपा कर,—ए तोमार ‘करुणा’। त्रिजगते तोमार चरित्र बुझे कोन् जना?28॥ साक्षात् सर्वेश्वरेश्वर श्रीनित्यानन्द-पदधूलिको प्राप्त करनेपर ही पुरुषार्थ श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :— ब्रह्मार दुर्लभ तोमार श्रीचरण-रेणु। हेन-चरण स्पर्श पाइल मोर अधम तनु॥29॥ आजि मोर सफल हैल जन्म, कुल, धर्म। आजि पाइनु कृष्णभक्ति, अर्थ, काम, धर्म॥”30॥ अनुवाद—तब श्रीशिवानन्द सेनने आकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंको पकड़ लिया और उनसे प्रार्थना करके उन्हें वासस्थानपर ले गये। श्रीशिवानन्द सेन उनको वहाँ ठहराकर कहने लगे,—“आज आपने मुझे अपना दास मानकर अङ्गीकार किया है। आपने दासके अपराधके अनुरूप ही उसे उचित फल प्रदान किया है। आप दण्डके छलसे कृपा करते हैं, यह वास्तवमें आपकी करुणा ही है। आपकी लीलाको त्रिभुवनमें कौन समझ सकता है? आपके श्रीचरणकमलोंकी धूलि ब्रह्माके लिये भी दुर्लभ है और आपके उन श्रीचरणकमलोंने मेरी अधम देहको स्पर्श किया है। आज मेरा जन्म, कुल और मेरे सब कार्य सफल हो गये हैं। आज मुझे धर्म, अर्थ, काम और इन सबसे श्रेष्ठ कृष्णभक्तिकी प्राप्ति हुई है॥”26-30॥
[ 12/31-38 बारहवाँ अध्याय 309
अपनी स्तुतिको सुनकर प्रभुको आनन्द :— शुनि' नित्यानन्दप्रभुर आनन्दित मन। उठि' शिवानन्दे कैला प्रेम-आलिङ्गन ॥ 31 ॥ आनन्दित शिवानन्द करे समाधान। आचार्यादि-वैष्णवेरे दिला वासस्थान ॥ 32 ॥
एत बलि' श्रीकान्त-बालक आगे चलि' यान। सङ्ग छाड़ि' आगे गेला महाप्रभुर स्थान ॥ 36 ॥
अनुवाद—यह कहकर श्रीकान्त, जो अभी बालक ही था, भक्त मण्डलीका साथ छोड़कर पहले ही महाप्रभुके वासस्थानपर चला गया ॥ 36 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके इन भावोंको सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके मनमें आनन्द हुआ। उन्होंने उठकर श्रीशिवानन्द सेनको प्रेमसे आलिङ्गन किया। श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा आलिङ्गन प्राप्त करके श्रीशिवानन्द सेन बहुत आनन्दित हुए। तब उन्होंने श्रीअद्वैताचार्य आदि सभी वैष्णवोंके भी वासस्थानकी व्यवस्था की ॥ 31-32 ॥
श्रीकान्तको श्रीगोविन्दके द्वारा भगवद्विग्रहके विषयमें मर्यादा-विधिको उपदेश :— पेटाङ्गि-गाय करे दण्डवत्-नमस्कार। गोविन्द कहे,—“श्रीकान्त, आगे पेटाङ्गि उतार ॥” 37 ॥
अनुवाद—श्रीकान्तने अपने शरीरपर अँगरखा (कुर्ता) पहने हुए ही महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया, उसे ऐसा करते देख श्रीगोविन्दने कहा,—“हे श्रीकान्त ! पहले तुम अपना अँगरखा उतारो ॥” 37 ॥
श्रीनित्यानन्द (गुरुका) क्रोधाभास ही प्रच्छन्न परम-कृपा और नित्यकल्याण-सूचक :— नित्यानन्दप्रभुर सब चरित्र—'विपरीत'। क्रुद्ध हञा लाथि मारि' करे तार हित ॥ 33 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके समस्त विशिष्ट गुण बाहरसे देखनेमें परस्पर विरोधी दिखलायी देते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुने क्रोधित होकर लात मारकर श्रीशिवानन्द सेनका हित ही किया ॥ 33 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पेटाङ्गि', — अँगरखा, जामा (कुर्ता) ॥ 37 ॥
अनुभाष्य—तन्त्रवाक्य— “वस्त्रेणावृत-देहस्तु यो नरः प्रणमेद्धरिम्। श्वित्री भवति मूढात्मा सप्त जन्मनि भाविनि ॥”
[अर्थात् “हे भाविनि, जो मनुष्य वस्त्रसे आवृत देहसे युक्त होकर श्रीहरिको प्रणाम करता है, वह मूढ़ व्यक्ति सात जन्मों तक श्वेत कुष्ठ रोगी होता है।”] ॥ 37 ॥
श्रीकान्त-सेनके वृत्तान्तका वर्णन :— शिवानन्देर भागिना, —श्रीकान्त-सेन नाम। मामार अगोचरे कहे करि' अभिमान ॥ 34 ॥
मामाको श्रीनित्यानन्दके द्वारा लात मारे जानेको देखकर दुःखी होकर अकेले पुरीमें जाकर महाप्रभुके दर्शन :— “चैतन्येर पार्षद मोर मातुलेर ख्याति। 'ठाकुरालि' करेन गोसाञि, ताँरे मारे लाथि ॥” 35 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनका भाँजा, जिसका नाम श्रीकान्त सेन था, मामाकी अनुपस्थितिमें वह बड़े अभिमानसे कहने लगा,—“मेरे मामाकी श्रीचैतन्य महाप्रभुके पार्षदके रूपमें ख्याति है। श्रीनित्यानन्द प्रभुने अपना प्रभुत्व स्थापित करनेके लिये उन्हें लात मारी है॥” 34-35 ॥
अन्तर्यामी महाप्रभुके द्वारा श्रीकान्तके मनोभावको बतलाना :— प्रभु कहे,—“श्रीकान्त आसियाछे पाञा मनोदुःख। किछु ना बलिह, करूक, याते इहार सुख ॥” 38 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दसे कहा,—“यह श्रीकान्त मनसे बहुत दुःखी होकर आया है। तुम इसे कुछ मत कहो, इसे वैसा ही करने दो जिससे इसे सुख हो ॥” 38 ॥
310 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/39-49 ] महाप्रभुके द्वारा गौड़ीयभक्तोंका समाचार पूछना और उत्तर :- वैष्णवेर समाचार गोसाञि पुछिला। एके एके सबार नाम श्रीकान्त जानाइला ॥ ३९ ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीकान्तसे वैष्णवोंका समाचार पूछा और श्रीकान्तने एक-एकका नाम लेकर समस्त वैष्णवोंके विषयमें बतलाया ॥ ३९ ॥ 'दुःख पाञा आसियाछे,'-एइ प्रभुर वाक्य शुनि' । जानिला 'सर्वज्ञ प्रभु'-एत अनुमानि' ॥ ४० ॥ अपने मनके भावोंको जाननेवाले महाप्रभुको अन्तर्यामी मानकर लात मारनेकी बातको गुप्त रखना :- शिवानन्दे लाथि मारिला,-इहा ना कहिला। एथा सब वैष्णवगण आसिया मिलिला ॥ ४१ ॥ अनुवाद- 'यह बहुत दुःखी होकर आया हैं'-महाप्रभुके इस वाक्यको सुनकर श्रीकान्तने अनुमान लगाकर जान लिया कि महाप्रभु सर्वज्ञ हैं। इसलिये श्रीकान्तसेनने महाप्रभुको श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीशिवानन्द सेनको लात मारी-इस विषयमें नहीं बतलाया। इतनेमें सभी वैष्णव भी आकर महाप्रभुसे मिले ॥ ४०-४१ ॥ गौड़ीय भक्तोंका आगमन और स्त्रियोंका दूरसे ही महाप्रभुका दर्शन :- पूर्ववत् प्रभु कैला सबार मिलन। स्त्री-सब दूर हइते कैला प्रभुर दरशन ॥ ४२ ॥ अनुवाद-महाप्रभु पूर्व-पूर्व वर्षोंकी भाँति सभी भक्तोंसे मिले। परन्तु स्त्रियोंने दूरसे ही महाप्रभुके दर्शन किये ॥ ४२ ॥ सभीको वासस्थान आदि प्रदान :- वासाघर पूर्ववत् सबारे देओआइला। महाप्रसाद-भोजने सबारे बोलाइला ॥ ४३ ॥ अनुवाद-महाप्रभुने पहलेकी भाँति सभी भक्तोंको रहनेका स्थान दिलवाया और फिर सभी भक्तोंको महाप्रसादका भोजन करनेके लिये बुलाया ॥ ४३ ॥ पुत्र सहित श्रीशिवानन्दपर महाप्रभुकी कृपा :- शिवानन्द तिनपुत्रे गोसाञिरे मिलाइला। शिवानन्द-सम्बन्धे सबाय बहुकृपा कैला ॥ ४४ ॥ अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनने अपने तीनों पुत्रोंको श्रीचैतन्य महाप्रभुसे मिलवाया। महाप्रभुने श्रीशिवानन्द सेनके सम्बन्धसे उनके पुत्रोंपर बहुत कृपा की ॥ ४४ ॥ प्रश्नोत्तरमें छोटे पुत्रका परमानन्दपुरी-दास-नाम-श्रवण :- छोटपुत्रे देखि' प्रभु नाम पुछिला। 'परमानन्ददास'-नाम सेन जानाइला ॥ ४५ ॥ अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनके सबसे छोटे पुत्रको देखकर महाप्रभुने उसका नाम पूछा। श्रीशिवानन्द सेनने बतलाया कि उसका नाम 'परमानन्ददास' है ॥ ४५ ॥ परमानन्दपुरी-दास-नामके आदि कारणके वृत्तान्तका वर्णन; महाप्रभुकी आज्ञासे नामकरण :- पूर्वे यबे शिवानन्द प्रभुस्थाने आइला। तबे महाप्रभु ताँरे कहिते लागिला ॥ ४६ ॥ "एबार तोमार येइ हइबे कुमार। 'पुरीदास' बलि' नाम धरिह ताहार ॥" ४७ ॥ अनुवाद-पहले किसी समय जब श्रीशिवानन्द सेन महाप्रभुके पास आये थे, तब महाप्रभु उनसे कहने लगे, -"इस बार आपका जो पुत्र होगा, आप उसका नाम 'पुरीदास' रखना ॥" ४६-४७ ॥ तबे मायेर गर्भे हय सेइ त' कुमार। शिवानन्द घरे गेले, जन्म हैल तार ॥ ४८ ॥ अनुवाद-उस समय वह बालक अपनी माताके गर्भमें था, जब श्रीशिवानन्द सेन अपने घर लौटकर गये थे, तब उस बालकका जन्म हुआ था ॥ ४८ ॥ प्रभु-आज्ञाय धरिला नाम-'परमानन्द-दास' । 'पुरीदास' करि' प्रभु करेन उपहास ॥ ४९ ॥
[ 12/49-58 बारहवाँ अध्याय 311 अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने महाप्रभुकी आज्ञानुसार उस बालकका नाम ‘परमानन्द-दास’ रखा था। महाप्रभु उपहास करते हुए उस बालकको ‘पुरीदास’ कहकर पुकारने लगे॥ 49॥ परमानन्द (पुरी)-दासके द्वारा महाप्रभुके चरणके अँगूठेको चूसना :— शिवानन्द यबे सेइ बालके मिलाइला। महाप्रभु पादाङ्गुष्ठ तार मुखे दिला॥ 50॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने जब अपने उस बालकको महाप्रभुसे मिलवाया, तब महाप्रभुने अपने चरणका अँगूठा उस बालकके मुखमें दे दिया॥ 50॥ अनुभाष्य—परवर्तीकालमें पिताके साथ पुरीमें आगमन और महाप्रभुके द्वारा कृष्ण-उच्चारण करनेके लिये बहुत साध्य-साधनाके पश्चात् अन्तमें उस बालकके द्वारा कृष्णलीलाके श्लोककी रचना—अन्त्यलीला 16/65-75 संख्या देखें॥ 50॥ श्रीशिवानन्दका परम सौभाग्य :— शिवानन्देर भाग्यसिन्धु के पाइबे पार? याँर सब गोष्ठीके प्रभु कहे ‘आपणार’॥ 51॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके भाग्यके समुद्रको कौन पार कर सकता है? जिनके समस्त परिवारको महाप्रभु ‘अपना’ कहते थे॥ 51॥ तबे सब भक्त लञा करिला भोजन। गोविन्दरे आज्ञा दिला करि’ आचमन॥ 52॥ सपरिवार श्रीशिवानन्दको महाप्रभुके द्वारा निजजन मानकर साक्षात् कृपा :— “शिवानन्देर ‘प्रकृति’, पुत्र—यावत् एथाय। आमार अवशेष-पात्र तारा येन पाय॥” 53॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सब भक्तोंके साथ भोजन किया और आचमन करनेके पश्चात् श्रीगोविन्दको आदेश दिया,—“शिवानन्द सेनकी पत्नी और पुत्र जब तक यहाँ जगन्नाथ पुरीमें हैं, उन्हें मेरा उच्छिष्ट भोजन अवश्य ही मिले॥” 52-53॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘शिवानन्देर ‘प्रकृति’’,— श्रीशिवानन्दकी पत्नी॥ 53॥ श्रीमायापुरवासी परमेश्वर-मोदकका वृत्तान्त :— नदीयावासी मोदक, तार नाम—‘परमेश्वर’। मोदक बेचे, प्रभुर वाटीर निकट तार घर॥ 54॥ महाप्रभुकी बाल्यलीला और परमेश्वर :— बालक-काले प्रभु तार घरे बार बार यान। दुग्ध, खण्ड मोदक देय, प्रभु ताहा खान॥ 55॥ प्रभु-विषये स्नेह तार बालक-काल हैते। से वत्सर से आइल प्रभुरे देखिते॥ 56॥ अनुवाद—मिष्ठान्न बेचनेवाले ‘परमेश्वर’-नामक एक नदियावासी महाप्रभुके घरके निकट ही रहते थे। महाप्रभु बाल्यकालमें बार-बार उनके घरमें जाते थे और वे महाप्रभुको दूध, गुड़के लड्डू आदि देते थे एवं महाप्रभु उन्हें खाते थे। श्रीपरमेश्वरका महाप्रभुके बाल्यकालसे ही उनसे स्नेह था। उस वर्ष वे महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये जगन्नाथ पुरी आये॥ 54-56॥ परमेश्वरके द्वारा अपना परिचय देकर प्रणाम और पत्नीका आगमन-ज्ञापन :— “परमेश्वर्या मुञि” बलि’ दण्डवत् कैल। तारे देखि’ प्रभु प्रीते ताहारे पुछिल॥ 57॥ “परमेश्वर कुशल हओ, भाल हैल, आइला।” “मुकुन्दार माता आसियाछे,” प्रभुरे कहिला॥ 58॥ अनुवाद—उन्होंने महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम करते हुए कहा,—“मैं परमेश्वर हूँ।” उन्हें देखकर महाप्रभुने उनसे प्रीतिपूर्वक पूछा,—“परमेश्वर! आप कुशलसे तो हैं ना। बहुत अच्छा हुआ कि आप श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये हैं।” श्रीपरमेश्वरने महाप्रभुसे कहा,—“मुकुन्दकी माता (मेरी पत्नी) भी आयी है॥” 57-58॥
312 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/59-66 ] माताके समान आयु होनेपर भी स्त्रीका नाम श्रवण करने मात्रसे जगद्गुरु लोक-शिक्षक संन्यासी-लीलाका अभिनय करनेवाले महाप्रभुको सङ्कोच-बोध :- मुकुन्दार मातार नाम शुनि' प्रभु सङ्कोच हैला। तथापि ताहार प्रीते किछु ना बलिा ॥ 59 ॥ अनुवाद-मुकुन्दकी माताका नाम सुनकर महाप्रभुको कुछ सङ्कोच हुआ, किन्तु उन्होंने श्रीपरमेश्वरके प्रति प्रीतिके कारण उन्हें कुछ भी नहीं कहा ॥ 59 ॥ सरल स्नेहके कारण बाहरी शिष्टाचार अथवा बाह्य- मर्यादा-ज्ञानके अभावके कारण दोष होनेपर भी भावग्राही महाप्रभुका उसके निष्कपट व्यवहार-गुणसे सन्तोष :- प्रश्रय-प्रागल्भ्य शुद्ध-वैदग्धी ना जाने। अन्तरे सुखी हैला प्रभु तार सेइ गुणे ॥ 60 ॥ अनुवाद-श्रीपरमेश्वर सरल स्नेहके कारण वाक्-चतुरायी नहीं जानते थे, महाप्रभु उनके इसी गुणके कारण हृदयमें बहुत प्रसन्न हुए ॥ 60 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'मुकुन्दकी माता आयी हैं, '-यह बात संन्यासीसे बोलना-केवल पूर्व-स्नेहके कारण सरलतामात्र है। स्नेहके कारण सरलता कभी भी शुद्ध-वैदग्धी अर्थात् शुद्ध वाक्-चातुर्यको नहीं जानती ॥ 60 ॥ अनुभाष्य-पाठान्तरमें, - 'प्रश्रय-पागल शुद्ध-वैदग्धी ना जानें'; 'प्रश्रय' शब्दका अर्थ स्नेह, स्नेहयुक्त सम्मान, विनय, विश्वास, आबदार [बाल-हठ] है। 'प्रागल्भ्य'-शब्दका अर्थ प्रगल्भता, औधत्य, तेजस्विता है; 'वैदग्धी'- शब्दका अर्थ चतुरता, रसिकता, शोभा, पटुता, पाण्डित्य, कौशल, भङ्गिमा है ॥ 60 ॥ गुण्डिचा-मार्जन और रथके आगे नृत्य :- पूर्ववत् सबा लञा गुण्डिचा-मार्जन। रथ-आगे पूर्ववत् करिला नर्त्तन ॥ 61 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने पूर्व वर्षोंकी भाँति सभी भक्तोंके साथ गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया और रथके आगे नृत्य किया ॥ 61 ॥ ईश्वरकी यात्रादिके दर्शनके अन्तमें श्रीवासपत्नीके द्वारा महाप्रभुको भिक्षा-प्रदान :- चातुर्मास्य सब यात्रा कैला दरशन। मालिनी प्रभृति प्रभुरे कैला निमन्त्रण ॥ 62 ॥ अनुवाद-गौड़ीय भक्तोंने चातुर्मास्यके अन्तर्गत आनेवाले समस्त महोत्सवोंके दर्शन किये। श्रीमालिनी आदि महिला भक्तोंने अपने पतियोंके माध्यमसे महाप्रभुको निमन्त्रण किया ॥ 62 ॥ प्रभुर प्रिय नाना द्रव्य आनियाछे देश हैते। सेइ व्यञ्जन करि' भिक्षा देन घर-भाते ॥ 63 ॥ अनुवाद-सभी महिला भक्त अपने साथ गौड़देशसे महाप्रभुको प्रिय लगनेवाले अनेक द्रव्य लायी थीं, उन्होंने उन द्रव्योंके साथ घरमें ही चावल-सब्जी आदि बनाकर महाप्रभुको भोजन करवाया ॥ 63 ॥ दिनमें भक्तोंके साथ सङ्कीर्तन, रात्रिमें निर्जनमें कृष्ण-विरह :- दिने नाना क्रीड़ा करे लञा भक्तगण। रात्र्ये कृष्ण-विच्छेदे प्रभु करेन रोदन ॥ 64 ॥ अनुवाद-महाप्रभु दिनके समय भक्तोंको साथमें लेकर अनेक प्रकारकी लीलाएँ करते थे, किन्तु रात्रिमें कृष्ण-विरहमें विलाप करते थे ॥ 64 ॥ चातुर्मास्यके अन्तमें गौड़-गमनके पहले भक्तोंके प्रति महाप्रभुकी उक्ति :- एइमत नाना लीलाय चातुर्मास्य गेल। गौड़देशे याइते तबे भक्ते आज्ञा दिल ॥ 65 ॥ अनुवाद-महाप्रभुका इस प्रकार अनेक लीलाएँ करते हुए चातुर्मास्यका समय व्यतीत हो गया, तब उन्होंने भक्तोंको गौड़देश लौट जानेकी आज्ञा दी ॥ 65 ॥ सब भक्त करेन महाप्रभुर निमन्त्रण। सर्वभक्ते कहेन प्रभु मधुर वचन ॥ 66 ॥
[ 12/66-77 बारहवाँ अध्याय 313
भक्तके दुःखमें भगवान्का दुःख :- “प्रतिवर्षे आइस सबे आमारे देखिते। आसिते याइते दुःख पाओ बहुमते ॥ 67 ॥ भक्तोंके दुःखके कारण महाप्रभुके द्वारा उनके दर्शनोंके लिये निषेध-आज्ञा, किन्तु भक्तसङ्गका लोभ :- तोमा-सबार दुःख जानि' चाहि निषेधिते। तोमा-सबार सङ्गसुखे लोभ बाड़े चित्ते ॥ 68 ॥ अनुवाद—सभी गौड़ीय भक्त महाप्रभुको निमन्त्रण देते। महाप्रभु उन सबसे इस प्रकारके मधुर वचन कहते,—“आप सभी प्रतिवर्ष मुझसे मिलनेके लिये आते हैं और आने-जानेमें आपको बहुत कष्ट होता है। आप सभीके कष्टको जानकर मैं आपको यहाँ आनेके लिये मना करना चाहता हूँ, किन्तु आप सभीके सङ्गसे मुझे इतना सुख होता है कि मेरे मनमें आपका सङ्ग प्राप्त करनेका लोभ वर्धित होता है ॥ 66-68 ॥ भगवान्के द्वारा भक्तोंके गुणोंका कीर्तन :- नित्यानन्दे आज्ञा दिलुँ गौड़ेते रहिते। आज्ञा लङ्घि' आइला, कि पारि बलिते?? 69 ॥ अनुवाद—मैंने श्रीनित्यानन्दको गौड़देशमें रहनेके लिये आज्ञा दी थी, किन्तु वे मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन करके आ गये हैं। मैं उन्हें क्या कह सकता हूँ? 69 ॥ आइलेन आचार्य-गोसाञि मोरे कृपा करि'। प्रेम-ऋणे बद्ध आमि, शुधिते ना पारि ॥ 70 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य गोसाईं मुझपर कृपा करके श्रीजगन्नाथपुरी आये हैं। मैं उनके प्रेमके ऋणसे बँधा हुआ हूँ, मैं उनके ऋणको चुका नहीं सकता ॥ 70 ॥ मोर लागि' स्त्री-पुत्र-गृहादि छाड़िया। नाना दुर्गम पथ लङ्घि' आइसेन धाञा ॥ 71 ॥ भक्तोंकी महाप्रभुके प्रति प्रीतिकी तुलनामें अपनी भक्तोंके प्रति प्रीतिके अभावरूपी दीनताका ज्ञापन :- आमि एइ नीलाचले रहि ये बसिया। परिश्रम नाहि मोर सबार लागिया ॥ 72 ॥
भक्तोंके प्रति अपना चुकाया नहीं जा सकनेवाला ऋण :- संन्यासी मानुष मोर, नाहि कोन धन। कि दिया तोमार ऋण करिमु शोधन?? 73 ॥ ऋणको चुकानेके उपायका वर्णन :- देहमात्र धन तोमाय कैलुँ समर्पण। ताँहा बिकाइ, याँहा बेचिते तोमार मन ॥” 74 ॥ अनुवाद—आप लोग मेरे लिये अपनी स्त्री-पुत्र- गृहादिको छोड़कर अनेक दुर्गम पथोंको पार करके दौड़कर आ जाते हैं। मैं तो यहाँ नीलाचलमें ही बैठा रहता हूँ, मैं आप सबके लिये कोई भी परिश्रम नहीं करता। मैं संन्यासी हूँ और मेरे पास कोई धन भी नहीं है। मैं क्या देकर आप लोगोंके ऋणको चुकाऊँगा? मेरे पास तो केवल अपना देहरूपी धन है, मैं उसको आपको समर्पित करता हूँ। आप लोग उसे जहाँ बेचना चाहेंगे, मैं वहीं बिक जाऊँगा॥” 71-74 ॥ भगवान्की दैन्य-विलापोक्तिको सुनकर भक्तोंका क्रन्दन :- प्रभुर वचने सबार प्रीत हैल मन। अझोर-नयने सबे करेन क्रन्दन ॥ 75 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके मधुर वचन सुनकर सभीके मनमें बहुत सुख हुआ और आनन्दके कारण सभीके नेत्रोंसे अविरल अश्रुओँकी धारा प्रवाहित होने लगी तथा सभी क्रन्दन करने लगे ॥ 75 ॥ भक्तोंको भगवान्के द्वारा आलिङ्गन :- प्रभु सबार गला धरि' करेन रोदन। कान्दिते कान्दिते सबाय कैला आलिङ्गन ॥ 76 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सभी भक्तोंको गले लगाकर रोने लगे। उन्होंने रोते-रोते सभीको आलिङ्गन किया ॥ 76 ॥ विरह-दुःखके भारके कारण सभीका जानेमें विलम्ब :- सबाइ रहिल, केह चलिते नारिल। आर दिन पाँच-सात एइमते गेल ॥ 77 ॥ अनुवाद—भावी विरह-दुःखके कारण कोई भी
314 | श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला | 12/77–87 ]
[बायाँ स्तम्भ]
भक्त गौड़देशके लिये चल नहीं पाया, सभी श्रीजगन्नाथ पुरीमें ही रुक गये। इस प्रकार पाँच-सात दिन और व्यतीत हो गये॥77॥
श्रीनित्यानन्द-अद्वैतके द्वारा महाप्रभुके वात्सल्यका वर्णन :— अद्वैत-अवधूत किछु कहे प्रभु-पाय। “सहजे तोमार गुणे जगत् बिकाय॥78॥
भगवद्वात्सल्य-प्रेममें भक्त आबद्ध :— आबार ताते बान्ध’-ऐछे कृपा-वाक्य-डोरे। तोमा छाड़ि’ केबा काँहा याइबारे पारे? ?’79॥
अनुवाद— श्रीअद्वैताचार्य और अवधूत श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन करते हुए कहा,—“आपके गुणोंसे सहज ही सम्पूर्ण जगत् आपके हाथों बिक जाता है। उसपर भी आप अपने ऐसे कृपा-वाक्योंकी डोरसे बाँध रहे हैं। तब आपको छोड़कर कोई कहाँ जा सकता है?”78–79॥
सभीको सान्त्वना और विदायी देना :— तबे प्रभु सबाकारे प्रबोध करिया। सबारे विदाय दिला सुस्थिर हञा॥80॥
अनुवाद— तब महाप्रभुने गौड़देशके समस्त भक्तोंको सान्त्वना दी और उन्होंने सुस्थिर होकर सभीको विदायी दी॥80॥
श्रीनित्यानन्दके प्रति आज्ञा :— नित्यानन्दे कहिला,—“तुमि ना आसिह बारबार। तथाइ आमार सङ्ग हइबे तोमार॥”81॥
अनुवाद— महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे कहा,—“आप बार-बार श्रीजगन्नाथपुरीमें मत आइये। आपको गौड़देशमें ही मेरा सङ्ग प्राप्त होगा॥”81॥
भक्त और भगवान्-परस्पर प्रेममें आबद्ध, दोनोंका ही दोनोंके विच्छेदमें विषाद :— चले सब भक्तगण रोदन करिया। महाप्रभु रहिला घरे विषण्ण हञा॥82॥
[दायाँ स्तम्भ]
अनुवाद— सभी भक्त लोग रोते-रोते गौड़देशकी ओर चल दिये। महाप्रभु दुःखी होकर अपने वासस्थानपर ही रह गये॥82॥
भगवान्का वात्सल्य-ऋण भी भक्तोंके द्वारा नहीं चुकाया जा सकनेवाला :— निज-कृपागुणे प्रभु बान्धिला सबारे। महाप्रभुर कृपा-ऋण के शोधिते पारे? ?83॥
अनुवाद— महाप्रभुने सभी भक्तोंको अपने कृपारूपी गुणके द्वारा बाँध लिया, महाप्रभुके कृपा-ऋणको कौन चुका सकता है? 83॥
सर्वेश्वरेश्वर महाप्रभु ही परिचालक, भक्त ही चलनेवाले :— यारे यैछे नाचाय प्रभु स्वतन्त्र ईश्वर। ताते ताँरे छाड़ि’ लोक याय देशान्तर॥84॥
अनुवाद— महाप्रभु स्वतन्त्र ईश्वर हैं और वे सभीको अपनी इच्छानुसार नचाते हैं। इसके द्वारा ही सम्भव हुआ कि भक्त महाप्रभुको छोड़कर विभिन्न स्थानोंमें अपने-अपने घरकी ओर चल दिये॥84॥
काष्ठेर पुतली येन कुहके नाचाय। ईश्वर-चरित्र किछु बुझन ना याय॥85॥
अनुवाद— बाजीगर जैसे लकड़ीकी पुतलीको नचाता है, उसी प्रकार ईश्वरके स्वभावको कोई भी समझ नहीं पाता॥85॥
श्रीजगदानन्दका नवद्वीपमें श्रीशचीके निकट आगमन और प्रणाम करनेके बाद महाप्रभुके द्वारा दिये गये द्रव्योंको प्रदान करना :— पूर्ववर्षे जगदानन्द ‘आइ’ देखिबारे। प्रभु-आज्ञा लञा आइला नदीया-नगरे॥86॥ आइर चरण याइ’ करिला वन्दन। जगन्नाथेर वस्त्र-प्रसाद कैला निवेदन॥87॥
अनुवाद— पिछले वर्ष श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुकी