भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2325, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2325

308 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/21-30 ] अनुवाद—इस शापको सुनकर श्रीशिवानन्द सेनकी पत्नी विलाप करने लगीं, उसी समय श्रीशिवानन्द सेन करका भुगतान करके लौट आये॥21॥ शिवानन्देर पत्नी ताँरे कहेन कान्दिया। “पुत्रे शाप दिछेन गोसाञि वासा ना पाञा॥”22॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनकी पत्नी रोते हुए उनसे कहने लगीं,—“श्रीनित्यानन्द गोसाईंको रहनेका स्थान नहीं मिला, इसलिये उन्होंने हमारे पुत्रोंको मरनेका शाप दिया है॥”22॥ श्रीशिवानन्दके द्वारा पत्नीको आश्वासन :— तेंहो कहे,—“बाउलि, केने मरिस् कान्दिया? मरुक आमार तिन पुत्र ताँर बालाइ लञा॥”23॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने कहा,—“पगली, तुम रो-रोकर हताश क्यों हो रही है? उन्हें जो कष्ट मेरे कारण हुआ है, उसके लिये मेरे तीनों पुत्र मरते हैं तो मर जाँय॥”23॥ अनुभाष्य—‘बाउली’,—‘पगली’; पाठान्तरमें, ‘बाउनी’,— ब्राह्मणी; शौक्र-ब्राह्मण नहीं होनेपर भी उन दिनों भद्र महिलाओंको वैसा कहकर पुकारना उचित था॥23॥ श्रीशिवानन्दको श्रीनित्यानन्दके चरणके आघातरूपी सौभाग्यकी प्राप्ति :— एत बलि’ प्रभु-पाशे गेला शिवानन्द। उठि’ ताँरे लाथि माइला प्रभु-नित्यानन्द॥24॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीशिवानन्द सेन श्रीनित्यानन्द प्रभुके पास गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उठकर उन्हें लात मारी॥24॥ आनन्दित हैला शिवाइ पादप्रहार पाञा। शीघ्र वासा-घर कैला गौड़-घरे गिया॥25॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन लात खाकर बड़े आनन्दित हुए और उन्होंने शीघ्र ही किसी ग्वालेके घरमें जाकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके रहनेकी व्यवस्था की॥25॥ अनुभाष्य—‘गौड़-घरे’,—ग्वालेके घरमें॥25॥ श्रीनित्यानन्द प्रभुको उनके लिये चुने घरमें लाकर उनकी स्तुति :— चरणे धरिया प्रभुरे वासाय लञा गेला। वासा दिया हृष्ट हञा कहिते लागिला॥26॥ निजजन मानकर ही प्रभुके द्वारा सेवककी भर्त्सना :— “आजि मोरे भृत्य करि’ अङ्गीकार कैला। येमन अपराध भृत्येर्, योग्य फल दिला॥27॥ ईश्वरके द्वारा दिया दण्ड अथवा दुःख ही ढकी हुई परमकृपा और सुख :— ‘शास्ति’-छले कृपा कर,—ए तोमार ‘करुणा’। त्रिजगते तोमार चरित्र बुझे कोन् जना?28॥ साक्षात् सर्वेश्वरेश्वर श्रीनित्यानन्द-पदधूलिको प्राप्त करनेपर ही पुरुषार्थ श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :— ब्रह्मार दुर्लभ तोमार श्रीचरण-रेणु। हेन-चरण स्पर्श पाइल मोर अधम तनु॥29॥ आजि मोर सफल हैल जन्म, कुल, धर्म। आजि पाइनु कृष्णभक्ति, अर्थ, काम, धर्म॥”30॥ अनुवाद—तब श्रीशिवानन्द सेनने आकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंको पकड़ लिया और उनसे प्रार्थना करके उन्हें वासस्थानपर ले गये। श्रीशिवानन्द सेन उनको वहाँ ठहराकर कहने लगे,—“आज आपने मुझे अपना दास मानकर अङ्गीकार किया है। आपने दासके अपराधके अनुरूप ही उसे उचित फल प्रदान किया है। आप दण्डके छलसे कृपा करते हैं, यह वास्तवमें आपकी करुणा ही है। आपकी लीलाको त्रिभुवनमें कौन समझ सकता है? आपके श्रीचरणकमलोंकी धूलि ब्रह्माके लिये भी दुर्लभ है और आपके उन श्रीचरणकमलोंने मेरी अधम देहको स्पर्श किया है। आज मेरा जन्म, कुल और मेरे सब कार्य सफल हो गये हैं। आज मुझे धर्म, अर्थ, काम और इन सबसे श्रेष्ठ कृष्णभक्तिकी प्राप्ति हुई है॥”26-30॥