श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 12/14-21 बारहवाँ अध्याय 307
अनुवाद—सभी भक्तोंने पहले श्रीशचीमाताके दर्शन किये और उनकी आज्ञा ली। तब वे आनन्दपूर्वक कृष्ण-कीर्तन करते हुए श्रीजगन्नाथ पुरीकी ओर चल दिये ॥ 14 ॥
सम्पन्न श्रीशिवानन्दके द्वारा मार्गका कर देना और भक्तोंको साथ लाते हुए उनकी सेवा :— शिवानन्द-सेन करे घाटी-समाधान। सबारे पालन करि' सुखे लञा यान॥ 15 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द-सेन मार्गमें सब प्रकारके कर-शुल्क आदि देते हुए और सभीका पालन करते हुए सुखपूर्वक उन्हें श्रीजगन्नाथपुरी लेकर जा रहे थे॥ 15 ॥
अनुभाष्य—'घाटि-समाधान,'—जमींदारके अधिकार क्षेत्रमें यात्रियों अथवा पथिकोंके आवागमन करनेपर ही कर लिया जाता था। पहलेसे ही पथकर जमा नहीं कराये जानेपर, मार्ग-घाटके मालिक ही यह कर प्राप्त करते थे। श्रीशिवानन्द-सेन जगन्नाथपुरीकी ओर जा रहे यात्रियोंके द्वारा देय पथकरको स्थान-स्थानपर घाटपालोंको चुका देते थे॥ 15 ॥
श्रीशिवानन्दको उड़ीसाके पथके विषयमें पूर्ण जानकारी :— सबार सब कार्य करेन, देन वासस्थान। शिवानन्द जाने उड़िया-पथेर सन्धान ॥ 16 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन सभी भक्तोंकी सब प्रकारसे देखभाल करते थे और उन्हें मार्गमें आवश्यकतानुसार वासस्थान प्रदान करते थे। श्रीशिवानन्द सेन उड़ीसा जानेके मार्गको भली-भाँति जानते थे ॥ 16 ॥
अनुभाष्य—'उड़िया-पथेर,'—उड़ीसा जानेके मार्गके ॥ 16 ॥
एकदिन सबलोक घाटिते राखिला। सबा छाड़ाञा शिवानन्द अकेला रहिला ॥ 17 ॥
अनुवाद—एकदिन घाटपालने समस्त भक्तोंको रोक लिया, किन्तु श्रीशिवानन्द सेनने उन सबको छुड़ाकर आगे भेज दिया और स्वयं अकेले पथकर देनेके लिये वहीं रह गये ॥ 17 ॥
अनुभाष्य—घाटपाल अन्यायपूर्वक यात्रियोंसे अधिक कर लेने और निर्धारित करसे अतिरिक्त राशि प्राप्त करनेके लिये यात्रियोंको घाटीपर अटकाकर रखते थे। श्रीशिवानन्दने सभी यात्रियोंकी ओरसे स्वयं उनका दायित्व लेकर उन्हें छुड़ा दिया ॥ 17 ॥
सबे गिया रहिला ग्राम-भितर वृक्षतले। शिवानन्द बिना वासस्थान नाहि मिले ॥ 18 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके नहीं होनेके कारण उन्हें वासस्थान नहीं मिल सकता था, इसलिये सभी भक्त गाँवके अन्दर जाकर वृक्षके नीचे बैठ गये ॥ 18 ॥
श्रीनित्यानन्दका अप्राकृत व्रजगोपबालकके वेशमें भूखके कारण श्रीशिवानन्दपर कृत्रिम रोषाभासका प्रदर्शन :— नित्यानन्दप्रभु भोके व्याकुल हञा। शिवानन्दे गालि पाड़े वासा ना पाञा ॥ 19 ॥ “तिन पुत्र मरुक शिवार, एखन ना आइल। भोके मरि' गेनु, मोरे वासा ना देओयाइल॥” 20 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु भूखसे व्याकुल हो रहे थे और उन्हें रहनेके लिये स्थान भी नहीं मिला, इसलिये वे श्रीशिवानन्द सेनको गाली निकालते हुए कहने लगे,—“शिवानन्द अभी तक भी नहीं आया है। मैं भूखसे मर रहा हूँ और ऊपरसे उसने मुझे रहनेका स्थान भी नहीं दिलवाया, इसलिये उसके तीनों पुत्र मर जाँय ॥” 19-20 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भोके,'—भूखसे ॥ 19 ॥
श्रीनित्यानन्दके शापको सुनकर श्रीशिवानन्दकी पत्नीका रोदन और श्रीशिवानन्दको शापके वृत्तान्तका वर्णन :— शुनि' शिवानन्देर पत्नी कान्दिते लागिला। हेनकाले शिवानन्द घाटि हैते आइला ॥ 21 ॥