श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें306 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/4-14 ] होनेके कारण महाप्रभुका हृदय अत्यन्त दुःखी रहता था और वे यह कहकर विलाप करते, — “हा हा कृष्ण! हे प्राणनाथ! हे व्रजेन्द्रनन्दन! मैं कहाँ जाऊँ? कहाँ जानेसे हे मुरलीवदन आप मिलेंगे!”4-5 ॥ दिन-रात श्रीकृष्णविरहकी ज्वाला :- रात्रिदिन एइ दशा, स्वस्ति नाहि मने। कष्टे रात्रि गोङाय स्वरूप-रामानन्द-सने॥ 6 ॥ अनुवाद—महाप्रभु रात-दिन इसी दशामें रहते। मनमें कभी शान्ति नहीं होनेपर वे श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायके साथ अत्यन्त कष्टमें रात्रि व्यतीत करते॥ 6 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—'स्वास्थ्य नाहि माने' (अर्थात् मनमें शान्ति नहीं थी अथवा मनमें दुःखका अभाव नहीं था)॥ 6 ॥ प्रत्येक वर्षकी भाँति गौड़ीयभक्तोंका महाप्रभुके दर्शनके लिये पुरीमें आनेका प्रयास :- एथा गौड़देशे प्रभुर यत भक्तगण। प्रभु देखिबारे सबे करिला गमन॥ 7 ॥ अनुवाद—इधर गौड़देशमें महाप्रभुके जितने भक्त थे, वे सभी महाप्रभुके दर्शनोंके लिये चल पड़े॥ 7 ॥ सभी भक्तोंका नवद्वीपमें आगमन :- शिवानन्द-सेन आर आचार्य-गोसाञि। नवद्वीपे सब भक्त हैला एकठाञि॥ 8 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन और श्रीअद्वैताचार्य गोसाईं आदि समस्त भक्त श्रीनवद्वीपमें एकत्रित हुए॥ 8 ॥ कुलीनग्रामवासी आर यत खण्डवासी। एकत्र मिलिला सब नवद्वीपे आसि' ॥ 9 ॥ अनुवाद—कुलीनग्रामवासी और श्रीखण्डवासी सब भक्त भी नवद्वीपमें आकर एकत्रित हुए॥ 9 ॥ महाप्रभुके द्वारा निषेध किये जानेपर भी श्रीनित्यानन्दकी यात्रा :- नित्यानन्द-प्रभुरे यद्यपि आज्ञा नाइ। तथापि देखिते चलेन चैतन्य-गोसाञि॥ 10 ॥ अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको आनेके लिये निषेध किया था, तथापि वे श्रीचैतन्य महाप्रभुके दर्शनके लिये श्रीजगन्नाथ पुरीकी ओर चल पड़े॥ 10 ॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला 10/5-8 संख्या देखें॥ 10 ॥ सपरिवार गृहस्थ गौरभक्तोंके द्वारा यात्रा :- श्रीवासादि चारि भाइ, सङ्गेते मालिनी। आचार्यरत्नेर सङ्गे ताँहार गृहिणी॥ 11 ॥ अनुवाद—श्रीवास पण्डितादि चारों भाई और उनके साथमें श्रीवास पण्डितकी पत्नी श्रीमालिनी देवी भी जगन्नाथ पुरीकी ओर चले। इसी प्रकार श्रीआचार्यरत्न भी अपनी पत्नीके साथ आये॥ 11 ॥ शिवानन्द-पत्नी चले तिन-पुत्र लञा। राघवपण्डित चले झालि साजाञा॥ 12 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनकी पत्नी भी अपने तीनों पुत्रोंको साथमें लेकर चल दीं। श्रीराघव पण्डित अपनी झोलीको सजाकर चले॥ 12 ॥ दत्त, गुप्त, विद्यानिधि, आर यत जन। दुइ-तिन शत भक्त करिला गमन॥ 13 ॥ अनुवाद—श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि और अन्य बहुतसे भक्त महाप्रभुसे मिलनेके लिये चले। कुल मिलाकर दो-तीन सौ भक्त एक साथ श्रीजगन्नाथपुरीकी ओर चल दिये॥ 13 ॥ शचीमाताको प्रणाम करके कीर्तन करते हुए सभीके द्वारा यात्रा :- शचीमाता देखि' सबे ताँर आज्ञा लञा। आनन्दे चलिला कृष्णकीर्त्तन करिया॥ 14 ॥