श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2322, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय कथासार—महाप्रभुका रात्रिमें प्रेमविकार और दिनमें भी उसकी आलोचना चलने लगी। इधर (भक्तोंके साथ) गौड़देशसे श्रीशिवानन्द-सेनने अपनी पत्नी और तीनों पुत्रोंको साथ लेकर यात्रा की। मार्गमें श्रीनित्यानन्दप्रभुको वासस्थान प्राप्त करनेमें देरी होनेपर उन्होंने श्रीशिवानन्दके प्रति प्रेमकोप दिखाकर लात मारी थी। श्रीशिवानन्दके उससे कृतार्थ होनेपर भी उनका भाँजा श्रीकान्त-सेन दुःखी होकर पहले ही महाप्रभुके पास चला गया। उस वर्ष परमेश्वरदास-मोदक सपरिवार महाप्रभुके दर्शनोंके लिये गये थे। पूर्व-पूर्व वर्षोंकी भाँति भक्तोंने महाप्रभुको निमन्त्रण किया। उनकी विदायीके समय महाप्रभुने अनेक विनय-वाक्य प्रकाशित किये। पिछले वर्ष श्रीजगदानन्द-पण्डितको श्रीशचीमाताके लिये प्रसाद-वस्त्र साथ लेकर भेजा गया था। श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीशिवानन्दके घरसे 'चन्दनादि' नामक सुगन्धित तेलको एक कलसी (मटकी)में लेकर आये और उन्होंने उस तेलको श्रीगोविन्दको देकर उन्हें महाप्रभुके सिरपर लगानेकी प्रार्थना की। महाप्रभुके द्वारा उस तेलको स्वीकार नहीं करनेपर, श्रीजगदानन्दने उस तेल-सहित मटकीको फेंककर तोड़ दिया और दो दिन तक उपवास किया। महाप्रभुने उन्हें शान्त करनेके लिये उनसे भिक्षाके (भोजनके) लिये प्रार्थना की, श्रीजगदानन्द पण्डितने अन्न-व्यञ्जन आदि पकाकर महाप्रभुकी सेवा करके प्रसादादि ग्रहण किया। —(अमृतप्रवाह भाष्य) भक्तोंको सदैव श्रीचैतन्यचरितामृतके श्रवण, कीर्तन और स्मरण करनेका अनुरोध :— श्रूयतां श्रूयतां नित्यं गीयतां गीयतां मुदा। चिन्त्यतां चिन्त्यतां भक्ताश्चैतन्यचरितामृतम् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे भक्तगण, इस चैतन्यचरितामृतका नित्य श्रवण करो, गान करो और आनन्दपूर्वक चिन्तन करो॥ 1 ॥ अनुभाष्य— हे भक्ताः, मुदा (आनन्देन) चैतन्यचरितामृतं नित्यं (पुनः पुनः) श्रूयतां श्रूयतां, (पुनः पुनः) गीयतां गीयतां, (पुनः पुनः) चिन्त्यतां, चिन्त्यताम्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय दयामय। जय जय नित्यानन्द कृपासिन्धु जय ॥ 2 ॥ अनुवाद—दयामय श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो। कृपासिन्धु श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो॥ 2 ॥ जयाद्वैतचन्द्र जय करुणा सागर। जय गौरभक्तगण कृपा-पूर्णान्तर ॥ 3 ॥ अनुवाद—करुणाके सागर श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, जय हो। हृदयमें कृपासे परिपूर्ण श्रीगौरभक्तोंकी जय हो॥ 3 ॥ महाप्रभुकी कृष्ण-विरहकी स्फूर्ति :— अतःपर महाप्रभु विषण्ण-अन्तर । कृष्णेर वियोग-दशा स्फुरे निरन्तर ॥ 4 ॥ महाप्रभुकी कृष्णसङ्गके लिये व्याकुलता :— “हा हा कृष्ण प्राणनाथ व्रजेन्द्रनन्दन ! काँहा याङ, काँहा पाङ मुरलीवदन ! !” 5 ॥ अनुवाद—हृदयमें निरन्तर कृष्णसे वियोग-दशा स्फुरित