श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2330, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 12/66-77 बारहवाँ अध्याय 313
भक्तके दुःखमें भगवान्का दुःख :- “प्रतिवर्षे आइस सबे आमारे देखिते। आसिते याइते दुःख पाओ बहुमते ॥ 67 ॥ भक्तोंके दुःखके कारण महाप्रभुके द्वारा उनके दर्शनोंके लिये निषेध-आज्ञा, किन्तु भक्तसङ्गका लोभ :- तोमा-सबार दुःख जानि' चाहि निषेधिते। तोमा-सबार सङ्गसुखे लोभ बाड़े चित्ते ॥ 68 ॥ अनुवाद—सभी गौड़ीय भक्त महाप्रभुको निमन्त्रण देते। महाप्रभु उन सबसे इस प्रकारके मधुर वचन कहते,—“आप सभी प्रतिवर्ष मुझसे मिलनेके लिये आते हैं और आने-जानेमें आपको बहुत कष्ट होता है। आप सभीके कष्टको जानकर मैं आपको यहाँ आनेके लिये मना करना चाहता हूँ, किन्तु आप सभीके सङ्गसे मुझे इतना सुख होता है कि मेरे मनमें आपका सङ्ग प्राप्त करनेका लोभ वर्धित होता है ॥ 66-68 ॥ भगवान्के द्वारा भक्तोंके गुणोंका कीर्तन :- नित्यानन्दे आज्ञा दिलुँ गौड़ेते रहिते। आज्ञा लङ्घि' आइला, कि पारि बलिते?? 69 ॥ अनुवाद—मैंने श्रीनित्यानन्दको गौड़देशमें रहनेके लिये आज्ञा दी थी, किन्तु वे मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन करके आ गये हैं। मैं उन्हें क्या कह सकता हूँ? 69 ॥ आइलेन आचार्य-गोसाञि मोरे कृपा करि'। प्रेम-ऋणे बद्ध आमि, शुधिते ना पारि ॥ 70 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य गोसाईं मुझपर कृपा करके श्रीजगन्नाथपुरी आये हैं। मैं उनके प्रेमके ऋणसे बँधा हुआ हूँ, मैं उनके ऋणको चुका नहीं सकता ॥ 70 ॥ मोर लागि' स्त्री-पुत्र-गृहादि छाड़िया। नाना दुर्गम पथ लङ्घि' आइसेन धाञा ॥ 71 ॥ भक्तोंकी महाप्रभुके प्रति प्रीतिकी तुलनामें अपनी भक्तोंके प्रति प्रीतिके अभावरूपी दीनताका ज्ञापन :- आमि एइ नीलाचले रहि ये बसिया। परिश्रम नाहि मोर सबार लागिया ॥ 72 ॥
भक्तोंके प्रति अपना चुकाया नहीं जा सकनेवाला ऋण :- संन्यासी मानुष मोर, नाहि कोन धन। कि दिया तोमार ऋण करिमु शोधन?? 73 ॥ ऋणको चुकानेके उपायका वर्णन :- देहमात्र धन तोमाय कैलुँ समर्पण। ताँहा बिकाइ, याँहा बेचिते तोमार मन ॥” 74 ॥ अनुवाद—आप लोग मेरे लिये अपनी स्त्री-पुत्र- गृहादिको छोड़कर अनेक दुर्गम पथोंको पार करके दौड़कर आ जाते हैं। मैं तो यहाँ नीलाचलमें ही बैठा रहता हूँ, मैं आप सबके लिये कोई भी परिश्रम नहीं करता। मैं संन्यासी हूँ और मेरे पास कोई धन भी नहीं है। मैं क्या देकर आप लोगोंके ऋणको चुकाऊँगा? मेरे पास तो केवल अपना देहरूपी धन है, मैं उसको आपको समर्पित करता हूँ। आप लोग उसे जहाँ बेचना चाहेंगे, मैं वहीं बिक जाऊँगा॥” 71-74 ॥ भगवान्की दैन्य-विलापोक्तिको सुनकर भक्तोंका क्रन्दन :- प्रभुर वचने सबार प्रीत हैल मन। अझोर-नयने सबे करेन क्रन्दन ॥ 75 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके मधुर वचन सुनकर सभीके मनमें बहुत सुख हुआ और आनन्दके कारण सभीके नेत्रोंसे अविरल अश्रुओँकी धारा प्रवाहित होने लगी तथा सभी क्रन्दन करने लगे ॥ 75 ॥ भक्तोंको भगवान्के द्वारा आलिङ्गन :- प्रभु सबार गला धरि' करेन रोदन। कान्दिते कान्दिते सबाय कैला आलिङ्गन ॥ 76 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सभी भक्तोंको गले लगाकर रोने लगे। उन्होंने रोते-रोते सभीको आलिङ्गन किया ॥ 76 ॥ विरह-दुःखके भारके कारण सभीका जानेमें विलम्ब :- सबाइ रहिल, केह चलिते नारिल। आर दिन पाँच-सात एइमते गेल ॥ 77 ॥ अनुवाद—भावी विरह-दुःखके कारण कोई भी