भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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314 | श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला | 12/77–87 ]


[बायाँ स्तम्भ]

भक्त गौड़देशके लिये चल नहीं पाया, सभी श्रीजगन्नाथ पुरीमें ही रुक गये। इस प्रकार पाँच-सात दिन और व्यतीत हो गये॥77॥

श्रीनित्यानन्द-अद्वैतके द्वारा महाप्रभुके वात्सल्यका वर्णन :— अद्वैत-अवधूत किछु कहे प्रभु-पाय। “सहजे तोमार गुणे जगत् बिकाय॥78॥

भगवद्वात्सल्य-प्रेममें भक्त आबद्ध :— आबार ताते बान्ध’-ऐछे कृपा-वाक्य-डोरे। तोमा छाड़ि’ केबा काँहा याइबारे पारे? ?’79॥

अनुवाद— श्रीअद्वैताचार्य और अवधूत श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन करते हुए कहा,—“आपके गुणोंसे सहज ही सम्पूर्ण जगत् आपके हाथों बिक जाता है। उसपर भी आप अपने ऐसे कृपा-वाक्योंकी डोरसे बाँध रहे हैं। तब आपको छोड़कर कोई कहाँ जा सकता है?”78–79॥

सभीको सान्त्वना और विदायी देना :— तबे प्रभु सबाकारे प्रबोध करिया। सबारे विदाय दिला सुस्थिर हञा॥80॥

अनुवाद— तब महाप्रभुने गौड़देशके समस्त भक्तोंको सान्त्वना दी और उन्होंने सुस्थिर होकर सभीको विदायी दी॥80॥

श्रीनित्यानन्दके प्रति आज्ञा :— नित्यानन्दे कहिला,—“तुमि ना आसिह बारबार। तथाइ आमार सङ्ग हइबे तोमार॥”81॥

अनुवाद— महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे कहा,—“आप बार-बार श्रीजगन्नाथपुरीमें मत आइये। आपको गौड़देशमें ही मेरा सङ्ग प्राप्त होगा॥”81॥

भक्त और भगवान्-परस्पर प्रेममें आबद्ध, दोनोंका ही दोनोंके विच्छेदमें विषाद :— चले सब भक्तगण रोदन करिया। महाप्रभु रहिला घरे विषण्ण हञा॥82॥


[दायाँ स्तम्भ]

अनुवाद— सभी भक्त लोग रोते-रोते गौड़देशकी ओर चल दिये। महाप्रभु दुःखी होकर अपने वासस्थानपर ही रह गये॥82॥

भगवान्का वात्सल्य-ऋण भी भक्तोंके द्वारा नहीं चुकाया जा सकनेवाला :— निज-कृपागुणे प्रभु बान्धिला सबारे। महाप्रभुर कृपा-ऋण के शोधिते पारे? ?83॥

अनुवाद— महाप्रभुने सभी भक्तोंको अपने कृपारूपी गुणके द्वारा बाँध लिया, महाप्रभुके कृपा-ऋणको कौन चुका सकता है? 83॥

सर्वेश्वरेश्वर महाप्रभु ही परिचालक, भक्त ही चलनेवाले :— यारे यैछे नाचाय प्रभु स्वतन्त्र ईश्वर। ताते ताँरे छाड़ि’ लोक याय देशान्तर॥84॥

अनुवाद— महाप्रभु स्वतन्त्र ईश्वर हैं और वे सभीको अपनी इच्छानुसार नचाते हैं। इसके द्वारा ही सम्भव हुआ कि भक्त महाप्रभुको छोड़कर विभिन्न स्थानोंमें अपने-अपने घरकी ओर चल दिये॥84॥

काष्ठेर पुतली येन कुहके नाचाय। ईश्वर-चरित्र किछु बुझन ना याय॥85॥

अनुवाद— बाजीगर जैसे लकड़ीकी पुतलीको नचाता है, उसी प्रकार ईश्वरके स्वभावको कोई भी समझ नहीं पाता॥85॥

श्रीजगदानन्दका नवद्वीपमें श्रीशचीके निकट आगमन और प्रणाम करनेके बाद महाप्रभुके द्वारा दिये गये द्रव्योंको प्रदान करना :— पूर्ववर्षे जगदानन्द ‘आइ’ देखिबारे। प्रभु-आज्ञा लञा आइला नदीया-नगरे॥86॥ आइर चरण याइ’ करिला वन्दन। जगन्नाथेर वस्त्र-प्रसाद कैला निवेदन॥87॥

अनुवाद— पिछले वर्ष श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुकी