श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2332, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 12/86-97 बारहवाँ अध्याय 315 आज्ञा लेकर श्रीशचीमाताके दर्शन करनेके लिये नदीया-नगरमें आये थे। उन्होंने श्रीशचीमाताके चरणोंमें गिरकर उनकी वन्दना की और माताको भगवान् श्रीजगन्नाथका प्रसादी-वस्त्र और प्रसाद प्रदान किया था॥ 86-87 ॥ प्रभुर नामे मातारे दण्डवत् कैला। प्रभुर विनति-स्तुति मातारे कहिला ॥ 88 ॥ अनुवाद—उन्होंने श्रीशचीमाताको महाप्रभुका नाम लेकर उनकी ओरसे दण्डवत् प्रणाम किया और महाप्रभुके द्वारा की गयी विनती-स्तुति भी श्रीशचीमाताको सुनायी ॥ 88 ॥ श्रीशचीके द्वारा श्रीजगदानन्दसे पुत्रकी कथा-श्रवण :- जगदानन्दे पाञा माता आनन्दित मने। तेंहो प्रभुर कथा कहे, सुने रात्रि-दिने ॥ 89 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके आनेसे श्रीशचीमाताका मन बहुत प्रसन्न हो गया। वे महाप्रभुकी बातें बतलाते और श्रीशचीमाता दिन-रात उन्हें सुनतीं ॥ 89 ॥ श्रीशचीको बीच-बीचमें महाप्रभुके द्वारा प्रसन्नतापूर्वक माताके द्वारा बनाये गये भोजनके संवादके विषयमें बताना :- जगदानन्द कहे, — 'माता, कोन कोन दिने। तोमार एथा आसि' प्रभु करेन भोजने ॥ 90 ॥ भोजन करिया कहे आनन्दित हञा। 'माता आजि खाओयाइला आकण्ठ पूरिया ॥ 91 ॥ वात्सल्यसे परिपूर्ण होनेके कारण श्रीशचीके द्वारा महाप्रभुके साक्षात् भोजनको स्वप्न मानना :- आमि याइ' भोजन करि—माता नाहि जाने। साक्षाते खाइ आमि, तँहो 'स्वप्न' हेन माने।' ॥ ”92 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा,—'हे माता! महाप्रभु किसी-किसी दिन आपके यहाँपर आकर भोजन करते हैं। वे यहाँपर भोजन करनेके उपरान्त श्रीजगन्नाथ पुरीमें आनन्दित होकर कहते हैं—'आज माताने कण्ठ तक भरकर भोजन खिलाया है। मैं जगन्नाथ पुरीसे जाकर उनके द्वारा बनाया गया भोजन खाता हूँ, किन्तु माता इस बातको नहीं जानतीं। मैं साक्षात् रूपमें जाकर खाता हूँ और वे इसे स्वप्न मानती हैं।' ॥ ”90-92 ॥ श्रीशचीकी परम वात्सल्यपूर्ण उक्ति :- माता कहे, — 'कत रान्धि उत्तम व्यञ्जन। निमाञि इँहा खाय, — इच्छा हय मोर मन ॥ 93 ॥ निमाञि खाञाछे,—ऐछे हय मोर मन। पाछे ज्ञान हय, — मुञि देखिनु 'स्वप्न' ॥ ”94 ॥ अनुवाद—श्रीशचीमाताने कहा, — 'मैं कितने प्रकारके उत्तम व्यञ्जन बनाती हूँ और मेरे मनमें इच्छा होती है कि निमाइ उन्हें खाये। फिर मेरे मनमें ऐसा अनुभव भी होता है कि निमाइने मेरे द्वारा बनायी गयी सब वस्तुओंको खाया है, किन्तु बादमें मुझे ऐसा लगता है कि मैंने स्वप्न देखा है ॥ ”93-94 ॥ शचीमाता और गौड़ीय भक्तोंके साथ श्रीजगदानन्दका चैतन्य-कथामें परमसुखपूर्वक दिन व्यतीत करना :- एइमत जगदानन्द शचीमाता-सने। चैतन्येर सुख-कथा कहे रात्रि-दिने ॥ 95 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीशचीमाताके साथ रात-दिन श्रीचैतन्य महाप्रभुकी आनन्द प्रदान करनेवाली कथाएँ करते रहते ॥ 95 ॥ नदीयार भक्तगणे सबारे मिलिला। जगदानन्दे पाञा सबे आनन्दित हैला ॥ 96 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित नदीयाके अन्य सभी भक्तोंसे भी मिले थे। श्रीजगदानन्द पण्डितसे मिलकर सभी भक्त आनन्दित हुए थे ॥ 96 ॥ आचार्य मिलिते तबे गेला जगदानन्द। जगदानन्दे पाञा हैला आचार्य आनन्द ॥ 97 ॥