श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2333, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें316 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/97-107 ] अनुवाद—तब श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीअद्वैताचार्यसे मिलनेके लिये गये और श्रीजगदानन्द पण्डितको देखकर श्रीअद्वैताचार्य बहुत आनन्दित हुए थे॥97॥ वासुदेव, मुरारि-गुप्त जगदानन्दे पाञा। आनन्दे राखिला घरे, ना देन छाड़िया॥98॥ श्रीजगदानन्दके मुखसे श्रीचैतन्यकी कथा सुनकर सभीको आत्म-विस्मृति :— चैतन्येर मर्मकथा सुने ताँर मुखे। आपना पासरे सबे चैतन्य-कथा-सुखे ॥99॥ अनुवाद—श्रीवासुदेव दत्त और श्रीमुरारि गुप्तको श्रीजगदानन्द पण्डितको देखकर इतना आनन्द हुआ कि उन्होंने श्रीजगदानन्द पण्डितको अपने घरमें रखा और उनको कहीं जाने नहीं देते थे। वे उनके श्रीमुखसे श्रीचैतन्य महाप्रभुकी गूढ़ कथाओंको सुनते और महाप्रभुकी कथाओंके आनन्दमें स्वयंको भूल जाते थे॥98-99॥ जगदानन्द मिलिते याय येइ भक्त-घरे। सेइ सेइ भक्त सुखे आपना पासरे ॥ 100॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित जिस किसी भक्तके घरपर जाकर उससे मिलते, वह भक्त आनन्दसे स्वयंको भूल जाता था॥100॥ श्रीजगदानन्दकी गुणावली :— चैतन्येर प्रेमपात्र जगदानन्द धन्य। यारे मिले सेइ माने, -'पाइलुँ चैतन्य' ॥101 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके प्रेमके पात्र श्रीजगदानन्द पण्डित धन्य हैं। वे जिस किसी भक्तसे मिलते, वही मानता था कि उसे श्रीचैतन्य महाप्रभुका सङ्ग मिल गया है॥101॥ काञ्चनपल्लीसे चन्दनके तेलका संग्रह और पुरीमें जाकर महाप्रभुके व्यवहारके लिये श्रीगोविन्दको प्रदान :— शिवानन्दसेन-गृहे याञा रहिला। 'चन्दनादि' तैल ताँहा एकमात्र कैला ॥102 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित कुछ दिनों तक श्रीशिवानन्द सेनके घरपर भी जाकर रहे थे, उन्होंने वहींपर सोलह सेर [1 सेर=933 ग्राम] चन्दन आदिके तेलको एकत्रित किया था॥102॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'एकमात्रा',—सोलह सेर ॥ 102॥ सुगन्धि करिया तैल गागरी भरिया। नीलाचले लञा आइला यतन करिया ॥ 103॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने उस तेलमें कुछ सुगन्धित द्रव्योंको मिलाकर उसे एक घड़ेमें भर लिया और बड़ी सावधानीपूर्वक उसे नीलाचल श्रीजगन्नाथ पुरीमें ले आये॥103॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'गागरी',—घड़ा ॥ 103 ॥ गोविन्देर ठाञि तैल धरिया राखिला। “प्रभु-अङ्गे दिह' तैल”—गोविन्दे कहिला ॥ 104 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने उस तेलको श्रीगोविन्दके पास रखा और उनसे कहा, — "इस तेलको महाप्रभुके श्रीअङ्गोंपर लगाना॥" 104॥ श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुको श्रीजगदानन्दकी इच्छा बतलाना :— तबे प्रभु-ठाञि गोविन्द कैल निवेदन। “जगदानन्द चन्दनादि-तैल आनियाछेन ॥ 105 ॥ अप्राकृत नरशरीरधारी महाप्रभुके प्रति श्रीजगदानन्दका अप्राकृत अतुलनीय-प्रेम :— ताँर इच्छा, - प्रभु अल्प मस्तके लागाय। पित्त-वायु-व्याधि-प्रकोप शान्त हञा याय ॥ 106 ॥ एक-कलस सुगन्धि तैल गौड़े करिया। इँहा आनियाछेन बहु यतन करिया ॥” 107॥ अनुवाद—तब श्रीगोविन्दने महाप्रभुसे निवेदन किया, — “श्रीजगदानन्द पण्डित आपके लिये चन्दन आदिका तेल लाये हैं। उनकी इच्छा है कि— महाप्रभु (आप) इस तेलको अल्प मात्रामें अपने सिरपर लगायें। इस तेलसे पित्त-वायु-व्याधिका प्रकोप शान्त हो जाता