भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2334

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[ 12/105-112 बारहवाँ अध्याय 317 [बायाँ स्तम्भ] है। वे बहुत यत्नसे एक घड़ा सुगन्धित तेल गौड़देशसे यहाँ लाये हैं॥" 105-107॥ अनुभाष्य- गौड़देशमें सुगन्धित तेल एकत्रित करके श्रीक्षेत्रमें लाये॥ 107॥ जगद्गुरु लोकशिक्षक आचार्यरूपी महाप्रभुके द्वारा आदर्श-आचारका प्रदर्शन :- प्रभु कहे,-“संन्यासीर तैले नाहि अधिकार। ताहाते सुगन्धि तैल, — परम धिक्कार ! ! 108 ॥ श्रीजगदानन्दको उपलक्ष्य करके जगद्गुरु महाप्रभुके द्वारा साधकको सर्वोत्कृष्ट उपकरणके द्वारा एकमात्र भोक्ता ईश्वरके ही स्वारसिकी सेवारूपी कर्त्तव्यका उपदेश; उससे ही जीवके सेवा-श्रमकी सार्थकता :- जगन्नाथे देह' तैल,-दीप येन ज्वले। तार परिश्रम हवे परम-सफले ॥" 109 ॥ अनुवाद- महाप्रभुने कहा,–“संन्यासीको तेल लगानेका अधिकार नहीं है। उसपर भी सुगन्धित तेल लगानेको तो परम धिक्कार है! यह तेल जगन्नाथ मन्दिरमें दे दो, जिससे वह मन्दिरमें दीपक प्रज्वलित करनेके काम आयेगा। ऐसा करनेसे जगदानन्द पण्डितका परिश्रम भी परम-सफल होगा॥" 108-109 ॥ अनुभाष्य- “प्रातःस्नाने व्रते श्राद्धे द्वादश्यां ग्रहणे तथा। मद्यलेपसमं तैलं तस्मात्तैलं विवर्जयेत् ॥" [अर्थात् “प्रातः स्नानके समय, जिस किसी व्रतमें, द्वादशी-तिथिमें (अथवा द्वादशी-व्रतमें) एवं सूर्य-चन्द्र ग्रहणके समय तेलका उपयोग करना मद्य-लेपनके समान है, अतएव उस समय तेलका प्रयोग निषेध है।"] उपरोक्त 'व्रत' शब्दकी कोई-कोई 'यतिव्रत'के रूपमें व्याख्या करते हैं [अर्थात् जिन्होंने संन्यास-व्रत लिया है उनके लिये तेलका प्रयोग निषेध है, इसी भावसे] तिथि-तत्त्वमें स्मार्त्त भट्टाचार्य रघुनन्दनने लिखा है,- “घृतञ्च सार्षपं तैलं यत्तैलं पुष्पवासितम्। अदुष्टं पक्वतैलञ्च तैलाभ्यङ्गे च नित्यशः॥” [दायाँ स्तम्भ] अर्थात् “घी, सरसोंका तेल, पुष्प-तेल एवं पके हुए तेलको शरीरपर मलना 'गृहस्थ'के लिये दोषपूर्ण नहीं है॥" 108 ॥ श्रीगोविन्दके द्वारा श्रीजगदानन्दको महाप्रभुकी आदेश-वाणी बतलाना, श्रीजगदानन्दका प्रणयाभिमान-क्रोध :- एइ कथा गोविन्द जगदानन्देरे कहिल। मौन करि' रहिल पण्डित, किछु ना कहिल ॥ 110 ॥ अनुवाद- श्रीगोविन्दने श्रीजगदानन्द पण्डितको महाप्रभुका आदेश बतलाया। उसे सुनकर श्रीजगदानन्द पण्डितने कुछ भी नहीं कहा, मौन रहे॥ 110 ॥ बादमें श्रीगोविन्दके द्वारा पुनः महाप्रभुको श्रीजगदानन्दकी इच्छा बतलाना :- दिन दश गेले गोविन्द जानाइल आरबार। “पण्डितेर इच्छा,-तैल करुन अङ्गीकार ॥" 111 ॥ अनुवाद- दस दिनके बाद श्रीगोविन्दने महाप्रभुको पुनः निवेदन किया,—“श्रीजगदानन्द पण्डितकी इच्छा है कि आप तेलको स्वीकार करें ॥" 111 ॥ जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा साधक अथवा आचार्यको आत्मेन्द्रिय तर्पणके लिये भोग-चेष्टाके अनुचित होनेकी शिक्षा-प्रदान :- शुनि प्रभु कहे किछु सक्रोध-वचन। “मर्द्दनिया एक राख करिते मर्द्दन ! ! 112 ॥ अनुवाद- यह सुनकर महाप्रभुने कुछ क्रोधित होकर कहा,-“मालिश करनेके लिये एक मालिश करनेवाला भी रख लो ! 112 ॥ अनुभाष्य- सहायताहीन भिक्षु अर्थात् संन्यासीको अन्यकी सहायता ग्रहण नहीं करनी चाहिये। यहाँपर विलासके सहचर सुगन्धित-तेलको मलनेके लिये विलास-परायण भोगी व्यक्तियोंकी भाँति दास जैसे एक व्यक्तिको नियुक्त करनेपर विशेष सुखका विषय होगा,-यह श्लेष उक्ति है अर्थात् इसका वास्तविक अर्थ शब्दार्थके विपरीत है॥ 112 ॥

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