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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ 12/105-112 बारहवाँ अध्याय 317 [बायाँ स्तम्भ] है। वे बहुत यत्नसे एक घड़ा सुगन्धित तेल गौड़देशसे यहाँ लाये हैं॥" 105-107॥ अनुभाष्य- गौड़देशमें सुगन्धित तेल एकत्रित करके श्रीक्षेत्रमें लाये॥ 107॥ जगद्गुरु लोकशिक्षक आचार्यरूपी महाप्रभुके द्वारा आदर्श-आचारका प्रदर्शन :- प्रभु कहे,-“संन्यासीर तैले नाहि अधिकार। ताहाते सुगन्धि तैल, — परम धिक्कार ! ! 108 ॥ श्रीजगदानन्दको उपलक्ष्य करके जगद्गुरु महाप्रभुके द्वारा साधकको सर्वोत्कृष्ट उपकरणके द्वारा एकमात्र भोक्ता ईश्वरके ही स्वारसिकी सेवारूपी कर्त्तव्यका उपदेश; उससे ही जीवके सेवा-श्रमकी सार्थकता :- जगन्नाथे देह' तैल,-दीप येन ज्वले। तार परिश्रम हवे परम-सफले ॥" 109 ॥ अनुवाद- महाप्रभुने कहा,–“संन्यासीको तेल लगानेका अधिकार नहीं है। उसपर भी सुगन्धित तेल लगानेको तो परम धिक्कार है! यह तेल जगन्नाथ मन्दिरमें दे दो, जिससे वह मन्दिरमें दीपक प्रज्वलित करनेके काम आयेगा। ऐसा करनेसे जगदानन्द पण्डितका परिश्रम भी परम-सफल होगा॥" 108-109 ॥ अनुभाष्य- “प्रातःस्नाने व्रते श्राद्धे द्वादश्यां ग्रहणे तथा। मद्यलेपसमं तैलं तस्मात्तैलं विवर्जयेत् ॥" [अर्थात् “प्रातः स्नानके समय, जिस किसी व्रतमें, द्वादशी-तिथिमें (अथवा द्वादशी-व्रतमें) एवं सूर्य-चन्द्र ग्रहणके समय तेलका उपयोग करना मद्य-लेपनके समान है, अतएव उस समय तेलका प्रयोग निषेध है।"] उपरोक्त 'व्रत' शब्दकी कोई-कोई 'यतिव्रत'के रूपमें व्याख्या करते हैं [अर्थात् जिन्होंने संन्यास-व्रत लिया है उनके लिये तेलका प्रयोग निषेध है, इसी भावसे] तिथि-तत्त्वमें स्मार्त्त भट्टाचार्य रघुनन्दनने लिखा है,- “घृतञ्च सार्षपं तैलं यत्तैलं पुष्पवासितम्। अदुष्टं पक्वतैलञ्च तैलाभ्यङ्गे च नित्यशः॥” [दायाँ स्तम्भ] अर्थात् “घी, सरसोंका तेल, पुष्प-तेल एवं पके हुए तेलको शरीरपर मलना 'गृहस्थ'के लिये दोषपूर्ण नहीं है॥" 108 ॥ श्रीगोविन्दके द्वारा श्रीजगदानन्दको महाप्रभुकी आदेश-वाणी बतलाना, श्रीजगदानन्दका प्रणयाभिमान-क्रोध :- एइ कथा गोविन्द जगदानन्देरे कहिल। मौन करि' रहिल पण्डित, किछु ना कहिल ॥ 110 ॥ अनुवाद- श्रीगोविन्दने श्रीजगदानन्द पण्डितको महाप्रभुका आदेश बतलाया। उसे सुनकर श्रीजगदानन्द पण्डितने कुछ भी नहीं कहा, मौन रहे॥ 110 ॥ बादमें श्रीगोविन्दके द्वारा पुनः महाप्रभुको श्रीजगदानन्दकी इच्छा बतलाना :- दिन दश गेले गोविन्द जानाइल आरबार। “पण्डितेर इच्छा,-तैल करुन अङ्गीकार ॥" 111 ॥ अनुवाद- दस दिनके बाद श्रीगोविन्दने महाप्रभुको पुनः निवेदन किया,—“श्रीजगदानन्द पण्डितकी इच्छा है कि आप तेलको स्वीकार करें ॥" 111 ॥ जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा साधक अथवा आचार्यको आत्मेन्द्रिय तर्पणके लिये भोग-चेष्टाके अनुचित होनेकी शिक्षा-प्रदान :- शुनि प्रभु कहे किछु सक्रोध-वचन। “मर्द्दनिया एक राख करिते मर्द्दन ! ! 112 ॥ अनुवाद- यह सुनकर महाप्रभुने कुछ क्रोधित होकर कहा,-“मालिश करनेके लिये एक मालिश करनेवाला भी रख लो ! 112 ॥ अनुभाष्य- सहायताहीन भिक्षु अर्थात् संन्यासीको अन्यकी सहायता ग्रहण नहीं करनी चाहिये। यहाँपर विलासके सहचर सुगन्धित-तेलको मलनेके लिये विलास-परायण भोगी व्यक्तियोंकी भाँति दास जैसे एक व्यक्तिको नियुक्त करनेपर विशेष सुखका विषय होगा,-यह श्लेष उक्ति है अर्थात् इसका वास्तविक अर्थ शब्दार्थके विपरीत है॥ 112 ॥

318 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/113-120 ] एइ सुख लागि' आमि करिलुँ संन्यास! आमार 'सर्वनाश'-तोमार 'परिहास'॥113॥ अपनी इन्द्रियोंके तर्पणरूपी सम्भोगको प्रिय माननेवाले संन्यासी वेशधारियोंकी निन्दा :- पथे याइते तैल गन्ध मोर येइ पाबे। 'दारी संन्यासी' करि' आमारे कहिबे॥"114॥ अनुवाद-मैंने ऐसे सुखके लिये ही संन्यास ग्रहण किया है! तुम्हारे इस परिहाससे मेरा तो सर्वनाश होगा। मार्गमें जाते हुए जिसको भी मेरे शरीरसे तेलकी सुगन्ध अनुभव होगी, वह मुझे 'दारी संन्यासी' [स्त्रीके सङ्गमें रहनेवाला संन्यासी] कहेंगे॥"113-114॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दारी संन्यासी', - स्त्रीके साथ रहनेवाला संन्यासी॥114॥ अनुभाष्य- 'दारी संन्यासी', - स्त्री-सम्भोगी, मिथ्याचारके कारण भ्रष्ट, तान्त्रिक संन्यासी॥114॥ महाप्रभुके रोषके कारण श्रीगोविन्द मौन :- शुनि' प्रभुर वाक्य गोविन्द मौन करिला। प्रातःकाले जगदानन्द प्रभु-स्थाने आइला॥115॥ अनुवाद-महाप्रभुके वचन सुनकर श्रीगोविन्द मौन रहे। अगले दिन प्रातःकालमें श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके वासस्थानपर आये॥115॥ स्वयं समस्त वस्तुओंके भोक्ता होनेपर भी श्रीजगदानन्दके आगमनसे लोक-शिक्षक आचार्यरूपमें महाप्रभुके द्वारा साधक अथवा आचार्यको इन्द्रियसुख-त्याग अथवा आदर्श वैराग्यके आचरणका प्रदर्शन :- प्रभु कहे,-"पण्डित, तैल आनिला गौड़ हइते। आमि त' संन्यासी,-तैल ना पारि लइते॥116॥ श्रीजगदानन्दको उपदेशके छलसे समस्त चित् वस्तुओंके भोक्ता भगवान्की सर्वोत्कृष्ट द्रव्योंके द्वारा सेवासे ही जीवकी सेवाकी सफलताकी शिक्षा देना :- जगन्नाथे देह' लञा दीप येन ज्वले। तोमार सकल श्रम हइबे सफले॥"117॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "हे जगदानन्द पण्डित! तुम गौड़देशसे मेरे लिये सुगन्धित चन्दनका तेल लाये हो। मैं तो संन्यासी हूँ, इसलिये मैं उस तेलको स्वीकार नहीं कर सकता। तुम उस तेलको ले जाकर जगन्नाथ मन्दिरमें दे दो, जिससे वह दीपक जलानेके काम आ जायेगा। ऐसा होनेसे तुम्हारे द्वारा तेलको एकत्रित करके बनाने और यहाँ लानेका समस्त परिश्रम भी सफल हो जायेगा॥"116-117॥ महाप्रभुके प्रेमी श्रीजगदानन्दके द्वारा महाप्रभुके प्रति प्रणयाभिमानरूपी रोष :- पण्डित कहे,-"के तोमारे कहे मिथ्यावाणी? आमि गौड़ हैते तैल कभु नाहि आनि॥"118॥ महाप्रभुके सामने ही तेलके पात्रको तोड़ना :- एत बलि' घर हैते तैल-कलस आनिया। प्रभुर आगे आङ्गिनाते फेलिला भाङ्गिया॥119॥ अपने घरमें स्वयंको बन्द करना :- तैल भाङ्गि' सेइ पथे निज-घर गिया। शुइया रहिला घरे कपाट खिलिया॥120॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा,-"आपको कौन यह मिथ्या बातें कह रहा है? मैं तो गौड़देशसे कभी कोई तेल लाया ही नहीं।" यह कहकर वे कमरेके भीतरसे तेलकी मटकी लाये और उन्होंने महाप्रभुके सामने ही उस मटकीको आङ्गनमें फेंककर तोड़ डाला। वे तेलकी मटकीको फोड़कर उसी आङ्गनसे होते हुए अपने कमरेमें चले गये और कमरेको भीतरसे बन्द करके लेट गये [और मान करके खाना-पीना छोड़ दिया]॥118-120॥ अनुभाष्य-श्रीजगदानन्द समुद्रके तटपर श्रीहरिदास ठाकुरकी समाधि-स्थलीके निकटमें वर्तमानकालके 'सात-आसन' नामक भजन-कुटी-समूहमें-से एक 'गिरिधारी'-आसनमें रहते थे, -ऐसा श्रीरघुनाथ वैद्यके द्वारा लिखित ग्रन्थसे जाना जाता है॥120॥

[ 12/121-131 बारहवाँ अध्याय 319 भक्तके प्रेमके वशीभूत भगवान्‌के द्वारा भक्तके मानका भञ्जन अथवा कृपा-प्रार्थना :- तृतीय दिवसे प्रभु ताँर द्वारे याञा। “उठह पण्डित”—करि' कहेन डाकिया ॥ 121 ॥ भक्तके घरमें भगवान्‌का स्वयं याचकके रूपमें भिक्षा स्वीकार करना :- “आजि भिक्षा दिबा आमाय करिया रन्धने। मध्याह्ने आसिमु, एबे याइ दरशने ॥” 122 ॥ अनुवाद—तीन दिन बाद महाप्रभु उनके द्वारपर गये और उन्हें पुकारते हुए कहा, —“हे जगदानन्द पण्डित, उठो। आज तुम स्वयं भोजन पाक करके मुझे खिलाना। मैं दोपहरके समय आऊँगा, अभी श्रीजगन्नाथके दर्शन करने जा रहा हूँ॥” 121-122 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'याइ दरशने',—श्रीजगन्नाथके दर्शन करने जा रहा हूँ ॥ 122 ॥ महाप्रभुके प्रेमी पण्डितका महाप्रभुके लिये भोग बनाना और समर्पण :- एत बलि' प्रभु गेला, पण्डित उठिला। स्नान करि' नाना व्यञ्जन रन्धन करिला ॥ 123 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु चले गये। इधर श्रीजगदानन्द उठे और स्नान करनेके पश्चात् उन्होंने अनेक व्यञ्जन बनाये ॥ 123 ॥ मध्याह्न करिया प्रभु आइला भोजने। पादप्रक्षालन करि' बसिला आसने ॥ 124 ॥ अनुवाद—महाप्रभु मध्याह्न-कृत्य करनेके पश्चात् भोजन करनेके लिये आये। श्रीजगदानन्दने उनके चरण धुलवाये और महाप्रभु आसनपर बैठ गये ॥ 124 ॥ सघृत शाल्यन्न कलापाते स्तूप कैला। कलार डोङ्गा भरि' व्यञ्जन चौदिके धरिला ॥ 125 ॥ अन्न-व्यञ्जनोपरि तुलसी-मञ्जरी। जगन्नाथेर पिठा-पाना आगे आने धरि' ॥ 126 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने केलेके पत्तेपर घीसे मिश्रित शालि-चावलका स्तूप बनाकर उसके चारों ओर अनेक व्यञ्जनोंसे भरे केलेके पत्तोंसे बने दोने रख दिये। चावलके स्तूप और उन व्यञ्जनोंके ऊपर तुलसी मञ्जरी रखी हुई थी। फिर उन्होंने महाप्रभुके आगे भगवान् श्रीजगन्नाथका पीठा-पाना आदि प्रसाद भी लाकर रख दिया ॥ 125-126 ॥ अभिन्न-आत्मा प्रणयपात्र भक्तके साथ भक्तप्रेमवशतः भगवान्‌की एक साथ भोजन करनेकी इच्छा :- प्रभु कहे, —“द्वितीय-पाते बाड़' अन्न-व्यञ्जन। तोमाय आमाय आजि एकत्र करिमु भोजन ॥” 127 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“एक और पत्तेपर चावल और व्यञ्जन आदि रखो, क्योंकि आज तुम और मैं एक साथ भोजन करेंगे ॥” 127 ॥ हस्त तुलि' रहेन प्रभु, ना करेन भोजन। तबे पण्डित कहेन किछु सप्रेम वचन ॥ 128 ॥ श्रीजगदानन्दकी महाप्रभुसे प्रीतिपूर्ण उक्ति; बादमें बैठना ही स्वीकार :- “आपने प्रसाद लह, पाछे मुञि लइमु। तोमार आग्रह आमि केमने खण्डिमु ??” 129 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने अपने हाथ ऊपर उठाकर रखे और कुछ खा नहीं रहे थे। तभी श्रीजगदानन्द पण्डितने प्रेमपूर्वक कहा, —“आप कृपया प्रसाद ग्रहण कीजिये, मैं बादमें ग्रहण करूँगा। मैं आपके आग्रहको कैसे मना कर पाऊँगा?” 128-129 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दके प्रेमपूर्वक बनाये गये प्रसादकी स्तुति करते हुए उनके भाग्यकी प्रशंसा :- तबे महाप्रभु सुखे भोजने बसिला। व्यञ्जनेर स्वाद पाञा कहिते लागिला ॥ 130 ॥ “क्रोधावेशेर पाकेर हय ऐछे स्वाद ! एइ त' जानिये तोमाय कृष्णेर 'प्रसाद' ॥ 131 ॥

320 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/130-140 ] आपने खाइबे कृष्ण, ताहार लागिया। तोमार हस्ते पाक कराय उत्तम करिया ॥ 132 ॥ ऐछे अमृत-अन्न कृष्णे कर समर्पण। तोमार भाग्येर सीमा के करे वर्णन? ?" 133 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभु आनन्दपूर्वक भोजन करने लगे और सभी व्यञ्जनोंका आस्वादन करते हुए कहने लगे, - "क्रोधके आवेशमें बनाये गये व्यञ्जनोंका ऐसा स्वाद! इससे ही पता चलता है कि तुम्हारे ऊपर कृष्णकी बहुत कृपा है। कृष्ण स्वयं खाना चाहते हैं, इसलिये वे तुम्हारे हाथोंसे स्वयंके लिये उत्तम-उत्तम वस्तुएँ पकवाते हैं। तुम कृष्णको ऐसे अमृत-तुल्य पकवान समर्पित करते हो, तुम्हारे भाग्यकी सीमाका कौन वर्णन कर सकता है?" 130-133 ॥ श्रीगौरको ही सर्वस्व माननेवाले, श्रीगौरगतप्राण श्रीजगदानन्दका महाप्रभुको ही सब कुछ करवानेवालेके रूपमें मानना :- पण्डित कहे, - "ये खाइबे, सेइ पाककर्त्ता। आमि सब, - केवलमात्र सामग्री-आहर्त्ता ॥ " 134 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा, - "जो खायेंगे, वे ही पकवान बनानेवाले हैं। मैं तो केवलमात्र सामग्रीका संग्रह करनेवाला हूँ॥" 134 ॥ भक्तके अभिमानके भयसे भगवान्के द्वारा प्रचुर भोजन करना :- पुनः पुनः पण्डित नाना व्यञ्जन परिवेशे। भये किछु ना बलेन प्रभु, खायेन हरिषे ॥ 135 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डित बार बार अनेक प्रकारके व्यञ्जन परोसने लगे। उनके भयके कारण महाप्रभु कुछ भी नहीं बोले, अपितु प्रसन्नतापूर्वक खाते रहे ॥ 135 ॥ आग्रह करिया पण्डित कराइला भोजन। आर दिन हैते भोजन हैल दशगुण ॥ 136 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितने बार बार आग्रह करके महाप्रभुको इतना भोजन कराया कि उन्होंने अन्य दिनोंकी तुलनामें दस गुणा अधिक भोजन किया ॥ 136 ॥ बारबार प्रभु उठिते करेन मन। सेइकाले पण्डित परिवेशे व्यञ्जन ॥ 137 ॥ किछु बलिते नारेन प्रभु, खायेन तरासे। ना खाइले जगदानन्द करिबे उपवासे ॥ 138 ॥ महाप्रभुका परिवेश समाप्त करनेके लिये श्रीजगदानन्दको कातरभावसे अनुरोध :- तबे प्रभु कहेन करि' विनय-सम्मान। "दशगुण खाओयाइला, एबे कर समाधान ॥" 139 ॥ अनुवाद-बार बार महाप्रभु जैसे ही उठनेकी इच्छा करते, श्रीजगदानन्द पण्डित उसी समय उनके पत्तलमें और व्यञ्जन परोस देते। महाप्रभु उन्हें कुछ बोल नहीं पा रहे थे और सब खाते रहे। महाप्रभुको भय था कि यदि मैं नहीं खाऊँगा तो जगदानन्द उपवास करेगा। अन्तमें महाप्रभुने विनती करते हुए सम्मानपूर्वक श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा, - "तुमने मुझे अन्य दिनोंकी अपेक्षा दस गुणा भोजन करवा दिया है, अब कृपा करके और मत खिलाओ ॥" 137-139 ॥ अनुभाष्य- 'समाधान', - निष्पत्ति, समापन, विराम, अन्त ॥ 139 ॥ बारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। आचमनके बाद महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दको अपने सामने बैठकर भोजन करनेके लिये अनुरोध :- तबे महाप्रभु उठि' कैला आचमन। पण्डित आनिल, मुखवास, माल्य, चन्दन ॥ 140 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने उठकर आचमन किया। श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके लिये मुखशुद्धि, माला और चन्दन ले आये ॥ 140 ॥

[ 12/141-150 बारहवाँ अध्याय 321 चन्दनादि लञा प्रभु बसिला सेइ स्थाने। “आमार आगे आजि तुमि करह भोजने॥”141॥ अनुवाद—महाप्रभु चन्दनादि धारण करके वहीं बैठ गये और उन्होंने श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा,—“आज तुम मेरे सामने ही भोजन करो॥”141॥ वाम्यस्वभाव श्रीजगदानन्दका ऐश्वर्य-बुद्धिसे महाप्रभुकी मर्यादाके संरक्षणके लिये महाप्रभुको विश्रामके लिये जानेकी प्रार्थना :— पण्डित कहे,—“प्रभु याइ' करुन विश्राम। मुइ, एबे प्रसाद लइमु करि' समाधान॥142॥ श्रीगोविन्दके सङ्गी महाप्रभुके सेवक रामाइ और रघुनाथभट्टके द्वारा उस भोगको बनानेके पश्चात् महाप्रभुके प्रसादकी प्राप्ति :— रसुइर कार्य करियाछे रामाइ, रघुनाथ। इँहा-सबाय दिते चाहि किछु व्यञ्जन-भात॥”143॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा,—“हे महाप्रभो! आप जाकर विश्राम कीजिये, मैं सब कार्य निपटाकर प्रसाद पा लूँगा। रसोईका कार्य रामाइ और रघुनाथने किया है, मैं पहले इन्हें खानेके लिये कुछ व्यञ्जन और चावल आदि देना चाहता हूँ॥”142-143॥ श्रीजगदानन्दके द्वारा किये गये भोजनके विषयमें बतलानेके लिये श्रीगोविन्दको आदेश देकर महाप्रभुका घर जाना :— प्रभु कहेन,—“गोविन्द, तुमि इँहाइ रहिबा। पण्डित भोजन कैले, आमारे कहिबा॥”144॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दसे कहा,—“तुम यहींपर रहना। जब जगदानन्द पण्डित भोजन कर ले, तब मुझे आकर बतलाना॥”144॥ महाप्रभुके सुखमें एकनिष्ठ श्रीजगदानन्दके द्वारा आत्मेन्द्रिय-प्रीतिवाञ्छा नहीं करके श्रीगोविन्दको महाप्रभुकी सेवाके लिये भेजना :— एत कहि' महाप्रभु करिला गमन। गोविन्देरे पण्डित किछु कहेन वचन॥145॥ “तुमि शीघ्र याह करिते पादसम्वाहने। कहिह,—'पण्डित एबे बसिल भोजने॥'146॥ महाप्रभुकी निद्राके पश्चात् महाप्रभुके उच्छिष्टके सम्मानके लिये आनेका अनुरोध :— तोमार प्रभुर 'शेष' राखिमु धरिया। प्रभु निद्रा गेले, तुमि खाइह आसिया॥”147॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु वहाँसे चले गये। श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीगोविन्दसे कहा,—“तुम शीघ्र ही जाकर महाप्रभुके चरण दबाओ। उनके पूछनेपर कहना,—'जगदानन्द पण्डित अभी-अभी भोजन करनेके लिये बैठे हैं।' मैं तुम्हारे लिये महाप्रभुका उच्छिष्ट रख लूँगा, उनके सो जानेपर तुम आकर प्रसाद पा लेना॥”145-147॥ सभीको प्रसाद बाँटनेके बाद महाप्रभुके उच्छिष्टका सम्मान :— रामाइ, नन्दाइ, आर गोविन्द, रघुनाथ। सबारे बाँटिया दिला प्रभुर व्यञ्जन-भात॥148॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीरामाइ, श्रीनन्दाइ, श्रीगोविन्द और श्रीरघुनाथके लिये महाप्रभुके उच्छिष्ट चावल तथा व्यञ्जन आदिको पत्तोंमें बाँटकर रख दिया॥148॥ स्वयं महाप्रभुके उच्छिष्टको ग्रहण करना :— आपने प्रभुर 'शेष' करिला भोजन। तबे गोविन्देरे प्रभु पाठाइला पुनः॥149॥ भक्तप्रेमके वशीभूत भगवान्‌के द्वारा भी अपने सुखकी चेष्टा छोड़कर भक्तके सन्तोषका अनुसन्धान :— “देख,—जगदानन्द प्रसाद पाय कि ना पाय। शीघ्र आसि' समाचार कहिबे आमाय॥”150॥ अनुवाद—इसके बाद श्रीजगदानन्द पण्डितने स्वयं भी महाप्रभुके बचे हुए उच्छिष्ट प्रसादको पा लिया। तभी महाप्रभुने पुनः श्रीगोविन्दको श्रीजगदानन्दके निकट भेजा और कहा,—“जाकर देखो कि जगदानन्द पण्डित

322 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/149-155 ] प्रसाद पा भी रहा है या नहीं। तुम शीघ्र आकर मुझे समाचार देना॥"149-150॥ श्रीजगदानन्दके भोजनके पश्चात् महाप्रभुका शयन; भक्तकी तृप्ति अथवा सन्तुष्टिमें ही महाप्रभुके द्वारा अपने कार्यके समाधानको समझना और सुख :- गोविन्द आसि' देखि' कहिल पण्डितेर भोजन। तबे महाप्रभु करिला स्वच्छन्दे शयन॥ 151 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने आकर देखा कि श्रीजगदानन्द पण्डित भोजन कर रहे हैं और उन्होंने यह बात जाकर महाप्रभुको बतलायी। तब महाप्रभुने निश्चिन्त होकर शयन किया॥ 151 ॥ श्रीगौरको वशमें करनेवाले श्रीजगदानन्द और महाप्रभुके प्रेमके साथ द्वापरमें सत्यभामा और वासुदेवके प्रेमकी उपमा :- जगदानन्दे-प्रभुते प्रेम चले एइमते। सत्यभामा-कृष्णे यैछे शुनि भागवते॥ 152 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित और महाप्रभुमें प्रेम इस प्रकार ही चलता है जैसे भागवतमें सत्यभामा और श्रीकृष्णके विषयमें सुना जाता है॥ 152 ॥ जगदानन्देर सौभाग्येर के कहिबे सीमा? जगदानन्देर सौभाग्येर तँह से उपमा॥ 153 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके सौभाग्यकी सीमाको कौन जान सकता है? श्रीजगदानन्द पण्डितके सौभाग्यकी उपमा वे स्वयं ही हैं॥ 153 ॥ श्रीजगदानन्दके 'प्रेम-विवर्त्त'को सुननेसे श्रीगौरकृष्णके प्रति प्रेमका उदय :- जगदानन्देर 'प्रेमविवर्त्त' सुने येइ जन। प्रेमेर 'स्वरूप' जाने, पाय प्रेमधन॥ 154 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके प्रेमविवर्त्तके विषयमें अथवा उनके द्वारा रचित 'प्रेमविवर्त्त' नामक ग्रन्थका जो कोई श्रवण करता है, वह प्रेमके स्वरूपको जान पाता है और उसे प्रेमधनकी प्राप्ति होती है॥ 154 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'प्रेमविवर्त्त',—इसका एक अर्थ यह है कि प्रेमका 'विवर्त्त' अर्थात् प्रेमकार्यमें रोषका भ्रम होना—ऐसा व्यवहार; दूसरा अर्थ यह है कि श्रीजगदानन्दने महाप्रभुके चरित्रसे सम्बन्धित जो स्वरचित 'प्रेमविवर्त्त'-नामक ग्रन्थ लिखा है, वह॥ 154 ॥ बारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 155 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे जगदानन्द-तैल-भञ्जनं नाम द्वादशः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 155 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें जगदानन्द-तेल-भञ्जन नाम बारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।

तेरहवाँ अध्याय कथासार—महाप्रभुके द्वारा केलेके तनेकी छालपर शयन करनेसे उन्हें बड़ा कष्ट होता होगा, ऐसा सोचकर श्रीजगदानन्दने तुलाई-तकिया आदि तैयार करवाया, किन्तु महाप्रभुने उसे स्वीकार नहीं किया। श्रीस्वरूप गोस्वामीने केलेके वृक्षकी छालको चीर-चीरकर उसे तुलाई-तकियेकी भाँति तैयार कर दिया, महाप्रभुने उसके लिये भी बहुत आपत्ति की, किन्तु अन्तमें उसे स्वीकार कर लिया। श्रीजगदानन्दने महाप्रभुकी आज्ञा लेकर वृन्दावन जाकर श्रीसनातनके साथ बहुत प्रकारसे भक्तिका आस्वादन किया। उन्होंने मुकुन्द सरस्वतीके बहिर्वासके सम्बन्धमें आचार्य-अभिमानरूपी परम उपाय निर्धारित किया था। श्रीजगदानन्दके द्वारा सनातनकी भेंटको महाप्रभुको देनेपर उसके द्वारा पीलूके फलको खानेका रहस्य प्रकट हुआ। देवदासीके गानको सुनकर महाप्रभु काँटोंकी मेड़को तोड़कर, गायक कोई स्त्री है, इसे नहीं जानकर उसकी ओर दौड़ रहे थे। श्रीगोविन्दके द्वारा रोके जानेपर, उन्होंने 'स्त्री' नाम सुनकर श्रीगोविन्दको धन्यवाद दिया। संन्यासी अथवा वैष्णवके लिये परस्त्रीके मुखसे कृष्णगीतका साक्षात् श्रवण करना अनुचित है,—यह इस आख्यायिकामें (शिक्षाप्रद कथामें) मिलता है। श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीको काशीसे श्रीपुरुषोत्तममें आनेके समय मार्गमें कायस्थ रामदास-विश्वास-पण्डितका सङ्ग प्राप्त हुआ था। विश्वास-पण्डितके हृदयमें विद्याका गर्व होनेके कारण मुक्तिकी अभिलाषा रहनेपर महाप्रभुने उसपर विशेष कृपा नहीं की। भट्टगोस्वामीकी आंशिक जीवनी इस अध्यायके अन्तमें संक्षेपमें कही गयी है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीकृष्णविरहमें कृश (दुबले) किन्तु भावके कारण प्रफुल्लित महाप्रभुका आश्रय ग्रहण :- कृष्णविच्छेदजातात्र्या क्षीणे चापि मनस्तनू। दधाते फुल्लतां भावैर्यस्य तं गौरमाश्रये ॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कृष्णवियोगसे उत्पन्न आर्त्तिके कारण मन और शरीरके दुर्बल होनेपर भी [सात्त्विकादि] भावोदयके समय जो प्रफुल्लताको धारण करते थे, मैं उन श्रीगौरचन्द्रका आश्रय ग्रहण करता हूँ ॥ १ ॥ अनुभाष्य— यस्य (चैतन्यदेवस्य) मनः तनूः कृष्णविच्छेदजातात्र्या (कृष्णविरहजनितपीड़या) क्षीणे अपि च भावैः (सात्त्विकादिभिः) क्वचित् फुल्लतां (स्फीततां) दधाते (धारयतः), तं गौरम् [अहम्] आश्रये (शरणं प्रपद्ये)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। समस्त गौर भक्तोंकी जय हो ॥ २ ॥ हेनमते महाप्रभु जगदानन्द-सङ्गे। नानामते आस्वादय प्रेमेर तरङ्गे ॥ ३ ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु श्रीजगदानन्द पण्डितके साथ अनेक भावोंसे प्रेमकी तरङ्गोंका आस्वादन करते थे॥ ३॥ उक्त श्लोकका अर्थ :- कृष्णविच्छेदे दुःखे क्षीण मन-काय। भावावेशे प्रभु कभु प्रफुल्लित हय ॥ ४ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-विरहरूपी दुःखमें महाप्रभुका मन क्लान्त और उनका शरीर क्षीण हो गया था। किन्तु जब कभी उनमें भावका आवेश आता तो वे प्रफुल्लित हो जाते थे ॥ ४ ॥

324 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/5-13 ] महाप्रभुका कठोर वैराग्य :- कलार शरलाते शयन, अति क्षीण काय। शरलाते हाड़ लागे, व्यथा हय गाय॥ 5 ॥ अनुवाद—महाप्रभु भूमिपर केलेके तनेकी छालके ऊपर सोते थे, इसलिये उनकी शय्या बहुत कठोर थी। उनकी देहके अत्यन्त क्षीण होनेके कारण उनकी हड्डियाँ उस छालपर लगती थी, जिसके फलस्वरूप उनके शरीरमें पीड़ा होती थी॥ 5 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कलार शरलाते',—केलेके तनेकी छालपर॥ 5 ॥ इसे देखकर महाप्रभुके सुखमें तत्पर भक्तोंको कष्ट; श्रीजगदानन्दके द्वारा महाप्रभुके सुख विधानकी चेष्टा :- देखि' सब भक्तगण महादुःख पाय। सहिते नारे जगदानन्द, सृजिला उपाय॥ 6 ॥ महाप्रभुके लिये गेरुए रङ्गके कपड़ेसे गद्दा और तकिया प्रस्तुत :- सूक्ष्म वस्त्र आनि' गेरि दिया राङ्गाइला। शिमुलीर तुला दिया ताहा पूराइला॥ 7 ॥ महाप्रभुके व्यवहारमें लानेके लिये श्रीगोविन्दसे अनुरोध :- एक तुलि-बालिश गोविन्देर हाते दिला। 'प्रभुरे शोयाइह इहाय'—ताहारे कहिला॥ 8 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको पीड़ामें देखकर सभी भक्त अत्यन्त दुःखी होते। श्रीजगदानन्द पण्डित इस बातको सहन नहीं कर पाये, इसलिये उन्होंने एक उपाय निकाला। उन्होंने एक महीन वस्त्र लाकर उसे गेरुए रङ्गमें रङ्ग दिया और फिर उसे सेमलकी रुईसे भर दिया। उन्होंने एक तुलाई और एक तकिया श्रीगोविन्दके हाथमें दिया और कहा,—“आप महाप्रभुको इसपर ही सुलाना॥” 6-8 ॥ अनुभाष्य—'तुलि',—रुईका गद्दा॥ 8 ॥ श्रीस्वरूपसे भी अनुरोध :- स्वरूप-गोसाञिके कहे जगदानन्द। “आजि आपने याञा प्रभुरे कराइह शयन॥” 9 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीसे भी कहा,—“आज आप स्वयं जाकर महाप्रभुको शयन कराना॥” 9 ॥ श्रीस्वरूप और श्रीगोविन्दके द्वारा गद्दे और तकियेके द्वारा शय्याकी रचना, उसे देखकर महाप्रभुका क्रोध :- शयनेर काले स्वरूप ताँहाइ रहिला। तुलि-बालिश देखि' प्रभु क्रोधाविष्ट हइला॥ 10 ॥ महाप्रभुके द्वारा उसे बनानेवालेके नामके विषयमें पूछना; श्रीजगदानन्दका नाम श्रवण करके महाप्रभुका भय :- गोविन्देरे पुछेन,—“इहा कराइल कोन् जन?” जगदानन्देर नाम शुनि' सङ्कोच हैल मन॥ 11 ॥ तत्क्षणात् उस शय्याको दूर हटाना और केलेके पत्तेपर शयन :- गोविन्देरे कहि' सेइ तुलि दूर कैला। कलार शरला-उपर शयन करिला॥ 12 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके शयनके समय श्रीस्वरूप दामोदर वहींपर रहे। तुलाई और तकियेको देखकर महाप्रभुने क्रोधित होकर श्रीगोविन्दसे पूछा,—“इसे किसने बनवाया है?” जब महाप्रभुने श्रीगोविन्दके मुखसे श्रीजगदानन्द पण्डितका नाम सुना तो उनके मनमें सङ्कोच हुआ। उन्होंने श्रीगोविन्दको कहकर उस तुलाईको वहाँसे हटवाया और फिर केलेके तनेकी छालके ऊपर ही शयन किया॥ 10-12 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीजगदानन्दके दुःखी होनेकी सम्भावनाके विषयमें बतलाना :- स्वरूप कहे,—“तोमार इच्छा, कि कहिते पारि? शय्या उपेक्षिले पण्डित दुःख पाबे भारी॥” 13 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे कहा,—“आपकी जैसी इच्छा, मैं क्या कह सकता हूँ? किन्तु शय्याकी उपेक्षा करनेसे जगदानन्द पण्डितको बहुत दुःख होगा॥” 13 ॥

[ 13/14-22 तेरहवाँ अध्याय 325 स्वयंको विरक्त संन्यासीके अभिमानसे महाप्रभुके द्वारा कृत्रिम क्रोध करते हुए अभियोग :- प्रभु कहेन, - “खाट एक आनह पाड़िते। जगदानन्द चाहे आमाय विषय भुञाइते ॥ 14 ॥ संन्यासी मानुष आमार भूमिते शयन। आमारे खाट-तुलि-बालिश-मस्तक मुण्डन!!” 15 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “अब एक खाट भी और ले आओ। जगदानन्द तो मुझे विषयोंका भोग कराना चाहता है। मैं संन्यासी हूँ और मुझे भूमिपर ही शयन करना चाहिये। मेरे लिये खाट-गद्दा-तकिया प्रयोग करना लज्जाकी बात है!” 14-15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'मस्तक-मुण्डन', - लज्जित करवानेकी बात ॥ 15 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीजगदानन्दको महाप्रभुके वचन बतलाना, श्रीजगदानन्दको कष्ट :- स्वरूप-गोसाञि आसि' पण्डिते कहिला। शुनि' जगदानन्द मने महादुःख पाइला ॥ 16 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने आकर यह बात श्रीजगदानन्द पण्डितको बतलायी। इसे सुनकर श्रीजगदानन्द पण्डितके मनमें बहुत दुःख हुआ ॥ 16 ॥ सेवामें चतुर श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुकी सेवाके लिये शय्या-द्रव्यका निर्माण :- स्वरूप-गोसाञि तबे सृजिला प्रकार। कदलीर शुष्कपत्र आनिला अपार ॥ 17 ॥ नखे चिरि' चिरि' ताहा अति सूक्ष्म कैला। प्रभुर बहिर्वासेते से-सब भरिला ॥ 18 ॥ बहुत कठिनाईसे महाप्रभुके द्वारा उसे ग्रहण करनेके लिये सम्मति-प्रदान :- एइमत दुइ कैला ओड़न-पाड़ने। अङ्गीकार कैला प्रभु अनेक यतने ॥ 19 ॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने एक अन्य उपाय किया। वे केलेके बहुतसे सूखे पत्ते ले आये। उन्होंने उन सूखे पत्तोंको अपने नाखूनोंसे चीर-चीर कर बहुत सूक्ष्म कर दिया और फिर उन्हें महाप्रभुके दो बहिर्वासमें भर लिया। इस प्रकार उन्होंने दोनों बहिर्वासमें भरे हुए केलेके पत्तोंको हिला-डुलाकर ऐसा कर दिया कि उनका एक तकिये और एक गद्देका आकार बन गया। भक्तोंके द्वारा बहुत आग्रह करनेपर ही महाप्रभुने उसे स्वीकार किया ॥ 17-19 ॥ अनुभाष्य- 'ओड़न-पाड़न', - ओत-प्रोत; किसी-किसीके मतानुसार, - तकिया और गद्दा ॥ 19 ॥ महाप्रभुके शयनसे सभी सुखी, केवलमात्र श्रीजगदानन्दको दुःख :- ताते शयन करेन प्रभु, - देखि' सबे सुखी। जगदानन्द-भितर-बाहिरे महादुःखी ॥ 20 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको उस गद्देपर शयन करते देख सब भक्त आनन्दित हुए। एकमात्र श्रीजगदानन्द पण्डित ही भीतर-बाहरसे बहुत दुःखी थे ॥ 20 ॥ श्रीजगदानन्दकी वृन्दावन जानेकी इच्छा; पहलेसे ही यह इच्छा रहनेपर भी महाप्रभुके आदेशके बिना जानेमें असमर्थता :- पूर्वे जगदानन्देर इच्छा वृन्दावन याइते। प्रभु आज्ञा ना देन ताँरे, ना पारे चलिते ॥ 21 ॥ अब महाप्रभुके शयन-कार्यमें दुःखी होकर मथुरा जानेके लिये महाप्रभुकी आज्ञाकी याचना :- भितरेर दुःख बाह्ये प्रकाश ना कैला। मथुरा याइते प्रभु-स्थाने आज्ञा मागिला ॥ 22 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितकी पहले भी वृन्दावन जानेकी इच्छा थी, किन्तु महाप्रभुने उन्हें जानेकी अनुमति नहीं दी, इसलिये वे वृन्दावनके लिये नहीं जा पाये। अब उन्होंने अपने भीतरके दुःखको बाहर प्रकाशित नहीं किया और महाप्रभुसे मथुरा जानेके लिये अनुमति माँगी ॥ 21-22 ॥

326 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/23-32 ] महाप्रभुके द्वारा मधुर वचनोंसे सान्त्वना :- प्रभु कहे,–‘मथुरा याइबा आमाय क्रोध करि’। आमाय दोष लागाञा हइबा भिखारी ॥”23 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, –“तुम मेरे प्रति क्रोध करके मथुरा जाओगे, तो मुझपर दोष मढ़कर तुम भिखारी बनोगे ॥”23 ॥ वाम्यस्वभाव होनेपर भी महाप्रभुके चरणोंमें श्रीजगदानन्दके द्वारा सम्भ्रमपूर्वक कातर-निवेदन :- जगदानन्द कहे प्रभुर धरिया चरण। “पूर्व हइते इच्छा मोर याइते वृन्दावन ॥ 24॥ प्रभु-आज्ञा नाहि, ताते ना पारि याइते। एबे आज्ञा देह', अवश्य याइमु निश्चिते ॥”25॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़कर कहने लगे, – “मेरी पहलेसे ही वृन्दावन जानेकी इच्छा थी। हे प्रभो! मुझे आपकी अनुमति नहीं मिली, इसलिये मैं नहीं जा पाया। किन्तु अब आप मुझे अनुमति प्रदान कीजिये, मैं अवश्य ही वहाँ जाऊँगा ॥”24-25॥ भक्तवत्सल महाप्रभुके द्वारा निषेध, श्रीजगदानन्दका हठ :- प्रभु प्रीते ताँर गमन ना करेन अङ्गीकार। तेँहो प्रभुर ठाञि आज्ञा मागे बार बार॥ 26 ॥ अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितके प्रति प्रीति होनेके कारण उनकी वृन्दावन जानेकी बातको स्वीकार नहीं किया, तथापि श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुसे बारम्बार जानेकी अनुमति माँगते रहे ॥ 26 ॥ श्रीस्वरूपसे श्रीजगदानन्दका निवेदन, महाप्रभुकी श्रीजगदानन्दके जानेके विषयमें असहमति :- स्वरूप-गोसाञिरे पण्डित कैला निवेदन। “पूर्व हैते वृन्दावन याइते मोर मन ॥ 27 ॥ प्रभु-आज्ञा बिना ताँहा याइते ना पारि। एबे आज्ञा ना देन मोरे, ‘क्रोधे याह’ बलि’॥ 28॥ अपने जानेके विषयमें महाप्रभुकी सम्मति लेनेके लिये श्रीस्वरूपसे अनुरोध :- सहजेइ मोर ताँहा याइते मन हय। प्रभु-आज्ञा लञा देह', करिये विनय ॥”29 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीसे निवेदन किया, –“मेरी बहुत पहलेसे ही वृन्दावन जानेकी इच्छा थी, किन्तु मैं महाप्रभुकी अनुमतिके बिना वृन्दावन नहीं जा सकता। अब महाप्रभु मुझे यह कहकर अनुमति नहीं दे रहे कि ‘तुम क्रोध करके जा रहे हो।’ मेरी वृन्दावन जानेकी स्वाभाविक इच्छा है, इसलिये आप महाप्रभुसे विनती करके मुझे जानेकी अनुमति दिलवाइये ॥”27-29॥ अनुभाष्य— ‘ ‘क्रोधे याह’ बलि’,—‘क्रोधित होकर जा रहे हों’—ऐसा कहा ॥ 28 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा उसके लिये महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन और आज्ञाकी याचना :- तबे स्वरूप गोसाञि कहे प्रभुर चरणे। “जगदानन्देर इच्छा बड़ याइते वृन्दावने ॥ 30॥ तोमार ठाञि आज्ञा तेँहो मागे बार बार। आज्ञा देह',—मथुरा देखि' आइसे एकबार ॥ 31 ॥ आइरे देखिते यैछे गौड़देशे याय। तैछे एकबार वृन्दावन देखि' आय ॥”32 ॥ अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुके चरणकमलोंमें निवेदन करते हुए कहा, –“जगदानन्दकी वृन्दावन जानेकी बहुत इच्छा है। उन्होंने आपसे बार बार वृन्दावन जानेकी अनुमति माँगी है, कृपया आप उन्हें एकबार मथुराको देखकर आनेकी अनुमति दे

[ 13/30-38 तेरहवाँ अध्याय 327 दीजिये। वे जैसे गौड़देशमें आइके (श्रीशचीमाताके) दर्शनके लिये जाते हैं, उसी प्रकार एक बार उन्हें वृन्दावन देखकर भी आने दीजिये॥”30-32॥ श्रीस्वरूपके अनुरोधपर श्रीजगदानन्दको बुलाकर वहाँपर जाकर करने योग्य कर्त्तव्यका उपदेश :— स्वरूप-गोसाञिर बोले प्रभु आज्ञा दिला। जगदानन्दे बोलाञा ताँरे शिखाइला॥ 33॥ मार्गके विषयमें उपदेश-प्रदान :— “वाराणसी पर्यन्त स्वच्छन्दे याइबा पथे। आगे सावधाने याइबा क्षत्रियादि-साथै॥ 34॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके कहनेपर श्रीजगदानन्द पण्डितको वृन्दावन जानेकी अनुमति दे दी। उन्होंने श्रीजगदानन्द पण्डितको बुलाकर उन्हें समझाते हुए कहा,—“तुम्हें वाराणसी तकके मार्गमें कोई असुविधा नहीं होगी, किन्तु उससे आगे सावधानीपूर्वक किसी क्षत्रिय आदिके साथ ही जाना॥ 33-34॥ अनुभाष्य—‘क्षत्रियादि-साथै’,—डाकुओंसे रक्षा करनेवाले क्षत्रियोंके साथमें॥ 34॥ केवल गौड़ीया पाइले 'बाटपाड़' करि' बान्धे। सब लुटि' बाँधि' राखे, याइते विरोधे॥ 35॥ अनुवाद—गौड़ीयाको अकेले पाकर डाकू उन्हें बाँध लेते हैं। उनको लूटकर उन्हें बाँधकर रखते हैं और उन्हें कहीं जाने नहीं देते॥ 35॥ अनुभाष्य—गौड़ीया अर्थात् गौड़ अथवा बङ्गदेशके मनुष्य—स्वाभाविक रूपमें पतले और दुर्बल दिखते हैं। अकेले मिलनेपर निसहाय दुर्बल व्यक्तियोंको बाटपाड़ अर्थात् मार्गमें लूटनेवाले डाकू बाँधकर रख लेते हैं और उनका समस्त धन ले लेते हैं एवं जानेके विषयमें विरोध करते हैं अर्थात् जाने नहीं देते। किसी-किसीके मतानुसार—गौड़ीयोंको 'सुचतुर' देखकर उनसे डाकूका कार्य करवाते हैं और डाकूके कार्यमें नियुक्त करके उन्हें कभी भी छोड़ते नहीं हैं॥ 35॥ मथुरा पहुँचनेपर कर्त्तव्यका उपदेश; ऐश्वर्य-ज्ञानहीन रागमार्गके भक्तोंके साथ सङ्गके विषयमें सतर्क करना :— मथुरा गेले सनातन-सङ्गे रहिबा। मथुरार स्वामी-सबेर चरण वन्दिबा॥ 36॥ अनुवाद—तुम मथुरा पहुँचकर सनातनके सङ्गमें रहना और मथुरावासी चौबे अर्थात् चतुर्वेदी ब्राह्मणोंके चरणोंकी वन्दना करना॥ 36॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मथुरार स्वामी-सबेर',—मथुरावासी चौबे लोगोंके॥ 36॥ दूरे रहिं' भक्ति करि' सङ्गे ना रहिबा। ताँ-सबार आचार-चेष्टा लइते नारिबा॥ 37॥ अनुवाद—तुम उन चतुर्वेदी ब्राह्मणोंसे दूर रहकर ही उनकी सेवा करना, उनके सङ्गमें मत रहना। तुम उनके आचरण और क्रियाओंको ग्रहण नहीं कर पाओगे॥ 37॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कृष्णके प्रति शुद्धवात्सल्यभावसे वे जो आचरण करते हैं, वह—स्मार्त्तमतके विरुद्ध है; इसे देखकर (ऐश्वर्यभावमें रत) तुम्हारे मनमें अश्रद्धा हो सकती है। किन्तु ब्रजमण्डलवासियोंके प्रति ऐसी अश्रद्धा नहीं होनी चाहिये; क्योंकि, उनकी भक्ति रागात्मिका है। अतएव (तुम्हारे जैसे ऐश्वर्यभावप्रिय भक्तको उन रागमार्गीय लोगोंके साथमें नहीं रहकर) दूर रहकर ही उनके प्रति भक्ति करना उचित है॥ 37॥ सदा श्रीसनातनके सङ्गमें रहनेका उपदेश :— सनातन-सङ्गे करिह वन दरशन। सनातनेर सङ्ग ना छाड़िबा एकक्षण॥ 38॥ अनुवाद—तुम सनातनके साथ जाकर ब्रजमण्डलके

328 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/38–41 ] द्वादश-वनोंका दर्शन करना। तुम सनातनके सङ्गको एक क्षणके लिये भी मत छोड़ना॥ 38॥ श्रीजगदानन्दको विदायी-आलिङ्गन, श्रीजगदानन्दके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना :- श्रीकृष्णसे अभिन्न गोवर्धनपर चढ़नेके लिये निषेध :- एत बलि' जगदानन्दे कैला आलिङ्गन। शीघ्र आसिह, ताँहा ना रहिह चिरकाल। जगदानन्द चलिला प्रभुर वन्दिया चरण॥ 41 ॥ गोवर्धने ना चढ़िह देखिते 'गोपाल'॥ 39॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितको आलिङ्गन किया। श्रीजगदानन्द पण्डितने महाप्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना करके वृन्दावनकी यात्रा आरम्भ की॥ 41॥ अनुवाद-तुम वृन्दावनसे शीघ्र ही लौटकर आ जाना, वहाँ बहुत समय तक मत रहना। और श्रीगोपालका दर्शन करनेके लिये गोवर्धनके ऊपर मत चढ़ना॥ 39॥ अमृतानुकणिका-महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा कि तुम वृन्दावन जाओ, परन्तु शीघ्र ही लौट आना। महाप्रभु जानते थे कि वे अधिक दिन वृन्दावन रह नहीं पायेंगे। (श्रीश्रीप्रेमविवर्त तेरहवाँ-चौदहवाँ अध्याय)- अमृतप्रवाह भाष्य-अधिक दिन तक व्रजमें रहनेपर व्रजवासियोंके दोषादि देखकर श्रद्धा कम हो जाती है। अतएव जिन्हें रागमार्ग प्राप्त नहीं हुआ, उनका व्रजमें वास करना उचित नहीं है, व्रजदर्शन करके शीघ्र लौटकर आ जाना ही अच्छा है। श्रीगोपालके दर्शनके लिये गोवर्धनपर नहीं चढ़ना, क्योंकि गोवर्धन-साक्षात् भगवान्की मूर्ति हैं; उनके ऊपर चढ़ना अच्छा नहीं है। गोपाल जब-जब अन्यान्य स्थानोंपर जाते हैं, उस समय उनका दर्शन करना ही अच्छा है॥ 39॥ “गौराङ्ग तोमार, चरण छाड़िया, चलिनु श्रीवृन्दावने। पूर्व-लीला तव, देखिब बलिया, हइल आमार मने॥” श्रीजगदानन्दने विचार किया कि वृन्दावन जाकर महाप्रभुके पूर्व जीवनकी लीला स्थलियोंका दर्शन करूँगा। जहाँ राधाजीने मान किया था और कृष्णने उनके मान-भञ्जनके लिये उनकी सेवा की थी, ऐसे (सेवाकुञ्ज) आदि उन सब स्थानोंमें जाऊँगा। श्रीसनातनको महाप्रभुके आनेका संवाद बतलाकर भजनके स्थानका निर्वाचन करनेका आदेश :- आमिह आसितेछि, - कहिह सनातने। आमार तरे एकस्थान करे वृन्दावने॥ "40॥ परन्तु वे पुरीसे थोड़ी दूर जानेपर एक निर्जन वनमें एक वृक्षके नीचे बैठकर चिन्ता करने लगे,-"मैं जो कुछ भी लाता हूँ, महाप्रभु उसे स्वीकार नहीं करते। मैं तो केवल उनकी सेवाके लिये यह सब करता हूँ, इसमें मेरा कोई स्वार्थ नहीं है। परन्तु वे सब समय ऐसा ही करते हैं, इसलिये मैंने वृन्दावन जानेका निश्चय किया। उनके बिना मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता, मैं उनको छोड़कर नहीं जा सकता। अनुवाद-तुम सनातनसे कहना कि मैं पुनः वृन्दावन आऊँगा। वह मेरे लिये वृन्दावनमें एक रहनेके स्थानकी व्यवस्था करे॥ "40॥ अनुभाष्य-महाप्रभुके पुनः वृन्दावन जानेकी बात किसी प्रामाणिक ग्रन्थमें नहीं मिलती; परवर्ती 70 संख्यामें सनातन-प्रभुके द्वारा महाप्रभुके वासस्थानके रूपमें निर्वाचित स्थानके संस्कारके द्वारा अनुमान होता है कि महाप्रभु बादमें पुनः वृन्दावन जा भी सकते हैं॥ 40॥ केन सेइ भाव, हइल आमार, एखन काँदिया मरि। तोमारे ना देखि', प्राण छाड़ि' याय ना जानि एबे कि करि॥

[ 13/41 ]             तेरहवाँ अध्याय             329

हाय! क्यों ऐसे भाव मेरे हृदयमें आये कि वृन्दावन जाऊँ? अब तो मैं मर रहा हूँ। क्यों मैंने महाप्रभुसे आदेश लिया कि मैं वृन्दावन जाऊँ? अब मैं जा नहीं पा रहा हूँ, मेरे पाँव नहीं चलते हैं, मन जाना नहीं चाह रहा है। मैंने उनसे यह आदेश क्यों माँगा? अब तो उन्होंने आदेश दे दिया और मैं चला आया, किन्तु उन्हें न देखनेसे मेरे प्राण मुझे छोड़कर चले जा रहे हैं, मैं इन्हें रोक नहीं सकता। समझ नहीं पा रहा हूँ कि वृन्दावन जाऊँ अथवा नहीं? क्या करूँ? और यदि यहींसे लौट जाऊँ, तो महाप्रभु व्यङ्ग करेंगे कि क्या वृन्दावनके दर्शन कर आये हो? ओ राङ्गा चरण, मम प्राण-धन, समुद्रबालिते राखि'। कि देखिते आईनु, निज माथा खाइनु, उड़ु उड़ु प्राणपाखी ॥ 'ओ रक्तिम (लाल) चरण!' उनके चरण प्रेमकी पुतली हैं। वे लाल-लाल चरण मेरे प्राण-धन हैं। नीलाचलमें समुद्र तटकी बालूमें अङ्कित उन चरणोंको छोड़कर मैं यहाँ क्या देखने आया हूँ? मैं केवल अपना सिर खा रहा हूँ। अब मेरे प्राण छटपट कर रहे हैं, उनके विरहमें मैं जीवित नहीं रह सकता। यत चलि' याइ, मन नाहि चले, तबु याइ जेद करि'। प्रेमेर विवर्त, आमारे नाचाय, ना बुझिया आमि मरि ॥” मेरी जानेकी इच्छा नहीं है। मेरे पैर नहीं चलते और मन भी नहीं चलता। यद्यपि मन तो महाप्रभुके पास लौटकर जाना चाहता है, तथापि मैं हठ करके वृन्दावनकी ओर जा रहा हूँ। प्रेमका विवर्त मुझे नचा रहा है, मेरे हृदयको नचा रहा है। मन प्रबोध नहीं मानता और मैं मर रहा हूँ।” श्रीजगदानन्द वहीं नीलाचलमें पेड़के नीचे बैठकर यह सब सोच रहे हैं। वे जितना ही महाप्रभुको छोड़कर जाना चाहते हैं, उतनी ही महाप्रभुकी लीलाएँ, उनका प्रेमकलह सभी कुछ उनको स्मरण आता है और वे आगे नहीं बढ़ पाते। “गौराङ्गेर रङ्ग, बुझिते नारिनु, पड़िनु दुःख-सागरे। आमि चाइ याहा, नाहि पाइ ताहा, मन ये केमन करे।” वहीं बैठे मनमें विचार कर रहे हैं, – “महाप्रभुके आचरणको मैं समझ नहीं पाता, मैं दुःखके सागरमें पड़ा हुआ हूँ। गौरचन्द्रके प्रेमको मैं समझ नहीं पाता हूँ। उनके सिरमें दर्द होता है और उससे उन्हें बहुत कष्ट होता है। उसका निवारण करनेके लिये मैं उनके लिये तेल लेकर आया, किन्तु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। थोड़ासा तेल लगानेमें क्या दोष है? मैंने देखा कि उनका शरीर अति क्षीण हो रहा है। वे भूमिपर केवल चटाईके ऊपर सोते हैं और उनकी हड्डियोंमें चुभन होती है। मुझसे यह सहन नहीं होता, इसलिये मैंने थोड़ी-सी रुई लाकर उनके लिये एक गद्दा बनाया, तो उन्होंने उसे भी ग्रहण नहीं किया। अपितु मुझे प्रताड़ित करते हुए कहने लगे, – 'मैं तुम्हारे रुईके गद्देपर लेट जाता हूँ और तेल लगानेके लिये एक अङ्ग-मर्दन करनेवाला भी ले आओ, बादमें स्त्रियाँ भी मेरी सेवा करेंगी। इस प्रकार मेरे संन्यासकी बहुत प्रशंसा होगी।' मैं कभी-कभी वनके शाक, इमलीके पत्तोंकी चटनी आदि बनाता हूँ, उसे वे बहुत प्रेमसे खाते हैं। यदि मैं नहीं रहूँगा, तो कौन बनायेगा? उनके कार्य-कलाप मैं नहीं समझ पाता हूँ। छोटा हरिदासने थोड़ासा चावल किसी वैष्णवीसे माँग लिया तो उसका जीवन भरके लिये त्याग कर दिया। यह उनका कैसा विचार है? इन सब विचारोंको मैं नहीं समझ पाता। मैं महाप्रभुको सुख प्रदान करनेके लिये उनकी सेवा करता हूँ, परन्तु वे उसे ग्रहण नहीं करते। मैं अनेक प्रकारकी मिठाइयाँ और अच्छे-अच्छे पकवान भी बनाकर उन्हें परोसता हूँ, किन्तु वे तो बिना तेलके

330 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/41 ] सूखा वनका शाक, इमलीके पत्तेकी चटनी अथवा लाफरा ही खाते हैं। “गौराङ्गेर तरे, प्राण दिते याइ, ना हय मरण तबु।” मरिब बलिया, पड़िया समुद्रे, खाइ मात्र हाबुडुबु॥” गौरचन्द्रके लिये मैं प्राण देना चाहता हूँ। कैसे उनको सुखी बनाऊँ? किन्तु हो नहीं पाता। कभी कभी सोचता हूँ कि प्राण त्याग दूँ और जाकर समुद्रमें कूद जाता हूँ। नाक और मुखमें पानी भर जाता है, परन्तु उसी समय उनके चन्द्रमुखका स्मरण हो आता है और उसे देखे बिना रहा नहीं जाता। “से चन्द्रवदन, देखिबार लोभे, शीघ्र उठि सिन्धुतटे, पुनः नाहि देखि, प्राण उड़ि' याय, चलि पुनः टोटावाटे॥” इसलिये शीघ्रतासे पानीसे निकलकर उनके मुखचन्द्रका दर्शन करनेके लोभसे महाप्रभुके निकट आता हूँ, किन्तु निकट जाते ही मन पुनः खिन्न हो जाता है और वहींसे लौट आता हूँ। यदि महाप्रभु कहें कि समुद्रमें डूबकर मरनेके लिये गये थे, तो मरे क्यों नहीं? मर जाते। तो मैं कैसे कहता कि आपके दर्शनके लिये नहीं मरा। प्रेममें ऐसी बात नहीं कही जाती। समुद्रसे निकलकर दर्शन करनेके लिये गम्भीराके पास पहुँचकर सोचा कि अब कैसे मिलने जाऊँ? इसलिये पुनः लौटकर अपने स्थानपर चला आया। परन्तु उनके मुखचन्द्रका दर्शन नहीं पानेसे प्राण निकलनेको तत्पर होते हैं। पुनः आइटोटामें गदाधर पण्डितजीके पासमें चला आया। गोपीनाथाङ्गाने, देखि' गोरामुख, पड़ि अचेतन हञा। पण्डित गाँसाञि, मोरे लञा राखे, देखि पुनः संज्ञा पाञा॥ वहाँ महाप्रभु गदाधर पण्डितसे बातचीत कर रहे थे। मैंने दूरसे महाप्रभुका मुखचन्द्र देखा और देखते ही अचेतन हो गया। गदाधर पण्डित मुझे देखकर शीघ्रतासे उठकर मेरे पास आये। मैं तो प्रेममें अचेतन पड़ा था। समुद्रसे तो पीड़ा लेकर आया और यहाँ जब महाप्रभुका मुखचन्द्र देखा तो इतना आनन्द हुआ कि उसे सह नहीं सका और प्रेममें मूर्च्छित हो गया। गदाधर पण्डितने पानीका छींटा देकर पंखा झलकर किसी प्रकारसे मुझे चेतन किया। गौर-गदाधर, बसिया दु'जने, बलेन आमार कथा। अमनि काँदिया, याइ गड़ागड़ि, ना विचारि यथा तथा। गौर और गदाधर, ये दोनों बैठकर मेरे विषयमें ही वार्तालाप कर रहे थे। गदाधर कह रहे थे,-'आप इनकी बात क्यों नहीं मान लेते? थोड़ी-सी सेवा ग्रहण कर लेंगे तो क्या दोष हो जायेगा?' महाप्रभुने कहा,- 'यह मुझे विषय भोग करवाना चाहता है। मैं कैसे इसकी बात मान लूँ? यह गद्दा, तकिया बनाकर लाता है, सुगन्धित तेल लेकर आता और मालपुआ, खीर, रबड़ी आदि अनेक प्रकारके मिष्ठान्न बनाकर लाता है। मैं संन्यासी होकर इन्हें कैसे ग्रहण करूँगा? यह तुम्हारे समान सेवा क्यों नहीं करता है? मैं जैसे कहता हूँ, तुम ठीक वैसा ही करते हो। तो यह क्यों नहीं वैसा करता है?' गदाधर कहने लगे,- 'इनकी कुछ बात मान लेनेमें क्या दोष है?' उनकी बातोंको सुनकर, अपने प्रति महाप्रभु और गदाधर पण्डितके स्नेहको जानकर मैं फफक-फफक कर रोने लगा। मैं कुछ विचार नहीं कर सका और प्रेममें रोते हुए भूमिपर लोटने लगा। क्षणके विरह, सहिते ना पारि, गौर मोर हृदे नाचे! मरिते ना देय, बाँचिले कोन्दल, किसे मोर प्राण बाँचे ॥ मेरे लिये बड़ी भारी समस्या है, मैं महाप्रभुका विरह

[ 13/41 तेरहवाँ अध्याय 331 तनिक भी नहीं सह सकता, उनके बिना नहीं रह सकता। सब समय वे मेरे हृदयमें नाच रहे हैं, सब समय उनकी लीलाओंका स्मरण हो रहा है, उनके प्रेमका स्मरण हो रहा है। मैं मर भी नहीं सकता और जीवित रहनेपर प्रेम कलह, कैसे मैं अपने प्राण धारण करूँ? हेन अवस्थाय, गौरपद छाड़ि, मोर वृन्दावने आसा, ए बुद्धि हइल, केन नाहि जानि, इह-परलोक-नाशा॥ यह मेरी बुद्धि कैसे हुई कि महाप्रभुके प्रेममय चरणोंको छोड़कर मैं वृन्दावन जाऊँ? इससे तो मेरे इहलोक और परलोक, दोनों ही नष्ट हो जायेंगे। आज्ञा लइनु याइते, आज्ञा ना पालिले, ता'ते हय अपराध। गोराचाँदमुख, ना देखिया मरि, सब दिके मोर बाध॥ अब आज्ञा तो ले ली और यदि ना जाऊँ तो अपराध होगा। यह बड़ी भीषण समस्या हो गयी, अब मैं क्या करूँ? यदि महाप्रभुके आदेशका पालन नहीं करूँ तो अपराध होता है। और उनके आदेशका पालन करनेके लिये जाऊँ, तो मैं प्राण नहीं धारण कर पाऊँगा। अब मैं क्या करूँ? सभी ओर अब केवल विपत्ति ही विपत्ति है। गोराप्रेम या'र, सङ्कट ताहार, प्राण लञा टानाटानि। गदाधरगणे, एइ त' दुर्दशा, सबे करे काणाकाणि॥ जिसको श्रीकृष्ण या महाप्रभुसे ऐसा प्रेम हो गया है, उसके लिये सब समय सङ्कट ही सङ्कट है। प्राण लेकर ही खींचातानी है। सीताजीका रामचन्द्रजीसे प्रेम देखो। कैसा प्रेम है? जीवनमें जिसको हम सुख कहते हैं, वह सुख उन्हें कभी नहीं मिला। विवाहके बादसे ही केवल दुःख ही दुःख—वनवास, रावणके द्वारा हरण। कुछ समयके लिये अल्प सुख मिला, किन्तु पुनः रामचन्द्रने सदाके लिये उनको छोड़ दिया। राधाजीने कृष्णसे प्रेम किया, किन्तु अब विरहमें मर रही हैं। मिलनमें भी क्षणिक आनन्द होता है, किन्तु भावी विरहकी सम्भावनासे दुःखी हो जाती हैं और फिर जहाँ विरह अनुभव हुआ तो वे सब कुछ भूल जाती हैं। वे अनुभव करने लगती हैं कि आज तक कभी कृष्ण मुझसे नहीं मिले, मैंने कभी उनको देखा ही नहीं और विरहमें तड़पने लगती हैं। गोपियाँ कृष्णके विरहमें इतनी दुःखी हैं। उनकी विरह दशा देखकर उद्धवजी भी अत्यन्त विचलित हो गये और वृन्दावनमें रहनेकी अभिलाषा लेकर भी नहीं रह सके, पुनः मथुरा लौट गये। साधारण लोग इस विरह दशाको नहीं समझ पाते। जो गदाधरके गण हैं, वे ही समझ सकते हैं। जो गदाधरके गण नहीं हैं, वे आपसमें कानाफूसी करते हुए कहते हैं कि गदाधरके गणोंकी ऐसी ही दुर्दशा होती है। भाइरे वृन्दावने याओया आर ह'लो ना! गोरामुख ना देखिया, गोरारूप धेयाइया, पथ भूलि' याइ अन्य देश। येखान हइते फिरि' पुनः याइ धीरे धीरे, पुनः आसि देखि से प्रदेश॥ वृन्दावन जा रहा था, गौरचन्द्रका दर्शन नहीं करके इतना तीव्र विरह हुआ कि उनका ही चिन्तन करने लगा और इसी चिन्तनमें मार्ग भूल गया। वृन्दावन जानेका सङ्कल्प किया था, किन्तु पैर किधर जा रहे हैं, यह पता नहीं। महाप्रभुका चिन्तन करते-करते अपनेमें खो गया। बहुत दूर आनेपर किसीसे वृन्दावन जानेका मार्ग पूछा, तो पता चला कि वह तो बहुत पीछे छूट गया। मैं वहाँसे लौटा, किन्तु पुनः महाप्रभुकी लीलाके स्मरणमें खो गया। एइरूपे कतदिने, याब आमि वृन्दावने, ना जानि कि हबे दशा मोर। वृक्षतले बसि' बसि' काटि आमि अहर्निशि, कभु मोर निद्रा आसे घोर॥'

332 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/41-42 ] इस प्रकार कुछ दिन चलते-चलते सोचता रहता कि मैं वृन्दावनमें जा रहा हूँ और सदा महाप्रभुके चिन्तनमें विभोर रहता। जब रात हो जाती तो किसी वृक्षके नीचे सो जाता। एक बार मुझे घोर निद्रा आ गयी। और जिसका सदा चिन्तन कर रहा था उसीका स्वप्नमें दर्शन करने लगा और उसीमें विभोर हो गया। स्वप्ने बहु दूरे गिया, सिन्धुतटे प्रवेशिया, देखि गोरार अपूर्व नर्तन। गदाधर नाचे सङ्गे, भक्तगण नाचे रङ्गे, गाय गीत अमृतवर्षण॥ स्वप्नमें देखा कि अब मैं समुद्रके तटपर आ गया हूँ। वहाँ गौरचन्द्र नृत्य कर रहे हैं। भक्तलोग भी नाच रहे हैं और गदाधर पण्डित भी। स्वरूप दामोदर, रायरामानन्द आदि अपूर्व रसकी वर्षा करते हुए कीर्तन कर रहे हैं। नृत्यगीत-अवसाने, गोरा मोर हात टाने, बले, “तुमि क्रोधे छाड़ि गेले। आमार कि दोष बल, तव चित्त सुचञ्चल, व्रजे गेले आमा हेथा फेले॥' जब नृत्यगीत समाप्त हुआ, तब महाप्रभु मेरे निकट आये और मेरे हाथको पकड़कर बोले,- 'तुम क्रोध करके मुझे अकेला छोड़कर चले गये। मेरा क्या दोष था कि मुझे छोड़कर चले गये? तुम्हारा चित्त बहुत चञ्चल है। मुझे यहाँपर छोड़कर तुम अकेले वृन्दावन चले गये।' आइस आलिङ्गन करि, तब वक्षे वक्ष धरि', छाँड़ो मुञि चित्तेर विकार। मध्याह्ने करिया पाक, देह मोरे अन्न शाक, क्षुन्निवृत्ति हउक् आमार ॥ गौरचन्द्र मेरा आलिङ्गन करके कहने लगे,-'तुम अपने चित्तमें मेरे प्रति क्रोधको छोड़ दो। तुम भी दुःख पा रहे हो और मैं भी दुःख पा रहा हूँ। दोपहर हो गयी है और मुझे भूख लग रही है। तुम्हारे चले जानेपर कौन भोजन बनायेगा और कौन मुझे खिलायेगा ? जैसा शचीमाता बनाती है, वैसा ही चावल-शाक बनाकर खिलाओ जिससे मेरी तृप्ति हो। छाड़िया जगदानन्दे, मोर मन निरानन्दे, भोजनादि लइल कत दिन। कि बुझिया गेले तुमि, दुःखेते पड़िनु आमि, जगा मोरे सदा दयाहीन॥ मुझे भोजन किये हुए कितने दिन हो गये। हे जगदानन्द! तुम्हें छोड़कर मैं आनन्द रहित हो गया हूँ। क्या समझकर तुम मुझे छोड़कर चले गये? तुम जानते नहीं कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता और तुम भी मेरे बिना नहीं रह सकते। ओ जगा! तुम बड़े निष्ठुर हो। तुम क्या नहीं जानते कि तुम्हारे भोजन नहीं बनानेसे मैं नहीं खा सकता? शीघ्र व्रज निरखिया, आइस तुमि सुखी हञा, मोरे देह शाकान्न व्यञ्जन। तबे त' बाँचिव आमि, ता'ते सुखी हबे तुमि, क्रोधे मोरे ना छाड़ कखन॥ तुम व्रजके दर्शन करके शीघ्र ही लौटकर आ जाओ। तुम्हारे आनेसे ही मैं सुखी होऊँगा। मुझे शाक, चावल, तरकारी आदि दो। क्रोध करके मुझे कभी छोड़कर मत जाना।' इसके बाद मेरी निद्रा भङ्ग हो गयी और देखा कि अभी व्रजभूमि बहुत दूर है।” यह वास्तविक प्रेम है। ऐसा ही प्रेम यदि शिष्यका गुरुसे होगा तो यह बढ़ते-बढ़ते श्रीकृष्ण तक जायेगा। जब शिष्यकी ऐसी दशा हो कि वह अनुभव करे कि मैं गुरु और श्रीकृष्णकी सेवा नहीं कर पा रहा हूँ तो मैं क्यों प्राण धारण कर रहा हूँ, तब यह समझना चाहिये कि शिष्यके अन्दर कृष्णप्रेम उदित हुआ है।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज” ॥ 41 ॥ भक्तोंसे विदायी लेकर काशी-आगमन :- सब भक्तगण-ठाञि आज्ञा मागिला। वनपथे चलि' चलि' वाराणसी आइला ॥ 42 ॥

[ 13/42-50 तेरहवाँ अध्याय 333

तपनमिश्र और वैद्य चन्द्रशेखरके साथ साक्षात्कार और संलाप :- तपनमिश्र, चन्द्रशेखर, —दोंहारे मिलिला। ताँर ठाञि प्रभुर कथा सकल शुनिला ॥ 43 ॥

अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने सभी भक्तोंसे भी वृन्दावन जानेकी अनुमति ली और वनके पथसे चलते-चलते वाराणसी पहुँचे। वहाँ वे श्रीतपन मिश्र और श्रीचन्द्रशेखर वैद्यसे मिले तथा उन्होंने उन दोनोंसे महाप्रभुके द्वारा वाराणसीमें की गयी समस्त लीलाओंका श्रवण किया ॥ 42-43 ॥

मथुरामें श्रीसनातनके साथ मिलन और दोनोंका आनन्द :- मथुराते आसि' मिलिला सनातने। दुइजनेर सङ्गे दुँहे आनन्दित मने ॥ 44 ॥

अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित मथुरा पहुँचकर श्रीसनातन गोस्वामीसे मिले। परस्पर मिलनसे दोनोंका ही मन आनन्दित हो गया ॥ 44 ॥

श्रीसनातनके आनुगत्यमें श्रीजगदानन्दका द्वादशवन-दर्शन :- सनातन कराइला ताँरे द्वादशवन-दरशन। गोकुले रहिला दुँहे देखि' महावन ॥ 45 ॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीजगदानन्द पण्डितको द्वादश वनोंके दर्शन कराये। महावनके दर्शन करनेके पश्चात् दोनों गोकुलमें ही रह गये ॥ 45 ॥

दोनोंका एक ही साथमें रहना, किन्तु पृथक् अभ्यास होनेके कारण पृथक् खाद्य-ग्रहण :- सनातनेर गोफाते दुँहे रहे एकठाञि। पण्डित पाक करेन देवालये याइ' ॥ 46 ॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीकी गुफामें वे दोनों एक साथ रहने लगे। श्रीजगदानन्द पण्डित मन्दिरमें जाकर रसोई बनाते थे ॥ 46 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—सनातनने तब माधुकरी-भिक्षामें प्राप्त रोटियोंके टुकड़ोंको खाकर जीवन निर्वाह करनेका अभ्यास किया था। प्रतिदिन चावल नहीं खानेसे मेरी तृप्ति नहीं होगी, यह कहकर श्रीजगदानन्द पण्डित मन्दिरमें जाकर भोजन बनाते थे। व्रजके मन्दिरोंमें चावल-दालका प्रसाद नहीं मिलता था ॥ 46 ॥

सनातन भिक्षा करेन याइ' महावने। कभु देवालये, कभु ब्राह्मण-सदने ॥ 47 ॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी महावनमें जाकर भिक्षा करते थे, वे कभी किसी मन्दिर और कभी किसी ब्राह्मणके घरपर प्रसाद पाते थे ॥ 47 ॥

मानद श्रीसनातनके द्वारा श्रीजगदानन्दकी सेवा :- सनातन पण्डितेर करे समाधान। महावने देन आनि' मागि' अन्न-पान ॥ 48 ॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी श्रीजगदानन्द पण्डितकी समस्त आवश्यकताओंको पूर्ण कर देते थे। वे महावनसे श्रीजगदानन्द पण्डितके खाने-पीनेके लिये चावल-छाछ आदि भिक्षा करके ले आते थे ॥ 48 ॥

अनुभाष्य— 'समाधान', — सभी कार्योंका सम्पादन अथवा सेवा ॥ 48 ॥

एकदिन श्रीजगदानन्दके द्वारा श्रीसनातनको निमन्त्रण और रसोई बनाना :- एकदिन सनातने पण्डित निमन्त्रिला। नित्यकृत्य करि' तँह पाक चड़ाइला ॥ 49 ॥

अनुवाद—एकदिन श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीसनातन गोस्वामीको अपने साथ प्रसाद पानेका निमन्त्रण दिया। श्रीजगदानन्द पण्डित अपने नित्यकृत्य करके भोजन बनाने लगे ॥ 49 ॥

मस्तकपर संन्यासीके द्वारा दिये वस्त्रको पहनकर श्रीसनातनका श्रीजगदानन्दके घरमें आगमन :- 'मुकुन्द सरस्वती' नाम संन्यासी महाजने। एक बहिर्वासे तँहो दिल सनातने ॥ 50 ॥

334 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/50-61 ] सनातन सेइ वस्त्र मस्तके बान्धिया। जगदानन्देर वासा-द्वारे बसिला आसिया॥ 51 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीको मुकुन्द सरस्वती नामक एक संन्यासी महाजनने अपना एक बहिर्वास दिया। श्रीसनातन गोस्वामी उस वस्त्रको सिरपर बाँधकर श्रीजगदानन्द पण्डितके द्वारपर आकर बैठ गये॥ 50-51 ॥ श्रीसनातनके वस्त्रको महाप्रभुके द्वारा दिया गया वस्त्र मानकर पण्डितका प्रेम :- रातुल वस्त्र देखि' पण्डित प्रेमाविष्ट हइला। 'महाप्रभुर प्रसाद' जानि' ताँहारे पुछिला॥ 52 ॥ श्रीसनातनकी वस्त्रप्राप्तिके कारणकी जिज्ञासा :- “काँहा पाइला तुमि एइ रातुल वसन?” “मुकुन्द-सरस्वती दिल”,—कहेन सनातन॥ 53 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीके सिरपर बँधे गेरुए वस्त्रको देखकर श्रीजगदानन्द पण्डित प्रेमाविष्ट हो गये और उन्होंने उस वस्त्रको महाप्रभुका प्रसादी-वस्त्र समझकर श्रीसनातन गोस्वामीसे पूछा,—“तुम्हें यह गेरुआ वस्त्र कहाँसे मिला?” श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मुझे यह वस्त्र मुकुन्द सरस्वतीने दिया है॥” 52-53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘रातुल’,—गेरुआ॥ 52 ॥ महाप्रभुके अतिरिक्त अन्य संन्यासियोंके दानको ग्रहण करनेसे श्रीजगदानन्दको क्रोध :- शुनि' पण्डितेर मने क्रोध उपजिल। भातेर हाण्डि हाते लञा मारिते आइल॥ 54 ॥ अनुवाद—यह सुनते ही श्रीजगदानन्द पण्डित बड़े क्रोधित हो गये और वे चावलकी हाण्डीको हाथमें लेकर श्रीसनातन गोस्वामीको मारनेके लिये आये॥ 54 ॥ श्रीसनातनको लज्जा :- सनातन ताँरे जानि' लज्जित हइला। बलिते लागिला पण्डित, हाण्डि चुलाते धरिला॥ 55 ॥ श्रीजगदानन्दके द्वारा श्रीसनातनकी भर्त्सना :- “तुमि महाप्रभुर हओ पार्षद-प्रधान। तोमा-सम महाप्रभुर प्रिय नाहि आन॥ 56 ॥ अन्य संन्यासीर वस्त्र तुमि धर शिरे। कोन् ऐछे हय,—इहा पारे सहिवारे??” 57 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके महाप्रभुके प्रति प्रेमको श्रीसनातन गोस्वामी भली-भाँति जानते थे, इसलिये वे अपने इस आचरणसे लज्जित हो गये। श्रीजगदानन्द पण्डित भी हाण्डीको चूल्हेपर रखकर श्रीसनातन गोस्वामीसे कहने लगे,—“तुम महाप्रभुके प्रधान पार्षद हो। महाप्रभुको तुम्हारे समान अन्य कोई प्रिय नहीं है। तुमने अन्य किसी संन्यासीके वस्त्रको अपने सिरपर धारण किया है, तो महाप्रभुके भक्तोंमें कौन ऐसा होगा जो तुम्हारे इस आचरणको सहन कर पायेगा?” 55-57 ॥ अनुभाष्य—‘जानि’’,—बतलाकर अथवा गौरप्रेममय जानकर॥ 55 ॥ अमानी मानद महाधीर श्रीसनातन-गोस्वामीका आत्मदैन्य और श्रीजगदानन्दकी गौरप्रेममें निष्ठाकी प्रशंसा :- सनातन कहे,—“साधु पण्डित-महाशय। तोमा-सम चैतन्येर प्रिय केह नय॥ 58 ॥ ऐछे चैतन्यनिष्ठा योग्य तोमाते। तुमि ना देखाइले इहा शिखिमु केमते?? 59 ॥ श्रीजगदानन्दके प्रेमकी परीक्षा और उसका प्रत्यक्ष दर्शन :- याहा देखिबारे वस्त्र मस्तके बान्धिलुँ। सेइ अपूर्व प्रेम एइ प्रत्यक्ष देखिलुँ॥ 60 ॥ रागमार्गीय परमहंसके लिये गेरुआ वस्त्र पहननेके विषयमें निषेध :- रक्तवस्त्र ‘वैष्णवेर’ परिते ना युयाय। कोन प्रवासीरे दिमु, कि काय उहाय??” 61 ॥

[ 13/58–61 तेरहवाँ अध्याय 335 अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—‘हे श्रीजगदानन्द पण्डित महाशय, आपने जो हाण्डी उठा ली उसके लिये मैं आपको साधुवाद देता हूँ अर्थात् उसका अभिनन्दन करता हूँ। वास्तवमें आपके समान श्रीचैतन्य महाप्रभुको अन्य कोई प्रिय नहीं है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके प्रति आपकी ऐसी निष्ठा उपयुक्त ही है। यदि आप ऐसी निष्ठा नहीं दिखलायेंगे, तब फिर मैं कैसे सीखूँगा? मैंने जिसे देखनेके लिये इस गेरुए वस्त्रको मस्तकपर बाँधा था, मैंने उस अपूर्व प्रेमको प्रत्यक्ष देख लिया। वास्तवमें वैष्णवको गेरुआ वस्त्र पहनना शोभा नहीं देता। मैं यह वस्त्र किसी भ्रमणशील व्यक्तिको दे दूँगा, यह वस्त्र मेरे किस कामका है?”58–61 ॥ अनुभाष्य—वैष्णवगण—परमहंस और अकिञ्चन होते हैं। इसलिये वैधीभक्तिका पालन करनेवाले संन्यासियोंके द्वारा पहने जानेवाले गेरुए वस्त्रोंको पहनकर उन्हें (वैष्णवोंको) अपने परमहंस आश्रमका निर्देश अथवा प्रदर्शन नहीं करना पड़ता। विशेषतः अद्वितीय परमेश्वर श्रीगौरहरिके द्वारा एकदण्डीके वेशको स्वीकार करनेके कारण, उनके चरणाश्रित किङ्कर उनके दासाभिमानके कारण अप्राकृत चिद्विलास-भेद बुद्धिसे वेशग्रहणके विषयमें उनके जैसे व्यवहारको करनेके योग्य अथवा वैसे करनेकी विधि है, ऐसा नहीं मानते। संन्यास ग्रहण करके परमहंस वैष्णव-गुरूके आश्रयमें रहकर वैष्णवदासगण स्वयंको वर्णाश्रमातीत परमहंस-वैष्णवके आसनपर अधिष्ठित होनेके अयोग्य समझकर बहुत बार दैन्यज्ञापित करनेके उद्देश्यसे गुरु-वैष्णवोंके लिये अनुचित तुर्याश्रमोचित गेरुए वस्त्रोंको पहनते भी हैं॥ 61 ॥ अमृतानुकणा—श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा मस्तकपर बाँधा हुआ गेरूआ-वस्त्र श्रीमुकुन्द सरस्वती नामक किसी एकदण्डी संन्यासीके द्वारा दिया गया है, यह जानकर श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीसनातनकी जो भर्त्सना की थी और उसके बाद श्रीसनातन गोस्वामीने उसके उत्तरमें जो “रक्तवस्त्र वैष्णवेर परिते ना युयाय” कहा था, इससे कोई कोई वैष्णवसे शास्त्र अध्ययन ना करके विवर्त्तग्रस्त होकर विचार करते हैं कि ‘गेरूए वस्त्रका व्यवहार वैष्णवके लिये उचित नहीं है।’ ‘रातुल-वस्त्र’ या ‘रक्त-वस्त्र’ कहनेसे मुख्यतः कषाय वस्त्र या गैरिक-वस्त्र ही उद्दिष्ट होता है, इसमें सन्देह नहीं है। श्रीजगदानन्द-पण्डितकी कभी भी ‘गेरूए वस्त्र’के प्रति उदासीनता नहीं थी, जिसके कारण उन्होंने गेरूए वस्त्रको देखकर क्षुब्ध होकर श्रीसनातन गोस्वामीकी भर्त्सना की थी। उन्होंने स्वयं महाप्रभुके लिये गद्दे और तकियेको प्रस्तुत करके कपड़ेको गेरूए रङ्गमें रङ्गा था,—“सूक्ष्म वस्त्र आनि' गेरि दिया राङ्गाइला। शिमुलीर तुला दिया ताहा पूराइला॥” (अन्त्यलीला 13/7)। श्रीसनातन गोस्वामीके मस्तकके ऊपर धारण किये गेरूए-वस्त्रको देखकर पहले उसे महाप्रभुका प्रसादी वस्त्र जानकर प्रेमाविष्ट हुए थे,—“रातुल वस्त्र देखि' पण्डित प्रेमाविष्ट हइला।” किन्तु जिनकी वे महाप्रभुके प्रधान पार्षदगणोंमें गणना करते थे, (“तुमि महाप्रभुर हओ पार्षद-प्रधान। तोमा-सम महाप्रभुर प्रिय नाहि आन॥”) उन श्रीसनातनप्रभुका मस्तक एकमात्र महाप्रभुके उच्छिष्ट वस्त्रके ही द्वारा भूषित होने योग्य है,—उस स्थानपर किसी एकदण्डी संन्यासीके वस्त्रको धारण करनेसे महाप्रभुके ‘निज-धन’–रूप श्रीसनातनके द्वारा अवज्ञा ही हुई है और वह श्रीजगदानन्दके लिये अत्यन्त असहनीय होनेके कारण उन्होंने श्रीसनातनकी इस प्रकारसे प्रणय भर्त्सना की थी। इसके द्वारा उनका गेरूए-वस्त्रके प्रति विरोध किस प्रकार प्रकाशित होता है? वास्तवमें इसके द्वारा श्रीजगदानन्दका श्रीमहाप्रभु और उनके प्रधान सेवक श्रीसनातन—इन दोनोंके प्रति ही अतिशय प्रणय प्रकाशित हुआ है। “रक्तवस्त्र वैष्णवेर परिते ना युयाय”—इस वाक्यसे गेरूए-वस्त्र और संन्यासवेश-धारण अर्थात् पक्षान्तरमें संन्यास ग्रहण वैष्णवोंका कभी भी कर्तव्य नहीं है, यही यदि श्रीसनातन गोस्वामीका अभिप्राय हो, तब उसके

अनुसार श्रीचैतन्य महाप्रभु और उनके संन्यासी सङ्गिगणोंका संन्यासवेशका भी अवैधरूपमें विचार किया जायेगा। धर्मकी संस्थापनाके लिये अवतीर्ण 'स्वयं भगवान्'का संन्यास ग्रहण करना और उसके योग्य वेश धारण करना अवैध है! इस प्रकारका अशास्त्रीय विचार समस्त शास्त्रोंको जाननेवाले श्रीसनातन गोस्वामीके लिये कभी भी सम्भव नहीं है। समस्त वेद, उपनिषत्, पुराण, संहिता, यहाँ तक कि सर्वशास्त्रशिरोमणि श्रीमद्भागवत और श्रीचैतन्य महाप्रभुने जिनको भागवतके यथार्थ व्याख्याकार कहकर घोषणा की है, उन श्रील श्रीधरस्वामीकी भावार्थदीपिकामें (10/86/3) “पूज्यतम-त्रिदण्ड-वेषम्”-सर्वत्र जिस स्थानपर त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण करनेकी विधि और महिमा व्यक्त हुई है, उस स्थानपर सर्वपण्डितकुल- चूड़ामणि श्रीसनातन गोस्वामीके इस प्रकार वाक्यके अर्थका अनुसरण करनेपर यह किसी शास्त्र अनभिज्ञ ‘मोटी-बुद्धि’का कार्य नहीं है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। श्रीबृहद्भागवतामृत (2/7/14)की दिग्दर्शनी-टीकामें श्रीसनातन गोस्वामीने कहा है, — “ये श्रीभगवच्चरणार- विन्दाश्रयास्ते यतय एव नोच्यन्ते, किन्तु परमभक्ता एव, सर्वपरित्यागेन तच्चरणारविन्दाश्रयणात्, केवलं गृहादिपरित्यागनिष्ठाधर्मेव सन्न्यासग्रहणात् वेशमात्रेण यतिसादृश्यं तेषाम्।” अर्थात् “जिन्होंने भगवान्के चरणकमलोंका आश्रय किया है, उनको (वेश-चिह्नके द्वारा) केवल ‘संन्यासी’ नहीं कहा जा सकता—सब कुछ परित्याग करके भगवान्के चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण करनेके कारण वे वास्तविक रूपमें भक्त ही हैं। केवल गृहादि-परित्यागमें निष्ठाके लिये ही संन्यास-ग्रहणके लिये वेशमात्रके द्वारा उनका (भक्तगणोंका) ‘संन्यास’-सादृश्य है।” श्रीचैतन्य महाप्रभुने भी यही कहा है,— ‘परात्मनिष्ठा-मात्र वेष-धारण। मुकुन्द-सेवाय हय संसार-तारण॥' (मध्यलीला 3/8)—संन्यास ग्रहणसे जो गेरुआ वेशादि धारण किया जाता है, वह केवल गृहत्यागादि-निष्ठा और परात्म- श्रीभगवान्के प्रति निष्ठाके लिये है। वेशधारण करनेसे ‘संसारसे उद्धार’ होता है, ऐसा नहीं है, वह केवल मुकुन्दसेवाके द्वारा ही होता है—यही गौड़ीयवैष्णव-सिद्धान्त है। इसलिये गैरिकवेश-धारण वैष्णवगणरे सङ्गत नहीं—इस प्रकारका विचार जो लोग करते हैं, वे तत्त्वदर्शी नहीं हैं, वे मात्सर्यसे कुपित होकर तत्त्वके विषयमें अन्धे हैं। “रक्तवस्त्र वैष्णवेर परिते ना युयाय”—इस सनातन-उक्तिको पहले उक्त प्रसङ्गके अनुसार ही समझना होगा। वैष्णव—कषाय-वस्त्रधारी ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और ‘मैं ही नारायण’, इस प्रकार माननेवाले एकदण्डी संन्यासीकी अपेक्षा सभी प्रकारसे श्रेष्ठ हैं। इसलिये उनके द्वारा कषायवस्त्र धारण करनेसे वैष्णवका उच्च आसन निम्न हो जाता है। दूसरा, रागमार्गीय परमहंस वैष्णव—कषाय-वस्त्र धारण करनेवाले वैधमार्गीय वर्णाश्रमके अन्तर्गत संन्यासीकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं, उस क्षेत्रमें उनका गैरिकवस्त्र धारणकी विधिके ऊपर होनेके कारण उनके लिये उक्त वस्त्र ‘परिते ना युयाय’ (धारण करना उचित नहीं है)। “ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः। सलिङ्गानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः॥” (भाः 11/18/28)—“जो बाहरी विषयोंसे विरक्त होकर मोक्षकी कामनासे ज्ञाननिष्ठ होते हैं अथवा मोक्ष विषयमें अपेक्षाशून्य होकर मेरे (श्रीकृष्णके) भक्त होते हैं, वे ‘सलिङ्ग-आश्रम’ अर्थात् संन्यासादि आश्रमके चिह्नस्वरूप गैरिकवस्त्र, त्रिदण्डादिका त्याग करके विधि-निषेधके अधीन ना होकर विचरण करेंगे।” यहाँपर इसको लक्ष्य करने योग्य यह है कि केवल वैष्णवके ही नहीं, ज्ञानीके भी उस प्रकार संन्यासोचित रक्तवस्त्र ‘परिते ना युयाय’। तब वे कौनसे अधिकारमें हैं?—इसका सदुत्तर उक्त श्लोककी श्रीविश्वनाथ-चक्रवर्त्तीपाद-कृत टीकामें स्पष्ट देखा जाता है, “परिपक्व-ज्ञानिनो निष्काम-स्वभक्तस्य च वर्णाश्रमनियमाभावमाह,—ज्ञाननिष्ठः परिपक्वज्ञानवान् ×× अत्र सर्वथा नैरपेक्षम्-जातप्रेम्णो भक्तस्य न सम्भवेदत उत्पन्नप्रेमैव भक्तः सलिङ्गानाश्रमांस्त्यजेत्, अनुत्पन्नप्रेमा तु निर्लिङ्गाश्रमधर्मांस्त्यजेदित्यर्थो लभ्यते।” अर्थात् “परिपक्व ज्ञानीके और निष्काम अपने भक्तोंके (श्रीकृष्णभक्तोंके)