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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2350

[ 13/42-50 तेरहवाँ अध्याय 333

तपनमिश्र और वैद्य चन्द्रशेखरके साथ साक्षात्कार और संलाप :- तपनमिश्र, चन्द्रशेखर, —दोंहारे मिलिला। ताँर ठाञि प्रभुर कथा सकल शुनिला ॥ 43 ॥

अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने सभी भक्तोंसे भी वृन्दावन जानेकी अनुमति ली और वनके पथसे चलते-चलते वाराणसी पहुँचे। वहाँ वे श्रीतपन मिश्र और श्रीचन्द्रशेखर वैद्यसे मिले तथा उन्होंने उन दोनोंसे महाप्रभुके द्वारा वाराणसीमें की गयी समस्त लीलाओंका श्रवण किया ॥ 42-43 ॥

मथुरामें श्रीसनातनके साथ मिलन और दोनोंका आनन्द :- मथुराते आसि' मिलिला सनातने। दुइजनेर सङ्गे दुँहे आनन्दित मने ॥ 44 ॥

अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित मथुरा पहुँचकर श्रीसनातन गोस्वामीसे मिले। परस्पर मिलनसे दोनोंका ही मन आनन्दित हो गया ॥ 44 ॥

श्रीसनातनके आनुगत्यमें श्रीजगदानन्दका द्वादशवन-दर्शन :- सनातन कराइला ताँरे द्वादशवन-दरशन। गोकुले रहिला दुँहे देखि' महावन ॥ 45 ॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीजगदानन्द पण्डितको द्वादश वनोंके दर्शन कराये। महावनके दर्शन करनेके पश्चात् दोनों गोकुलमें ही रह गये ॥ 45 ॥

दोनोंका एक ही साथमें रहना, किन्तु पृथक् अभ्यास होनेके कारण पृथक् खाद्य-ग्रहण :- सनातनेर गोफाते दुँहे रहे एकठाञि। पण्डित पाक करेन देवालये याइ' ॥ 46 ॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीकी गुफामें वे दोनों एक साथ रहने लगे। श्रीजगदानन्द पण्डित मन्दिरमें जाकर रसोई बनाते थे ॥ 46 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—सनातनने तब माधुकरी-भिक्षामें प्राप्त रोटियोंके टुकड़ोंको खाकर जीवन निर्वाह करनेका अभ्यास किया था। प्रतिदिन चावल नहीं खानेसे मेरी तृप्ति नहीं होगी, यह कहकर श्रीजगदानन्द पण्डित मन्दिरमें जाकर भोजन बनाते थे। व्रजके मन्दिरोंमें चावल-दालका प्रसाद नहीं मिलता था ॥ 46 ॥

सनातन भिक्षा करेन याइ' महावने। कभु देवालये, कभु ब्राह्मण-सदने ॥ 47 ॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी महावनमें जाकर भिक्षा करते थे, वे कभी किसी मन्दिर और कभी किसी ब्राह्मणके घरपर प्रसाद पाते थे ॥ 47 ॥

मानद श्रीसनातनके द्वारा श्रीजगदानन्दकी सेवा :- सनातन पण्डितेर करे समाधान। महावने देन आनि' मागि' अन्न-पान ॥ 48 ॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी श्रीजगदानन्द पण्डितकी समस्त आवश्यकताओंको पूर्ण कर देते थे। वे महावनसे श्रीजगदानन्द पण्डितके खाने-पीनेके लिये चावल-छाछ आदि भिक्षा करके ले आते थे ॥ 48 ॥

अनुभाष्य— 'समाधान', — सभी कार्योंका सम्पादन अथवा सेवा ॥ 48 ॥

एकदिन श्रीजगदानन्दके द्वारा श्रीसनातनको निमन्त्रण और रसोई बनाना :- एकदिन सनातने पण्डित निमन्त्रिला। नित्यकृत्य करि' तँह पाक चड़ाइला ॥ 49 ॥

अनुवाद—एकदिन श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीसनातन गोस्वामीको अपने साथ प्रसाद पानेका निमन्त्रण दिया। श्रीजगदानन्द पण्डित अपने नित्यकृत्य करके भोजन बनाने लगे ॥ 49 ॥

मस्तकपर संन्यासीके द्वारा दिये वस्त्रको पहनकर श्रीसनातनका श्रीजगदानन्दके घरमें आगमन :- 'मुकुन्द सरस्वती' नाम संन्यासी महाजने। एक बहिर्वासे तँहो दिल सनातने ॥ 50 ॥