भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2351

334 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/50-61 ] सनातन सेइ वस्त्र मस्तके बान्धिया। जगदानन्देर वासा-द्वारे बसिला आसिया॥ 51 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीको मुकुन्द सरस्वती नामक एक संन्यासी महाजनने अपना एक बहिर्वास दिया। श्रीसनातन गोस्वामी उस वस्त्रको सिरपर बाँधकर श्रीजगदानन्द पण्डितके द्वारपर आकर बैठ गये॥ 50-51 ॥ श्रीसनातनके वस्त्रको महाप्रभुके द्वारा दिया गया वस्त्र मानकर पण्डितका प्रेम :- रातुल वस्त्र देखि' पण्डित प्रेमाविष्ट हइला। 'महाप्रभुर प्रसाद' जानि' ताँहारे पुछिला॥ 52 ॥ श्रीसनातनकी वस्त्रप्राप्तिके कारणकी जिज्ञासा :- “काँहा पाइला तुमि एइ रातुल वसन?” “मुकुन्द-सरस्वती दिल”,—कहेन सनातन॥ 53 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीके सिरपर बँधे गेरुए वस्त्रको देखकर श्रीजगदानन्द पण्डित प्रेमाविष्ट हो गये और उन्होंने उस वस्त्रको महाप्रभुका प्रसादी-वस्त्र समझकर श्रीसनातन गोस्वामीसे पूछा,—“तुम्हें यह गेरुआ वस्त्र कहाँसे मिला?” श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मुझे यह वस्त्र मुकुन्द सरस्वतीने दिया है॥” 52-53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘रातुल’,—गेरुआ॥ 52 ॥ महाप्रभुके अतिरिक्त अन्य संन्यासियोंके दानको ग्रहण करनेसे श्रीजगदानन्दको क्रोध :- शुनि' पण्डितेर मने क्रोध उपजिल। भातेर हाण्डि हाते लञा मारिते आइल॥ 54 ॥ अनुवाद—यह सुनते ही श्रीजगदानन्द पण्डित बड़े क्रोधित हो गये और वे चावलकी हाण्डीको हाथमें लेकर श्रीसनातन गोस्वामीको मारनेके लिये आये॥ 54 ॥ श्रीसनातनको लज्जा :- सनातन ताँरे जानि' लज्जित हइला। बलिते लागिला पण्डित, हाण्डि चुलाते धरिला॥ 55 ॥ श्रीजगदानन्दके द्वारा श्रीसनातनकी भर्त्सना :- “तुमि महाप्रभुर हओ पार्षद-प्रधान। तोमा-सम महाप्रभुर प्रिय नाहि आन॥ 56 ॥ अन्य संन्यासीर वस्त्र तुमि धर शिरे। कोन् ऐछे हय,—इहा पारे सहिवारे??” 57 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके महाप्रभुके प्रति प्रेमको श्रीसनातन गोस्वामी भली-भाँति जानते थे, इसलिये वे अपने इस आचरणसे लज्जित हो गये। श्रीजगदानन्द पण्डित भी हाण्डीको चूल्हेपर रखकर श्रीसनातन गोस्वामीसे कहने लगे,—“तुम महाप्रभुके प्रधान पार्षद हो। महाप्रभुको तुम्हारे समान अन्य कोई प्रिय नहीं है। तुमने अन्य किसी संन्यासीके वस्त्रको अपने सिरपर धारण किया है, तो महाप्रभुके भक्तोंमें कौन ऐसा होगा जो तुम्हारे इस आचरणको सहन कर पायेगा?” 55-57 ॥ अनुभाष्य—‘जानि’’,—बतलाकर अथवा गौरप्रेममय जानकर॥ 55 ॥ अमानी मानद महाधीर श्रीसनातन-गोस्वामीका आत्मदैन्य और श्रीजगदानन्दकी गौरप्रेममें निष्ठाकी प्रशंसा :- सनातन कहे,—“साधु पण्डित-महाशय। तोमा-सम चैतन्येर प्रिय केह नय॥ 58 ॥ ऐछे चैतन्यनिष्ठा योग्य तोमाते। तुमि ना देखाइले इहा शिखिमु केमते?? 59 ॥ श्रीजगदानन्दके प्रेमकी परीक्षा और उसका प्रत्यक्ष दर्शन :- याहा देखिबारे वस्त्र मस्तके बान्धिलुँ। सेइ अपूर्व प्रेम एइ प्रत्यक्ष देखिलुँ॥ 60 ॥ रागमार्गीय परमहंसके लिये गेरुआ वस्त्र पहननेके विषयमें निषेध :- रक्तवस्त्र ‘वैष्णवेर’ परिते ना युयाय। कोन प्रवासीरे दिमु, कि काय उहाय??” 61 ॥