भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2352

[ 13/58–61 तेरहवाँ अध्याय 335 अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—‘हे श्रीजगदानन्द पण्डित महाशय, आपने जो हाण्डी उठा ली उसके लिये मैं आपको साधुवाद देता हूँ अर्थात् उसका अभिनन्दन करता हूँ। वास्तवमें आपके समान श्रीचैतन्य महाप्रभुको अन्य कोई प्रिय नहीं है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके प्रति आपकी ऐसी निष्ठा उपयुक्त ही है। यदि आप ऐसी निष्ठा नहीं दिखलायेंगे, तब फिर मैं कैसे सीखूँगा? मैंने जिसे देखनेके लिये इस गेरुए वस्त्रको मस्तकपर बाँधा था, मैंने उस अपूर्व प्रेमको प्रत्यक्ष देख लिया। वास्तवमें वैष्णवको गेरुआ वस्त्र पहनना शोभा नहीं देता। मैं यह वस्त्र किसी भ्रमणशील व्यक्तिको दे दूँगा, यह वस्त्र मेरे किस कामका है?”58–61 ॥ अनुभाष्य—वैष्णवगण—परमहंस और अकिञ्चन होते हैं। इसलिये वैधीभक्तिका पालन करनेवाले संन्यासियोंके द्वारा पहने जानेवाले गेरुए वस्त्रोंको पहनकर उन्हें (वैष्णवोंको) अपने परमहंस आश्रमका निर्देश अथवा प्रदर्शन नहीं करना पड़ता। विशेषतः अद्वितीय परमेश्वर श्रीगौरहरिके द्वारा एकदण्डीके वेशको स्वीकार करनेके कारण, उनके चरणाश्रित किङ्कर उनके दासाभिमानके कारण अप्राकृत चिद्विलास-भेद बुद्धिसे वेशग्रहणके विषयमें उनके जैसे व्यवहारको करनेके योग्य अथवा वैसे करनेकी विधि है, ऐसा नहीं मानते। संन्यास ग्रहण करके परमहंस वैष्णव-गुरूके आश्रयमें रहकर वैष्णवदासगण स्वयंको वर्णाश्रमातीत परमहंस-वैष्णवके आसनपर अधिष्ठित होनेके अयोग्य समझकर बहुत बार दैन्यज्ञापित करनेके उद्देश्यसे गुरु-वैष्णवोंके लिये अनुचित तुर्याश्रमोचित गेरुए वस्त्रोंको पहनते भी हैं॥ 61 ॥ अमृतानुकणा—श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा मस्तकपर बाँधा हुआ गेरूआ-वस्त्र श्रीमुकुन्द सरस्वती नामक किसी एकदण्डी संन्यासीके द्वारा दिया गया है, यह जानकर श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीसनातनकी जो भर्त्सना की थी और उसके बाद श्रीसनातन गोस्वामीने उसके उत्तरमें जो “रक्तवस्त्र वैष्णवेर परिते ना युयाय” कहा था, इससे कोई कोई वैष्णवसे शास्त्र अध्ययन ना करके विवर्त्तग्रस्त होकर विचार करते हैं कि ‘गेरूए वस्त्रका व्यवहार वैष्णवके लिये उचित नहीं है।’ ‘रातुल-वस्त्र’ या ‘रक्त-वस्त्र’ कहनेसे मुख्यतः कषाय वस्त्र या गैरिक-वस्त्र ही उद्दिष्ट होता है, इसमें सन्देह नहीं है। श्रीजगदानन्द-पण्डितकी कभी भी ‘गेरूए वस्त्र’के प्रति उदासीनता नहीं थी, जिसके कारण उन्होंने गेरूए वस्त्रको देखकर क्षुब्ध होकर श्रीसनातन गोस्वामीकी भर्त्सना की थी। उन्होंने स्वयं महाप्रभुके लिये गद्दे और तकियेको प्रस्तुत करके कपड़ेको गेरूए रङ्गमें रङ्गा था,—“सूक्ष्म वस्त्र आनि' गेरि दिया राङ्गाइला। शिमुलीर तुला दिया ताहा पूराइला॥” (अन्त्यलीला 13/7)। श्रीसनातन गोस्वामीके मस्तकके ऊपर धारण किये गेरूए-वस्त्रको देखकर पहले उसे महाप्रभुका प्रसादी वस्त्र जानकर प्रेमाविष्ट हुए थे,—“रातुल वस्त्र देखि' पण्डित प्रेमाविष्ट हइला।” किन्तु जिनकी वे महाप्रभुके प्रधान पार्षदगणोंमें गणना करते थे, (“तुमि महाप्रभुर हओ पार्षद-प्रधान। तोमा-सम महाप्रभुर प्रिय नाहि आन॥”) उन श्रीसनातनप्रभुका मस्तक एकमात्र महाप्रभुके उच्छिष्ट वस्त्रके ही द्वारा भूषित होने योग्य है,—उस स्थानपर किसी एकदण्डी संन्यासीके वस्त्रको धारण करनेसे महाप्रभुके ‘निज-धन’–रूप श्रीसनातनके द्वारा अवज्ञा ही हुई है और वह श्रीजगदानन्दके लिये अत्यन्त असहनीय होनेके कारण उन्होंने श्रीसनातनकी इस प्रकारसे प्रणय भर्त्सना की थी। इसके द्वारा उनका गेरूए-वस्त्रके प्रति विरोध किस प्रकार प्रकाशित होता है? वास्तवमें इसके द्वारा श्रीजगदानन्दका श्रीमहाप्रभु और उनके प्रधान सेवक श्रीसनातन—इन दोनोंके प्रति ही अतिशय प्रणय प्रकाशित हुआ है। “रक्तवस्त्र वैष्णवेर परिते ना युयाय”—इस वाक्यसे गेरूए-वस्त्र और संन्यासवेश-धारण अर्थात् पक्षान्तरमें संन्यास ग्रहण वैष्णवोंका कभी भी कर्तव्य नहीं है, यही यदि श्रीसनातन गोस्वामीका अभिप्राय हो, तब उसके