भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2353

अनुसार श्रीचैतन्य महाप्रभु और उनके संन्यासी सङ्गिगणोंका संन्यासवेशका भी अवैधरूपमें विचार किया जायेगा। धर्मकी संस्थापनाके लिये अवतीर्ण 'स्वयं भगवान्'का संन्यास ग्रहण करना और उसके योग्य वेश धारण करना अवैध है! इस प्रकारका अशास्त्रीय विचार समस्त शास्त्रोंको जाननेवाले श्रीसनातन गोस्वामीके लिये कभी भी सम्भव नहीं है। समस्त वेद, उपनिषत्, पुराण, संहिता, यहाँ तक कि सर्वशास्त्रशिरोमणि श्रीमद्भागवत और श्रीचैतन्य महाप्रभुने जिनको भागवतके यथार्थ व्याख्याकार कहकर घोषणा की है, उन श्रील श्रीधरस्वामीकी भावार्थदीपिकामें (10/86/3) “पूज्यतम-त्रिदण्ड-वेषम्”-सर्वत्र जिस स्थानपर त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण करनेकी विधि और महिमा व्यक्त हुई है, उस स्थानपर सर्वपण्डितकुल- चूड़ामणि श्रीसनातन गोस्वामीके इस प्रकार वाक्यके अर्थका अनुसरण करनेपर यह किसी शास्त्र अनभिज्ञ ‘मोटी-बुद्धि’का कार्य नहीं है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। श्रीबृहद्भागवतामृत (2/7/14)की दिग्दर्शनी-टीकामें श्रीसनातन गोस्वामीने कहा है, — “ये श्रीभगवच्चरणार- विन्दाश्रयास्ते यतय एव नोच्यन्ते, किन्तु परमभक्ता एव, सर्वपरित्यागेन तच्चरणारविन्दाश्रयणात्, केवलं गृहादिपरित्यागनिष्ठाधर्मेव सन्न्यासग्रहणात् वेशमात्रेण यतिसादृश्यं तेषाम्।” अर्थात् “जिन्होंने भगवान्के चरणकमलोंका आश्रय किया है, उनको (वेश-चिह्नके द्वारा) केवल ‘संन्यासी’ नहीं कहा जा सकता—सब कुछ परित्याग करके भगवान्के चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण करनेके कारण वे वास्तविक रूपमें भक्त ही हैं। केवल गृहादि-परित्यागमें निष्ठाके लिये ही संन्यास-ग्रहणके लिये वेशमात्रके द्वारा उनका (भक्तगणोंका) ‘संन्यास’-सादृश्य है।” श्रीचैतन्य महाप्रभुने भी यही कहा है,— ‘परात्मनिष्ठा-मात्र वेष-धारण। मुकुन्द-सेवाय हय संसार-तारण॥' (मध्यलीला 3/8)—संन्यास ग्रहणसे जो गेरुआ वेशादि धारण किया जाता है, वह केवल गृहत्यागादि-निष्ठा और परात्म- श्रीभगवान्के प्रति निष्ठाके लिये है। वेशधारण करनेसे ‘संसारसे उद्धार’ होता है, ऐसा नहीं है, वह केवल मुकुन्दसेवाके द्वारा ही होता है—यही गौड़ीयवैष्णव-सिद्धान्त है। इसलिये गैरिकवेश-धारण वैष्णवगणरे सङ्गत नहीं—इस प्रकारका विचार जो लोग करते हैं, वे तत्त्वदर्शी नहीं हैं, वे मात्सर्यसे कुपित होकर तत्त्वके विषयमें अन्धे हैं। “रक्तवस्त्र वैष्णवेर परिते ना युयाय”—इस सनातन-उक्तिको पहले उक्त प्रसङ्गके अनुसार ही समझना होगा। वैष्णव—कषाय-वस्त्रधारी ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और ‘मैं ही नारायण’, इस प्रकार माननेवाले एकदण्डी संन्यासीकी अपेक्षा सभी प्रकारसे श्रेष्ठ हैं। इसलिये उनके द्वारा कषायवस्त्र धारण करनेसे वैष्णवका उच्च आसन निम्न हो जाता है। दूसरा, रागमार्गीय परमहंस वैष्णव—कषाय-वस्त्र धारण करनेवाले वैधमार्गीय वर्णाश्रमके अन्तर्गत संन्यासीकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं, उस क्षेत्रमें उनका गैरिकवस्त्र धारणकी विधिके ऊपर होनेके कारण उनके लिये उक्त वस्त्र ‘परिते ना युयाय’ (धारण करना उचित नहीं है)। “ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः। सलिङ्गानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः॥” (भाः 11/18/28)—“जो बाहरी विषयोंसे विरक्त होकर मोक्षकी कामनासे ज्ञाननिष्ठ होते हैं अथवा मोक्ष विषयमें अपेक्षाशून्य होकर मेरे (श्रीकृष्णके) भक्त होते हैं, वे ‘सलिङ्ग-आश्रम’ अर्थात् संन्यासादि आश्रमके चिह्नस्वरूप गैरिकवस्त्र, त्रिदण्डादिका त्याग करके विधि-निषेधके अधीन ना होकर विचरण करेंगे।” यहाँपर इसको लक्ष्य करने योग्य यह है कि केवल वैष्णवके ही नहीं, ज्ञानीके भी उस प्रकार संन्यासोचित रक्तवस्त्र ‘परिते ना युयाय’। तब वे कौनसे अधिकारमें हैं?—इसका सदुत्तर उक्त श्लोककी श्रीविश्वनाथ-चक्रवर्त्तीपाद-कृत टीकामें स्पष्ट देखा जाता है, “परिपक्व-ज्ञानिनो निष्काम-स्वभक्तस्य च वर्णाश्रमनियमाभावमाह,—ज्ञाननिष्ठः परिपक्वज्ञानवान् ×× अत्र सर्वथा नैरपेक्षम्-जातप्रेम्णो भक्तस्य न सम्भवेदत उत्पन्नप्रेमैव भक्तः सलिङ्गानाश्रमांस्त्यजेत्, अनुत्पन्नप्रेमा तु निर्लिङ्गाश्रमधर्मांस्त्यजेदित्यर्थो लभ्यते।” अर्थात् “परिपक्व ज्ञानीके और निष्काम अपने भक्तोंके (श्रीकृष्णभक्तोंके)