श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2354, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 13/61 ] तेरहवाँ अध्याय 337
वर्णाश्रम-नियमका कोई प्रयोजन नहीं है, यही यहाँपर बतलाया गया है। ज्ञाननिष्ठ-जो परिपक्व-ज्ञानवान् हैं। सभी विषयोंमें निरपेक्षता अजातप्रेम-भक्तोंमें सम्भव नहीं है, इसलिये उत्पन्नप्रेम-भक्त ही केवल चिह्नसमूहके साथ 'आश्रम' त्याग करेंगे, (इसके द्वारा) अजातप्रेम-भक्त किन्तु 'निर्लिङ्ग-आश्रमधर्म' त्याग करेंगे—यही अर्थ प्राप्त हुआ है।”
इसलिये देखा जा रहा है, जो ज्ञानमार्गके अवलम्बी होकर (गीता 18/54) 'ब्रह्मभूत प्रसन्नात्मा' हुए हैं और जो आत्मधर्मके उचित शुद्धभक्तिके योगसे प्रेमावस्थाको प्राप्त किये हैं, वैसे पारमहंस्य-धर्ममें आरूढ़ व्यक्तिके लिये मात्र गैरिकवस्त्र-दण्डादि चिह्नोंके साथ संन्यासादि आश्रम परित्यागकी बात कही गई है, सर्व अधिकार-निर्विरशेषमें नहीं। अजातप्रेम-भक्त 'निर्लिङ्ग-आश्रमधर्म' अर्थात् पारमहंस्य-आश्रम, जिस आश्रमका निर्दिष्ट कोई चिह्न नहीं है, उसको त्याग करके अपने अधिकारके अनुसार वर्णाश्रम-नियमानुसार आश्रमोचित चिह्न आदि ग्रहण करेंगे—इस इङ्गितसे भी जो उक्त श्लोकसे एक साथ प्रदत्त हुआ है, वह रसिकभक्त-शेखर श्रीचक्रवर्तीपादने उनकी टीकामें अँगूलीके निर्देशके द्वारा दिखला दिया है।
वास्तवमें रागमार्गीय परमहंस-वैष्णवोंकी मर्यादा मार्गके उचित कषाय वस्त्र पहनने या उसका वर्जन करनेकी बाधकता नहीं है-वे गुणोंसे अतीत है। (गीता 14/22)— “न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति।” इसलिये देखा जाता है,—भक्तिकल्पवृक्षके अङ्कुर स्वरूप श्रीमाधवेन्द्रपुरीपाद और उनके शिष्य श्रीईश्वरपुरी एवं उक्त वृक्षके नौ मूलस्वरूप (आदिलीला 9/10-16 संख्या)—श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीकेशवभारती, श्रीब्रह्मानन्दपुरी, श्रीब्रह्मानन्द भारती, श्रीविष्णुपूरी, श्रीकेशवपुरी, श्रीकृष्णानन्द पुरी, श्रीनृसिंहतीर्थ तथा श्रीसुखानन्दपुरी आदि कृष्णप्रेमसिन्धुमें नित्य निमग्न भगवत्-पार्षदगण—उन्होंने बाहरी दृष्टिसे 'रक्तवस्त्र' परित्यागका कोई भी दृष्टान्त स्थापित नहीं किया। इसलिये कषाय-वस्त्रादिके द्वारा सभी स्थानोंपर ही 'अजातप्रेमत्व' या वर्णाश्रमके अधीन होना सूचित नहीं होता है, यही लक्ष्य करने योग्य है। विशेषतः रक्तवस्त्रके माध्यमसे एक ओर जिस प्रकार वे दैन्यवशतः अपने आपको लोगोंके समक्ष वर्णाश्रमके अन्तर्गत रूपमें चिह्नित करवाकर अपने हृदयमें स्थित सहज अनुरागको गोपन रखनेमें प्रयास करते हैं, दूसरी ओर उक्त रक्तवस्त्र उनके लिये एक विशेष उद्दीपन स्वरूप होकर परम भजनके अनुकूल विचारसे उसका अपरित्यज्य होना कुछ भी असम्भव नहीं है। “कनकनिवह-शोभानिन्दि-पीतं नितम्बे, तदुपरि नव-रक्तवस्त्र-मित्थं दधानः। प्रियमिव किल वर्णं रागयुक्तं प्रियायां, प्रणयतु मम नेत्राभीष्टपूर्ति मुकुन्दः॥” (श्रीरूपगोस्वामि-कृत 'श्रीमुकुन्दाष्टकम्')—'जो नितम्बदेशपर स्वर्णकान्तिको भी निन्दित करनेवाले पीतवस्त्र और उसके ऊपर 'रक्तवस्त्र' इस प्रकारसे धारण किये हैं, जिसके द्वारा प्रियतमा श्रीराधाके प्रिय रागयुक्त वर्णका निश्चय ही बोध होता है, वे मुकन्द मेरे नेत्रोंके अभीष्टको पूर्ण करें।” इसलिये विद्वद्-रूढ़ि विचारसे 'रक्तवस्त्र'में जो महिमा ग्रथित होती है, वह केवल भजन-चतुर व्यक्तियोंको ही अनुभव हो सकती है। और जिस कारणसे श्रीगौरसुन्दरके सेवकवर्गने कषाय-वस्त्रधारी एकदण्डीके वेशमें अवस्थित भगवान्के जैसे वेशग्रहण-प्रथाका आदर ना करके दीनजनोचित पुराने मैले वस्त्रादि ग्रहण किये थे, उसी शुद्धविचारका अवलम्बन करके श्रीगोपाल-भट्टादि रूपानुगगणोंने स्वाभाविक दैन्यवशतः श्रीरूपादि गुरुदेवके जैसा परमहंस-वेश ग्रहण ना करके भागवत-विधिके अनुसार एकान्त श्रीगौरसेवक श्रीप्रबोधानन्द त्रिदण्डिपादके आनुगत्य-प्रभावसे कषाय वस्त्र और शिखासूत्र धारणादि किया था। श्रीगोपालभट्ट बचपनसे ही बृहद्-व्रती (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) थे, इसलिये कषाय-वस्त्र परित्याग करके उनको वापस नहीं लौटना है। उस समयमें गौड़ीय समाजमें उक्त श्रीचैतन्यशिक्षाका आदर चलता आ रहा था। अनेक लोग (अपनी स्थूलबुद्धिके द्वारा प्रमाण करके) कहते हैं कि श्रीचैतन्य महाप्रभु स्वयं कषाय