भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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338 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/61-66 ]

वस्त्रधारी होनेपर भी उन्होंने किसीको भी उक्त वस्त्र विधानमें ही व्रती हैं॥61॥ धारण करनेका उपदेश नहीं दिया। महाप्रभु “आपनि महाप्रभुको भोग समर्पण और दोनोंके द्वारा आचरि' भक्ति शिखामु सबारे। आपने ना कैले धर्म एक साथ बैठकर प्रसादका सम्मान :- शिखान ना याय। एइ त' सिद्धान्त गीता-भागवते पाक करि' जगदानन्द चैतन्ये समर्पिला। गाय॥” (आदिलीला 3/20-21)के इस विचारका अवलम्बन दुइजन बसि' तबे प्रसाद पाइला॥62॥ करके भक्तभावको अङ्गीकार करके अवतीर्ण हुए हैं। महाप्रभुके विरहमें दोनोंका क्रन्दन :- उन्होंने “मर्यादा-पालन हय साधुर भूषण”, “मर्यादा प्रसाद पाइ दुइजने कैला आलिङ्गन। राखिले तुष्ट हय मोर मन”, “मर्यादा लङ्घन आमि ना चैतन्यविरहे दुँहे करिला क्रन्दन॥63॥ पाँरो सहिते” (अन्त्यलीला चौथा अध्याय) आदि रूपमें श्रीसनातनप्रभुके माध्यमसे साधकभक्तोंको मर्यादा-मार्गके अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने भोजन बनानेके अवलम्बनका उपदेश किया है। इस प्रकारसे उनके पश्चात् श्रीचैतन्य महाप्रभुको भोग निवेदन किया और साक्षात् आचरण और वाणीसे यदि कोई उस प्रकारकी फिर श्रीजगदानन्द पण्डित एवं श्रीसनातन गोस्वामीने शिक्षा प्राप्त ना करे, तब उसे दुर्भागा ही कहा जायेगा। बैठकर प्रसाद पाया। प्रसाद पानेके बाद दोनोंने परस्पर साधकगणों और सिद्धगणोंका कषाय वस्त्र-धारणका आलिङ्गन किया और दोनों श्रीचैतन्य महाप्रभुके विरहमें इतिहास सत्ययुगसे ही दिखलायी देता है। बड़े-बड़े क्रन्दन करने लगे॥62-63॥ त्रिकालदर्शी महानुभाव ऋषि-महर्षिगण उक्त वस्त्रको दोनोंको श्रीगौर-विरहकी अनुभूति :- धारण करते थे। श्रीकृष्णलीलामें भगवती पौर्णमासी देवी एइमत मास दुइ रहिला वृन्दावने। सदा ही कषाय वस्त्र धारण करती थीं—'पौर्णमासीभगवती चैतन्यविरह-दुःख ना याय सहने॥64॥ सर्वसिद्धि-विधायनी। काषाय-वसना गौरी काशकेशीदरायता॥” (श्रीराधाकृष्णगणोद्देश-दीपिका) आदि। कलियुगमें भी अनुवाद—इस प्रकार श्रीजगदानन्द पण्डित दो मास श्रीरामानुजाचार्य, श्रीमध्वाचार्य, श्रीविष्णुस्वामी, श्रील श्रीधरस्वामी, तक वृन्दावनमें रहे। उनसे श्रीचैतन्य महाप्रभुसे विरहका श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी, श्रीईश्वरपुरी, स्वयंभगवान् श्रीचैतन्य दुःख सहन नहीं हो रहा था॥64॥ महाप्रभु, श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती, श्रीवल्लभाचार्य आदि महाप्रभुके भावी आगमनका संवाद बतलाना, साम्प्रदायिक-वैष्णवगणोंने संन्यास ग्रहण करके कषायवस्त्र- उसके लिये स्थानका निर्वाचन करनेकी आज्ञा :- धारणकी शाश्वत धाराको निरन्तर प्रवाहित रखा है। महाप्रभुर सन्देश कहिला सनातने। इसलिये वह धारा [श्रीरूप-सनातनादिके] परमहंस-आचरणकी 'आमिह आसितेछि, रहिते करिह एकस्थाने॥'65॥ अनुकरण प्रवृत्तियुक्त और अनुरागके आवरणमें कुछ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीसनातन गोस्वामीको वेदविरोधी अपसम्प्रदायके उपद्रवसे लुप्त नहीं हो सकती। रागानुगा-अभिमानी होकर जो वास्तवमें बाहर महाप्रभुका सन्देश बतलाया,—'मैं वृन्दावन आ रहा हूँ, और भीतरमें श्रीरूपानुग नहीं हो पाते और बाहरी मेरे रहनेके लिये एक स्थानकी व्यवस्था कर देना॥'65॥ वेशसे ही मात्र रूपानुगत्यको प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, श्रीजगदानन्दके द्वारा विदायी ग्रहण और महाप्रभुके लिये उनकी उस प्रकारकी चेष्टाकी शुद्ध वैष्णवगण सभी श्रीसनातनके द्वारा दिये गये द्रव्योंको लेना :- प्रकारसे निन्दा करके शास्त्रसम्मत विचारोंके अनुसारसे जगदानन्द-पण्डित तबे आज्ञा मागिला। मर्यादाके संरक्षणके द्वारा श्रीचैतन्य महाप्रभुकी सन्तुष्टिके सनातन प्रभुरे किछु भेटवस्तु दिला॥66॥