भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2356

[ 13/66-75 तेरहवाँ अध्याय 339 रासस्थलीर बालु, आर गोवर्धनेर शिला। शुष्क पक्व पीलुफल आर गुञ्जामाला ॥ 67 ॥ श्रीजगदानन्दकी पुरी-यात्रा; श्रीजगदानन्दको श्रीसनातनके द्वारा कष्टपूर्वक विदायी देना :- जगदानन्द-पण्डित चलिला सब लञा। व्याकुल हैला सनातन ताँरे विदाय दिया ॥ 68 ॥ अनुवाद-तब श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीसनातन गोस्वामीसे श्रीजगन्नाथ पुरी लौट जानेके लिये अनुमति माँगी। श्रीसनातन गोस्वामीने उन्हें अनुमति प्रदान करके महाप्रभुको भेंट देनेके लिये रासस्थलीकी बालू, गोवर्धनकी शिला, सूखे हुए पके पीलूके फल और गुञ्जामाला दी। श्रीजगदानन्द पण्डित उन भेंटकी वस्तुओंको लेकर चलने लगे तो श्रीसनातन गोस्वामीने व्याकुल होकर उन्हें विदायी दी॥ 66-68 ॥ महाप्रभुके रहनेके लिये द्वादशादित्य-टीलामें मठका चयन और संस्कार-करवाना :- प्रभुर निमित्त एकस्थान मने विचारिला। द्वादशादित्य-टिलाय एक 'मठ' पाइला ॥ 69 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने मनमें विचार करके द्वादश-आदित्य-टीलापर बने एक देवालयको महाप्रभुके रहने योग्य स्थानके रूपमें स्थिर किया॥ 69 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'द्वादशादित्य-टिला',- श्रीमदनमोहनका पुरातन टूटा हुआ मन्दिर, जो ऊँचे टीलेके ऊपर स्थित है, उसीको ही 'द्वादशादित्य-टीला' कहते हैं। कृष्णलीलाके समय उसी स्थानपर द्वादश-आदित्य (सूर्य अपनी बारह कलाओंके साथ) उदित हुए थे॥ 69 ॥ अनुभाष्य- 'मठ',-देवालय (मन्दिर) ॥ 69 ॥ सेइ स्थान राखिला गोसाञि संस्कार करिया। मठेर आगे राखिला एक चालि बान्धिया ॥ 70 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने उस स्थानका पुनः उद्धार करके उसे साफ रखा और उस मठके सामने एक छोटी कुटिया भी बना दी॥ 70 ॥ श्रीजगदानन्दका पुरी जाना और भक्तों सहित महाप्रभुके साथ साक्षात्कार :- शीघ्र चलि' नीलाचले गेला जगदानन्द। भक्तसह गोसाञि हैला परम आनन्द ॥ 71 ॥ अनुवाद-उधर श्रीजगदानन्द पण्डितके शीघ्रतासे चलते हुए श्रीजगन्नाथ पुरी पहुँचनेपर महाप्रभु और उनके भक्तोंको परम आनन्दकी प्राप्ति हुई॥ 71 ॥ प्रभुर चरण वन्दि' सबारे मिलिला। महाप्रभु ताँरे दृढ़ आलिङ्गन कैला ॥ 72 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना करके सभी भक्तोंसे मिले। तब महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितको गाढ़ आलिङ्गन किया॥ 72 ॥ महाप्रभुको श्रीसनातनकी ओरसे दण्डवत् ज्ञापन और उनके द्वारा प्रदान की गयी वस्तुएँ देना :- सनातनरे नामे पण्डित दण्डवत् कैला। रासस्थलीर धूलि आदि सब भेट दिला ॥ 73 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितने महाप्रभुको श्रीसनातन गोस्वामीकी ओरसे दण्डवत् प्रणाम किया और उनके द्वारा भेजी गयी रासस्थलीकी रज आदि भेंटको दिया ॥ 73 ॥ भक्तोंके द्वारा पीलूफलको खानेकी लीला :- सब द्रव्य राखिलेन, पीलु दिलेन बाँटिया। 'वृन्दावनेर फल' बलि' खाइला हृष्ट हञा ॥ 74 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने अन्य सब वस्तुएँ अपने पास रखकर पीलूफलोंको भक्तोंमें बाँट दिया। सभी उस फलको 'वृन्दावनका फल' कहकर प्रसन्नतापूर्वक खाने लगे॥ 74 ॥ ये केह जाने, आँटि चुषिते लागिल। ये ना जाने गौड़ीया, पीलु चाबाञा खाइल ॥ 75 ॥