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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 13/58–61 तेरहवाँ अध्याय 335 अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—‘हे श्रीजगदानन्द पण्डित महाशय, आपने जो हाण्डी उठा ली उसके लिये मैं आपको साधुवाद देता हूँ अर्थात् उसका अभिनन्दन करता हूँ। वास्तवमें आपके समान श्रीचैतन्य महाप्रभुको अन्य कोई प्रिय नहीं है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके प्रति आपकी ऐसी निष्ठा उपयुक्त ही है। यदि आप ऐसी निष्ठा नहीं दिखलायेंगे, तब फिर मैं कैसे सीखूँगा? मैंने जिसे देखनेके लिये इस गेरुए वस्त्रको मस्तकपर बाँधा था, मैंने उस अपूर्व प्रेमको प्रत्यक्ष देख लिया। वास्तवमें वैष्णवको गेरुआ वस्त्र पहनना शोभा नहीं देता। मैं यह वस्त्र किसी भ्रमणशील व्यक्तिको दे दूँगा, यह वस्त्र मेरे किस कामका है?”58–61 ॥ अनुभाष्य—वैष्णवगण—परमहंस और अकिञ्चन होते हैं। इसलिये वैधीभक्तिका पालन करनेवाले संन्यासियोंके द्वारा पहने जानेवाले गेरुए वस्त्रोंको पहनकर उन्हें (वैष्णवोंको) अपने परमहंस आश्रमका निर्देश अथवा प्रदर्शन नहीं करना पड़ता। विशेषतः अद्वितीय परमेश्वर श्रीगौरहरिके द्वारा एकदण्डीके वेशको स्वीकार करनेके कारण, उनके चरणाश्रित किङ्कर उनके दासाभिमानके कारण अप्राकृत चिद्विलास-भेद बुद्धिसे वेशग्रहणके विषयमें उनके जैसे व्यवहारको करनेके योग्य अथवा वैसे करनेकी विधि है, ऐसा नहीं मानते। संन्यास ग्रहण करके परमहंस वैष्णव-गुरूके आश्रयमें रहकर वैष्णवदासगण स्वयंको वर्णाश्रमातीत परमहंस-वैष्णवके आसनपर अधिष्ठित होनेके अयोग्य समझकर बहुत बार दैन्यज्ञापित करनेके उद्देश्यसे गुरु-वैष्णवोंके लिये अनुचित तुर्याश्रमोचित गेरुए वस्त्रोंको पहनते भी हैं॥ 61 ॥ अमृतानुकणा—श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा मस्तकपर बाँधा हुआ गेरूआ-वस्त्र श्रीमुकुन्द सरस्वती नामक किसी एकदण्डी संन्यासीके द्वारा दिया गया है, यह जानकर श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीसनातनकी जो भर्त्सना की थी और उसके बाद श्रीसनातन गोस्वामीने उसके उत्तरमें जो “रक्तवस्त्र वैष्णवेर परिते ना युयाय” कहा था, इससे कोई कोई वैष्णवसे शास्त्र अध्ययन ना करके विवर्त्तग्रस्त होकर विचार करते हैं कि ‘गेरूए वस्त्रका व्यवहार वैष्णवके लिये उचित नहीं है।’ ‘रातुल-वस्त्र’ या ‘रक्त-वस्त्र’ कहनेसे मुख्यतः कषाय वस्त्र या गैरिक-वस्त्र ही उद्दिष्ट होता है, इसमें सन्देह नहीं है। श्रीजगदानन्द-पण्डितकी कभी भी ‘गेरूए वस्त्र’के प्रति उदासीनता नहीं थी, जिसके कारण उन्होंने गेरूए वस्त्रको देखकर क्षुब्ध होकर श्रीसनातन गोस्वामीकी भर्त्सना की थी। उन्होंने स्वयं महाप्रभुके लिये गद्दे और तकियेको प्रस्तुत करके कपड़ेको गेरूए रङ्गमें रङ्गा था,—“सूक्ष्म वस्त्र आनि' गेरि दिया राङ्गाइला। शिमुलीर तुला दिया ताहा पूराइला॥” (अन्त्यलीला 13/7)। श्रीसनातन गोस्वामीके मस्तकके ऊपर धारण किये गेरूए-वस्त्रको देखकर पहले उसे महाप्रभुका प्रसादी वस्त्र जानकर प्रेमाविष्ट हुए थे,—“रातुल वस्त्र देखि' पण्डित प्रेमाविष्ट हइला।” किन्तु जिनकी वे महाप्रभुके प्रधान पार्षदगणोंमें गणना करते थे, (“तुमि महाप्रभुर हओ पार्षद-प्रधान। तोमा-सम महाप्रभुर प्रिय नाहि आन॥”) उन श्रीसनातनप्रभुका मस्तक एकमात्र महाप्रभुके उच्छिष्ट वस्त्रके ही द्वारा भूषित होने योग्य है,—उस स्थानपर किसी एकदण्डी संन्यासीके वस्त्रको धारण करनेसे महाप्रभुके ‘निज-धन’–रूप श्रीसनातनके द्वारा अवज्ञा ही हुई है और वह श्रीजगदानन्दके लिये अत्यन्त असहनीय होनेके कारण उन्होंने श्रीसनातनकी इस प्रकारसे प्रणय भर्त्सना की थी। इसके द्वारा उनका गेरूए-वस्त्रके प्रति विरोध किस प्रकार प्रकाशित होता है? वास्तवमें इसके द्वारा श्रीजगदानन्दका श्रीमहाप्रभु और उनके प्रधान सेवक श्रीसनातन—इन दोनोंके प्रति ही अतिशय प्रणय प्रकाशित हुआ है। “रक्तवस्त्र वैष्णवेर परिते ना युयाय”—इस वाक्यसे गेरूए-वस्त्र और संन्यासवेश-धारण अर्थात् पक्षान्तरमें संन्यास ग्रहण वैष्णवोंका कभी भी कर्तव्य नहीं है, यही यदि श्रीसनातन गोस्वामीका अभिप्राय हो, तब उसके

अनुसार श्रीचैतन्य महाप्रभु और उनके संन्यासी सङ्गिगणोंका संन्यासवेशका भी अवैधरूपमें विचार किया जायेगा। धर्मकी संस्थापनाके लिये अवतीर्ण 'स्वयं भगवान्'का संन्यास ग्रहण करना और उसके योग्य वेश धारण करना अवैध है! इस प्रकारका अशास्त्रीय विचार समस्त शास्त्रोंको जाननेवाले श्रीसनातन गोस्वामीके लिये कभी भी सम्भव नहीं है। समस्त वेद, उपनिषत्, पुराण, संहिता, यहाँ तक कि सर्वशास्त्रशिरोमणि श्रीमद्भागवत और श्रीचैतन्य महाप्रभुने जिनको भागवतके यथार्थ व्याख्याकार कहकर घोषणा की है, उन श्रील श्रीधरस्वामीकी भावार्थदीपिकामें (10/86/3) “पूज्यतम-त्रिदण्ड-वेषम्”-सर्वत्र जिस स्थानपर त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण करनेकी विधि और महिमा व्यक्त हुई है, उस स्थानपर सर्वपण्डितकुल- चूड़ामणि श्रीसनातन गोस्वामीके इस प्रकार वाक्यके अर्थका अनुसरण करनेपर यह किसी शास्त्र अनभिज्ञ ‘मोटी-बुद्धि’का कार्य नहीं है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। श्रीबृहद्भागवतामृत (2/7/14)की दिग्दर्शनी-टीकामें श्रीसनातन गोस्वामीने कहा है, — “ये श्रीभगवच्चरणार- विन्दाश्रयास्ते यतय एव नोच्यन्ते, किन्तु परमभक्ता एव, सर्वपरित्यागेन तच्चरणारविन्दाश्रयणात्, केवलं गृहादिपरित्यागनिष्ठाधर्मेव सन्न्यासग्रहणात् वेशमात्रेण यतिसादृश्यं तेषाम्।” अर्थात् “जिन्होंने भगवान्के चरणकमलोंका आश्रय किया है, उनको (वेश-चिह्नके द्वारा) केवल ‘संन्यासी’ नहीं कहा जा सकता—सब कुछ परित्याग करके भगवान्के चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण करनेके कारण वे वास्तविक रूपमें भक्त ही हैं। केवल गृहादि-परित्यागमें निष्ठाके लिये ही संन्यास-ग्रहणके लिये वेशमात्रके द्वारा उनका (भक्तगणोंका) ‘संन्यास’-सादृश्य है।” श्रीचैतन्य महाप्रभुने भी यही कहा है,— ‘परात्मनिष्ठा-मात्र वेष-धारण। मुकुन्द-सेवाय हय संसार-तारण॥' (मध्यलीला 3/8)—संन्यास ग्रहणसे जो गेरुआ वेशादि धारण किया जाता है, वह केवल गृहत्यागादि-निष्ठा और परात्म- श्रीभगवान्के प्रति निष्ठाके लिये है। वेशधारण करनेसे ‘संसारसे उद्धार’ होता है, ऐसा नहीं है, वह केवल मुकुन्दसेवाके द्वारा ही होता है—यही गौड़ीयवैष्णव-सिद्धान्त है। इसलिये गैरिकवेश-धारण वैष्णवगणरे सङ्गत नहीं—इस प्रकारका विचार जो लोग करते हैं, वे तत्त्वदर्शी नहीं हैं, वे मात्सर्यसे कुपित होकर तत्त्वके विषयमें अन्धे हैं। “रक्तवस्त्र वैष्णवेर परिते ना युयाय”—इस सनातन-उक्तिको पहले उक्त प्रसङ्गके अनुसार ही समझना होगा। वैष्णव—कषाय-वस्त्रधारी ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और ‘मैं ही नारायण’, इस प्रकार माननेवाले एकदण्डी संन्यासीकी अपेक्षा सभी प्रकारसे श्रेष्ठ हैं। इसलिये उनके द्वारा कषायवस्त्र धारण करनेसे वैष्णवका उच्च आसन निम्न हो जाता है। दूसरा, रागमार्गीय परमहंस वैष्णव—कषाय-वस्त्र धारण करनेवाले वैधमार्गीय वर्णाश्रमके अन्तर्गत संन्यासीकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं, उस क्षेत्रमें उनका गैरिकवस्त्र धारणकी विधिके ऊपर होनेके कारण उनके लिये उक्त वस्त्र ‘परिते ना युयाय’ (धारण करना उचित नहीं है)। “ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः। सलिङ्गानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः॥” (भाः 11/18/28)—“जो बाहरी विषयोंसे विरक्त होकर मोक्षकी कामनासे ज्ञाननिष्ठ होते हैं अथवा मोक्ष विषयमें अपेक्षाशून्य होकर मेरे (श्रीकृष्णके) भक्त होते हैं, वे ‘सलिङ्ग-आश्रम’ अर्थात् संन्यासादि आश्रमके चिह्नस्वरूप गैरिकवस्त्र, त्रिदण्डादिका त्याग करके विधि-निषेधके अधीन ना होकर विचरण करेंगे।” यहाँपर इसको लक्ष्य करने योग्य यह है कि केवल वैष्णवके ही नहीं, ज्ञानीके भी उस प्रकार संन्यासोचित रक्तवस्त्र ‘परिते ना युयाय’। तब वे कौनसे अधिकारमें हैं?—इसका सदुत्तर उक्त श्लोककी श्रीविश्वनाथ-चक्रवर्त्तीपाद-कृत टीकामें स्पष्ट देखा जाता है, “परिपक्व-ज्ञानिनो निष्काम-स्वभक्तस्य च वर्णाश्रमनियमाभावमाह,—ज्ञाननिष्ठः परिपक्वज्ञानवान् ×× अत्र सर्वथा नैरपेक्षम्-जातप्रेम्णो भक्तस्य न सम्भवेदत उत्पन्नप्रेमैव भक्तः सलिङ्गानाश्रमांस्त्यजेत्, अनुत्पन्नप्रेमा तु निर्लिङ्गाश्रमधर्मांस्त्यजेदित्यर्थो लभ्यते।” अर्थात् “परिपक्व ज्ञानीके और निष्काम अपने भक्तोंके (श्रीकृष्णभक्तोंके)

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वर्णाश्रम-नियमका कोई प्रयोजन नहीं है, यही यहाँपर बतलाया गया है। ज्ञाननिष्ठ-जो परिपक्व-ज्ञानवान् हैं। सभी विषयोंमें निरपेक्षता अजातप्रेम-भक्तोंमें सम्भव नहीं है, इसलिये उत्पन्नप्रेम-भक्त ही केवल चिह्नसमूहके साथ 'आश्रम' त्याग करेंगे, (इसके द्वारा) अजातप्रेम-भक्त किन्तु 'निर्लिङ्ग-आश्रमधर्म' त्याग करेंगे—यही अर्थ प्राप्त हुआ है।”

इसलिये देखा जा रहा है, जो ज्ञानमार्गके अवलम्बी होकर (गीता 18/54) 'ब्रह्मभूत प्रसन्नात्मा' हुए हैं और जो आत्मधर्मके उचित शुद्धभक्तिके योगसे प्रेमावस्थाको प्राप्त किये हैं, वैसे पारमहंस्य-धर्ममें आरूढ़ व्यक्तिके लिये मात्र गैरिकवस्त्र-दण्डादि चिह्नोंके साथ संन्यासादि आश्रम परित्यागकी बात कही गई है, सर्व अधिकार-निर्विरशेषमें नहीं। अजातप्रेम-भक्त 'निर्लिङ्ग-आश्रमधर्म' अर्थात् पारमहंस्य-आश्रम, जिस आश्रमका निर्दिष्ट कोई चिह्न नहीं है, उसको त्याग करके अपने अधिकारके अनुसार वर्णाश्रम-नियमानुसार आश्रमोचित चिह्न आदि ग्रहण करेंगे—इस इङ्गितसे भी जो उक्त श्लोकसे एक साथ प्रदत्त हुआ है, वह रसिकभक्त-शेखर श्रीचक्रवर्तीपादने उनकी टीकामें अँगूलीके निर्देशके द्वारा दिखला दिया है।

वास्तवमें रागमार्गीय परमहंस-वैष्णवोंकी मर्यादा मार्गके उचित कषाय वस्त्र पहनने या उसका वर्जन करनेकी बाधकता नहीं है-वे गुणोंसे अतीत है। (गीता 14/22)— “न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति।” इसलिये देखा जाता है,—भक्तिकल्पवृक्षके अङ्कुर स्वरूप श्रीमाधवेन्द्रपुरीपाद और उनके शिष्य श्रीईश्वरपुरी एवं उक्त वृक्षके नौ मूलस्वरूप (आदिलीला 9/10-16 संख्या)—श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीकेशवभारती, श्रीब्रह्मानन्दपुरी, श्रीब्रह्मानन्द भारती, श्रीविष्णुपूरी, श्रीकेशवपुरी, श्रीकृष्णानन्द पुरी, श्रीनृसिंहतीर्थ तथा श्रीसुखानन्दपुरी आदि कृष्णप्रेमसिन्धुमें नित्य निमग्न भगवत्-पार्षदगण—उन्होंने बाहरी दृष्टिसे 'रक्तवस्त्र' परित्यागका कोई भी दृष्टान्त स्थापित नहीं किया। इसलिये कषाय-वस्त्रादिके द्वारा सभी स्थानोंपर ही 'अजातप्रेमत्व' या वर्णाश्रमके अधीन होना सूचित नहीं होता है, यही लक्ष्य करने योग्य है। विशेषतः रक्तवस्त्रके माध्यमसे एक ओर जिस प्रकार वे दैन्यवशतः अपने आपको लोगोंके समक्ष वर्णाश्रमके अन्तर्गत रूपमें चिह्नित करवाकर अपने हृदयमें स्थित सहज अनुरागको गोपन रखनेमें प्रयास करते हैं, दूसरी ओर उक्त रक्तवस्त्र उनके लिये एक विशेष उद्दीपन स्वरूप होकर परम भजनके अनुकूल विचारसे उसका अपरित्यज्य होना कुछ भी असम्भव नहीं है। “कनकनिवह-शोभानिन्दि-पीतं नितम्बे, तदुपरि नव-रक्तवस्त्र-मित्थं दधानः। प्रियमिव किल वर्णं रागयुक्तं प्रियायां, प्रणयतु मम नेत्राभीष्टपूर्ति मुकुन्दः॥” (श्रीरूपगोस्वामि-कृत 'श्रीमुकुन्दाष्टकम्')—'जो नितम्बदेशपर स्वर्णकान्तिको भी निन्दित करनेवाले पीतवस्त्र और उसके ऊपर 'रक्तवस्त्र' इस प्रकारसे धारण किये हैं, जिसके द्वारा प्रियतमा श्रीराधाके प्रिय रागयुक्त वर्णका निश्चय ही बोध होता है, वे मुकन्द मेरे नेत्रोंके अभीष्टको पूर्ण करें।” इसलिये विद्वद्-रूढ़ि विचारसे 'रक्तवस्त्र'में जो महिमा ग्रथित होती है, वह केवल भजन-चतुर व्यक्तियोंको ही अनुभव हो सकती है। और जिस कारणसे श्रीगौरसुन्दरके सेवकवर्गने कषाय-वस्त्रधारी एकदण्डीके वेशमें अवस्थित भगवान्के जैसे वेशग्रहण-प्रथाका आदर ना करके दीनजनोचित पुराने मैले वस्त्रादि ग्रहण किये थे, उसी शुद्धविचारका अवलम्बन करके श्रीगोपाल-भट्टादि रूपानुगगणोंने स्वाभाविक दैन्यवशतः श्रीरूपादि गुरुदेवके जैसा परमहंस-वेश ग्रहण ना करके भागवत-विधिके अनुसार एकान्त श्रीगौरसेवक श्रीप्रबोधानन्द त्रिदण्डिपादके आनुगत्य-प्रभावसे कषाय वस्त्र और शिखासूत्र धारणादि किया था। श्रीगोपालभट्ट बचपनसे ही बृहद्-व्रती (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) थे, इसलिये कषाय-वस्त्र परित्याग करके उनको वापस नहीं लौटना है। उस समयमें गौड़ीय समाजमें उक्त श्रीचैतन्यशिक्षाका आदर चलता आ रहा था। अनेक लोग (अपनी स्थूलबुद्धिके द्वारा प्रमाण करके) कहते हैं कि श्रीचैतन्य महाप्रभु स्वयं कषाय

338 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/61-66 ]

वस्त्रधारी होनेपर भी उन्होंने किसीको भी उक्त वस्त्र विधानमें ही व्रती हैं॥61॥ धारण करनेका उपदेश नहीं दिया। महाप्रभु “आपनि महाप्रभुको भोग समर्पण और दोनोंके द्वारा आचरि' भक्ति शिखामु सबारे। आपने ना कैले धर्म एक साथ बैठकर प्रसादका सम्मान :- शिखान ना याय। एइ त' सिद्धान्त गीता-भागवते पाक करि' जगदानन्द चैतन्ये समर्पिला। गाय॥” (आदिलीला 3/20-21)के इस विचारका अवलम्बन दुइजन बसि' तबे प्रसाद पाइला॥62॥ करके भक्तभावको अङ्गीकार करके अवतीर्ण हुए हैं। महाप्रभुके विरहमें दोनोंका क्रन्दन :- उन्होंने “मर्यादा-पालन हय साधुर भूषण”, “मर्यादा प्रसाद पाइ दुइजने कैला आलिङ्गन। राखिले तुष्ट हय मोर मन”, “मर्यादा लङ्घन आमि ना चैतन्यविरहे दुँहे करिला क्रन्दन॥63॥ पाँरो सहिते” (अन्त्यलीला चौथा अध्याय) आदि रूपमें श्रीसनातनप्रभुके माध्यमसे साधकभक्तोंको मर्यादा-मार्गके अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने भोजन बनानेके अवलम्बनका उपदेश किया है। इस प्रकारसे उनके पश्चात् श्रीचैतन्य महाप्रभुको भोग निवेदन किया और साक्षात् आचरण और वाणीसे यदि कोई उस प्रकारकी फिर श्रीजगदानन्द पण्डित एवं श्रीसनातन गोस्वामीने शिक्षा प्राप्त ना करे, तब उसे दुर्भागा ही कहा जायेगा। बैठकर प्रसाद पाया। प्रसाद पानेके बाद दोनोंने परस्पर साधकगणों और सिद्धगणोंका कषाय वस्त्र-धारणका आलिङ्गन किया और दोनों श्रीचैतन्य महाप्रभुके विरहमें इतिहास सत्ययुगसे ही दिखलायी देता है। बड़े-बड़े क्रन्दन करने लगे॥62-63॥ त्रिकालदर्शी महानुभाव ऋषि-महर्षिगण उक्त वस्त्रको दोनोंको श्रीगौर-विरहकी अनुभूति :- धारण करते थे। श्रीकृष्णलीलामें भगवती पौर्णमासी देवी एइमत मास दुइ रहिला वृन्दावने। सदा ही कषाय वस्त्र धारण करती थीं—'पौर्णमासीभगवती चैतन्यविरह-दुःख ना याय सहने॥64॥ सर्वसिद्धि-विधायनी। काषाय-वसना गौरी काशकेशीदरायता॥” (श्रीराधाकृष्णगणोद्देश-दीपिका) आदि। कलियुगमें भी अनुवाद—इस प्रकार श्रीजगदानन्द पण्डित दो मास श्रीरामानुजाचार्य, श्रीमध्वाचार्य, श्रीविष्णुस्वामी, श्रील श्रीधरस्वामी, तक वृन्दावनमें रहे। उनसे श्रीचैतन्य महाप्रभुसे विरहका श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी, श्रीईश्वरपुरी, स्वयंभगवान् श्रीचैतन्य दुःख सहन नहीं हो रहा था॥64॥ महाप्रभु, श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती, श्रीवल्लभाचार्य आदि महाप्रभुके भावी आगमनका संवाद बतलाना, साम्प्रदायिक-वैष्णवगणोंने संन्यास ग्रहण करके कषायवस्त्र- उसके लिये स्थानका निर्वाचन करनेकी आज्ञा :- धारणकी शाश्वत धाराको निरन्तर प्रवाहित रखा है। महाप्रभुर सन्देश कहिला सनातने। इसलिये वह धारा [श्रीरूप-सनातनादिके] परमहंस-आचरणकी 'आमिह आसितेछि, रहिते करिह एकस्थाने॥'65॥ अनुकरण प्रवृत्तियुक्त और अनुरागके आवरणमें कुछ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीसनातन गोस्वामीको वेदविरोधी अपसम्प्रदायके उपद्रवसे लुप्त नहीं हो सकती। रागानुगा-अभिमानी होकर जो वास्तवमें बाहर महाप्रभुका सन्देश बतलाया,—'मैं वृन्दावन आ रहा हूँ, और भीतरमें श्रीरूपानुग नहीं हो पाते और बाहरी मेरे रहनेके लिये एक स्थानकी व्यवस्था कर देना॥'65॥ वेशसे ही मात्र रूपानुगत्यको प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, श्रीजगदानन्दके द्वारा विदायी ग्रहण और महाप्रभुके लिये उनकी उस प्रकारकी चेष्टाकी शुद्ध वैष्णवगण सभी श्रीसनातनके द्वारा दिये गये द्रव्योंको लेना :- प्रकारसे निन्दा करके शास्त्रसम्मत विचारोंके अनुसारसे जगदानन्द-पण्डित तबे आज्ञा मागिला। मर्यादाके संरक्षणके द्वारा श्रीचैतन्य महाप्रभुकी सन्तुष्टिके सनातन प्रभुरे किछु भेटवस्तु दिला॥66॥

[ 13/66-75 तेरहवाँ अध्याय 339 रासस्थलीर बालु, आर गोवर्धनेर शिला। शुष्क पक्व पीलुफल आर गुञ्जामाला ॥ 67 ॥ श्रीजगदानन्दकी पुरी-यात्रा; श्रीजगदानन्दको श्रीसनातनके द्वारा कष्टपूर्वक विदायी देना :- जगदानन्द-पण्डित चलिला सब लञा। व्याकुल हैला सनातन ताँरे विदाय दिया ॥ 68 ॥ अनुवाद-तब श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीसनातन गोस्वामीसे श्रीजगन्नाथ पुरी लौट जानेके लिये अनुमति माँगी। श्रीसनातन गोस्वामीने उन्हें अनुमति प्रदान करके महाप्रभुको भेंट देनेके लिये रासस्थलीकी बालू, गोवर्धनकी शिला, सूखे हुए पके पीलूके फल और गुञ्जामाला दी। श्रीजगदानन्द पण्डित उन भेंटकी वस्तुओंको लेकर चलने लगे तो श्रीसनातन गोस्वामीने व्याकुल होकर उन्हें विदायी दी॥ 66-68 ॥ महाप्रभुके रहनेके लिये द्वादशादित्य-टीलामें मठका चयन और संस्कार-करवाना :- प्रभुर निमित्त एकस्थान मने विचारिला। द्वादशादित्य-टिलाय एक 'मठ' पाइला ॥ 69 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने मनमें विचार करके द्वादश-आदित्य-टीलापर बने एक देवालयको महाप्रभुके रहने योग्य स्थानके रूपमें स्थिर किया॥ 69 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'द्वादशादित्य-टिला',- श्रीमदनमोहनका पुरातन टूटा हुआ मन्दिर, जो ऊँचे टीलेके ऊपर स्थित है, उसीको ही 'द्वादशादित्य-टीला' कहते हैं। कृष्णलीलाके समय उसी स्थानपर द्वादश-आदित्य (सूर्य अपनी बारह कलाओंके साथ) उदित हुए थे॥ 69 ॥ अनुभाष्य- 'मठ',-देवालय (मन्दिर) ॥ 69 ॥ सेइ स्थान राखिला गोसाञि संस्कार करिया। मठेर आगे राखिला एक चालि बान्धिया ॥ 70 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने उस स्थानका पुनः उद्धार करके उसे साफ रखा और उस मठके सामने एक छोटी कुटिया भी बना दी॥ 70 ॥ श्रीजगदानन्दका पुरी जाना और भक्तों सहित महाप्रभुके साथ साक्षात्कार :- शीघ्र चलि' नीलाचले गेला जगदानन्द। भक्तसह गोसाञि हैला परम आनन्द ॥ 71 ॥ अनुवाद-उधर श्रीजगदानन्द पण्डितके शीघ्रतासे चलते हुए श्रीजगन्नाथ पुरी पहुँचनेपर महाप्रभु और उनके भक्तोंको परम आनन्दकी प्राप्ति हुई॥ 71 ॥ प्रभुर चरण वन्दि' सबारे मिलिला। महाप्रभु ताँरे दृढ़ आलिङ्गन कैला ॥ 72 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना करके सभी भक्तोंसे मिले। तब महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितको गाढ़ आलिङ्गन किया॥ 72 ॥ महाप्रभुको श्रीसनातनकी ओरसे दण्डवत् ज्ञापन और उनके द्वारा प्रदान की गयी वस्तुएँ देना :- सनातनरे नामे पण्डित दण्डवत् कैला। रासस्थलीर धूलि आदि सब भेट दिला ॥ 73 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितने महाप्रभुको श्रीसनातन गोस्वामीकी ओरसे दण्डवत् प्रणाम किया और उनके द्वारा भेजी गयी रासस्थलीकी रज आदि भेंटको दिया ॥ 73 ॥ भक्तोंके द्वारा पीलूफलको खानेकी लीला :- सब द्रव्य राखिलेन, पीलु दिलेन बाँटिया। 'वृन्दावनेर फल' बलि' खाइला हृष्ट हञा ॥ 74 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने अन्य सब वस्तुएँ अपने पास रखकर पीलूफलोंको भक्तोंमें बाँट दिया। सभी उस फलको 'वृन्दावनका फल' कहकर प्रसन्नतापूर्वक खाने लगे॥ 74 ॥ ये केह जाने, आँटि चुषिते लागिल। ये ना जाने गौड़ीया, पीलु चाबाञा खाइल ॥ 75 ॥

340 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/75-84 ] मुखे तार झाल गेल, जिह्वा करे ज्वाला। वृन्दावनेर ‘पीलु’ खाइते एइ एक लीला ॥ ७६ ॥ अनुवाद—जो भक्त पीलूफलको खाना जानते थे, वे तो गुठलीको चूसने लगे। जो गौड़देशके भक्त इस फलको खाना नहीं जानते थे, वे पीलूको चबाकर खाने लगे। तीखी मिर्चके समान स्वादसे उनकी जिह्वा जलने लगी। वृन्दावनके पीलूको खानेकी यह भी महाप्रभुकी एक लीला है ॥ ७५-७६ ॥ वृन्दावनसे श्रीजगदानन्दके आनेसे सभीको प्रसन्नता :- जगदानन्देर आगमने सबार उल्लास। एइमते नीलाचले प्रभुर विलास ॥ ७७ ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके लौट आनेसे सभी भक्तोंको उल्लास हुआ। इस प्रकार महाप्रभु नीलाचलमें अपना लीला-विलास कर रहे थे ॥ ७७ ॥ महाप्रभु और गुर्जरी-रागिनीमें गायिका देवदासीके वृत्तान्तका वर्णन; श्रीकृष्णसे सम्बन्धित पदको श्रवण करके महाप्रभुके द्वारा अर्द्धबाह्य दशामें प्रेमावेशमें अप्राकृत श्रीकृष्णसेवा- बुद्धिसे उनके साथ मिलनेके लिये दौड़ना :- एकदिन प्रभु यमेश्वर-टोटा याइते। सेइकाले देवदासी लागिला गाइते ॥ ७८ ॥ गुर्जरीरागिनी लञा सुमधुर-स्वरे। ‘गीतगोविन्द’-पद गाय जगमोहनेरे ॥ ७९ ॥ अनुवाद—एकदिन जब महाप्रभु गदाधर पण्डितको प्रदत्त स्थान यमेश्वर-उद्यानकी ओर जा रहे थे, उस समय कोई एक देवदासी समस्त जगत्वासियोंके मनको हरनेवाले ‘गीत-गोविन्द’के पदका गुर्जरी रागिनीमें अत्यन्त मधुर स्वरसे गान करने लगी ॥ ७८-७९ ॥ दूरे गान शुनि’ प्रभुर हइल आवेश। स्त्री, पुरुष, के गाय, —ना जानि’ विशेष ॥ ८० ॥ अनुवाद—दूरसे ही गानको सुनकर महाप्रभुमें आवेश आ गया। उस आवेशमें वे यह भी नहीं जान पाये कि गान कोई स्त्री कर रही है अथवा कोई पुरुष ॥ ८० ॥ तारे मिलिवारे प्रभु आवेशे धाइला। पथे ‘सिजेर बाड़ी’ हय, फुटिया चलिला ॥ ८१ ॥ अनुवाद—महाप्रभु गान करनेवालेसे मिलनेके आवेशमें दौड़ने लगे। मार्गमें काँटोंकी एक मेड़ थी, महाप्रभु उसीके बीचसे दौड़े चले गये ॥ ८१ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘सिजेर बाड़ी’,—उड़ीसामें पुष्पोंके उद्यानको ‘फुलबाड़ी’ कहते हैं। वहाँपर काँटेकी झाड़ी अर्थात् मनसा-काँटा और काँटे-ही-काँटे वाली झाड़ियाँ रहती हैं, उसीको ‘सिजेर बाड़ी’ (काँटेवाली मेड़) कहते हैं। ‘बाड़ी’का अर्थ—मेड़ है ॥ ८१ ॥ आत्म-विभोर महाप्रभुकी रक्षाके लिये श्रीगोविन्दका उनके पीछे दौड़ना :- अङ्गे काँटा लागिल, किछु ना जानिला ! आस्ते-व्यस्ते गोविन्द ताँर पाछेते धाइला ॥ ८२ ॥ अनुवाद—आवेशके कारण महाप्रभुको यह भी नहीं अनुभव हुआ कि उनके अङ्गोंमें काँटे चुभे हैं। श्रीगोविन्द भी तुरन्त द्रुतगतिसे उनके पीछे दौड़ने लगे ॥ ८२ ॥ श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुको सावधान करके बाह्यदशामें लाना :- धाञा यायेन प्रभु, स्त्री आछे अल्पदूरे। “स्त्री-गान” बलि’ गोविन्द प्रभुरे कैला कोले ॥ ८३ ॥ अनुवाद—महाप्रभु दौड़े जा रहे थे और वह स्त्री बस थोड़ी दूरीपर ही थी कि श्रीगोविन्दने—“स्त्री गान कर रही है”—कहकर महाप्रभुको अपनी भुजाओंमें भर लिया ॥ ८३ ॥ आश्रयजातीय-भावसे युक्त महाप्रभुका जगद्गुरुत्व आचार्यत्व; ‘गौरनागरी’-वादका खण्डन; महाप्रभुका लौटना :- स्त्री-नाम शुनि’ प्रभुर बाह्य हइला। पुनरपि सेइ पथे बाहुड़ि’ चलिला ॥ ८४ ॥

[ 13/84-92 तेरहवाँ अध्याय 341 अनुवाद—'स्त्री'-शब्दको सुनते ही महाप्रभु बाह्यदशामें आ गये और वे उसी पथसे पुनः लौटने लगे॥ 84 ॥ स्त्रीका स्पर्श अथवा सङ्ग—आचार्य अथवा प्रचारककी मृत्युका कारण, इसलिये सब प्रकारसे परित्यज्य होनेके कारण श्रीगोविन्दके पास कृतज्ञता प्रकाशित करनेके छलसे शिक्षा-प्रदान :- प्रभु कहे,—“गोविन्द, आजि राखिला जीवन। स्त्री-परश हैले आमार हइत मरण॥ 85 ॥ श्रीगोविन्दका नहीं चुकाया जा सकनेवाला ऋण, शरणागत श्रीगोविन्दका श्रीजगन्नाथको ही रक्षक-मानना :- ए-ऋण शोधिते आमि नारिमु तोमार।” गोविन्द कहे,—“जगन्नाथ राखेन, मुइ कोन् छार?” 86॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे गोविन्द, आज तुमने मेरा जीवन बचा लिया। यदि मैं स्त्रीको स्पर्श कर लेता, तो निश्चित ही मेरी मृत्यु होती। मैं तुम्हारे इस ऋणको कभी भी चुका नहीं पाऊँगा।” श्रीगोविन्दने कहा,—“भगवान् श्रीजगन्नाथने आपकी रक्षा की है, मेरे जैसा तुच्छ व्यक्ति कैसे आपकी रक्षा कर सकता है?” 85-86॥ महाप्रभुका श्रीगोविन्दको सब समय साथमें रहनेके लिये अनुरोध :- प्रभु कहे,—“गोविन्द, मोर सङ्गे रहिबा। याँहा ताँहा मोर रक्षाय सावधान हइबा॥” 87॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दसे कहा,—'हे गोविन्द! तुम निरन्तर मेरे साथ ही रहना। इधर-उधर कहीं भी कुछ अनिष्ट होनेका भय है, इसलिये तुम सदा सावधानीसे मेरी रक्षा करना॥” 87॥ संवाद श्रवण करके और महाप्रभुकी अवस्थाका स्मरण करके श्रीस्वरूप आदिको आशङ्का :- एत बलि' लेउण्टि' प्रभु गेला निज-स्थाने। शुनि' महा-भय पाइला स्वरूपादि मने॥ 88 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु लौटकर अपने वासस्थानपर आ गये। इस घटनाको सुनकर श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंके मनमें बहुत भय हुआ॥ 88 ॥ श्रीरघुनाथ भट्टगोस्वामीका वृत्तान्त; उनकी आकुमार नैष्ठिक ब्रह्मचारी अथवा बृहद्व्रती-लीला :- एथा तपनमिश्र-पुत्र रघुनाथ-भट्टाचार्य। प्रभुरे देखिते चलिला छाड़ि' सर्व कार्य॥ 89 ॥ अनुवाद—इधर श्रीतपन मिश्रके पुत्र श्रीरघुनाथ-भट्टाचार्य अपने समस्त कार्योंको छोड़कर महाप्रभुके दर्शनके लिये चल पड़े॥ 89 ॥ सेवकके साथ श्रीरघुनाथकी गौड़से होते हुए पुरीकी यात्रा :- काशी हैते चलिला तँहो गौड़-पथ दिया। सङ्गे सेवक चले ताँर झालि साजाञा॥ 90॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ भट्ट काशीसे जगन्नाथपुरीके लिये गौड़देशसे होकर जानेवाले मार्गसे चल पड़े। उनके साथ एक सेवक उनके सामानकी झोलीको उठाकर चल रहा था॥ 90 ॥ मार्गमें पुरी जा रहे रामदास-विश्वाससे मिलन :- पथे तारे मिलिला विश्वास-रामदास। विश्वासखानार कायस्थ तेंहो राजार विश्वास॥ 91 ॥ अनुवाद—उनको मार्गमें रामदास विश्वास मिले। कायस्थ जातिके रामदास विश्वास गौड़देशके राजाके हिसाब-कार्यालयमें कार्य करते थे॥ 91 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विश्वासखानार कायस्थ,'—गौड़ेश्वरके हिसाब (आय-व्ययका विवरण रखनेवाले) कार्यालयको 'विश्वासखाना' कहा जाता था; कायस्थ लोग ही वहाँ कार्य करते थे, क्योंकि वे राजाके विश्वासपात्र थे॥ 91 ॥ रामदास-रामानन्दी-सम्प्रदायके अन्तर्गत दीक्षित (रामायेत्) :- सर्वशास्त्रे प्रवीण, काव्यप्रकाश-अध्यापक। परमवैष्णव, रघुनाथ-उपासक॥ 92 ॥ अनुवाद—वे समस्त शास्त्रोंमें प्रवीण, काव्यप्रकाशके

342 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/92–101 ] अध्यापक, परम-वैष्णव और भगवान् श्रीरघुनाथके उपासक थे॥92॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'परमवैष्णव',—जो हृदयमें 'मुमुक्षु' अर्थात् मोक्षकी कामना रखते हैं, उनकी गणना शुद्धवैष्णवोंमें नहीं होती। वास्तवमें रामके उपासक होनेपर रामदासको 'वैष्णवप्राय' कहा जा सकता है। किन्तु उन दिनों शुद्ध-वैष्णवोंकी श्रेणीमें भेद करनेमें अधिकांश लोग ही अयोग्य थे, इसलिये कायस्थकुलमें उत्पन्न रामदास भी जगत्में 'परमवैष्णव'के रूपमें विख्यात थे॥92॥ अनुभाष्य—'काव्यप्रकाश',—मन्मथभट्टके द्वारा विरचित अपने नामसे विख्यात एक विशेष अलङ्कार-ग्रन्थ॥92॥ अष्टप्रहर रामनाम जपेन रात्रिदिने। सर्व त्यजि' चलिला जगन्नाथ-दरशने॥93॥ अनुवाद—रामदास विश्वास रात-दिन आठों प्रहर रामनामका जप करते थे। वे अपना सब कुछ त्यागकर भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शनोंके लिये चल पड़े॥93॥ रामदासके द्वारा श्रीरघुनाथभट्ट प्रभुकी सेवा :- रघुनाथ-भट्टेरे सने पथेते मिलिला। भट्टेर झालि माथे करि' बहिया चलिला॥94॥ नानासेवा करि' करे पादसम्वाहन। ताते रघुनाथेर हय सङ्कुचित मन॥95॥ उन पण्डितके द्वारा की जानेवाली सेवाको ग्रहण करनेमें श्रीरघुनाथको आपत्ति :- “तुमि बड़ लोक, पण्डित, महाभागवत। सेवा ना करिह, सुखे चल मोर साथ॥” 96॥ अनुवाद—वे जब मार्गमें श्रीरघुनाथ भट्टसे मिले, तब वे श्रीरघुनाथ भट्टकी झोलीको अपने सिरपर ढोकर चलने लगे। वे उनकी अनेक प्रकारकी सेवाएँ करते, यहाँ तक कि वे उनके श्रीचरण भी दबाते थे। उनके द्वारा ऐसा करनेपर श्रीरघुनाथ भट्टके मनमें सङ्कोच होता था। इसलिये उन्होंने रामदास विश्वाससे कहा,—“आप बड़े व्यक्ति, विद्वान और महाभागवत हैं। आप मेरी सेवा मत कीजिये, मेरे साथ केवल सुखसे चलिये॥”94-96॥ रामदासकी दैन्यपूर्ण उक्ति और वैष्णव-ब्राह्मणके दास्यमें आनन्द :- रामदास कहे,—“आमि शूद्र अधम! 'ब्राह्मणेर सेवा',—एइ मोर निज-धर्म॥97॥ सङ्कोच ना कर तुमि, आमि—तोमार 'दास'। तोमार सेवा करिले हय हृदय उल्लास॥”98॥ अनुवाद—रामदास विश्वासने कहा,—“मैं अधम शूद्र हूँ! 'ब्राह्मणोंकी सेवा'—यही मेरा निज-धर्म है। मैं आपका दास हूँ, इसलिये आप किसी प्रकारसे सङ्कोच मत कीजिये। आपकी सेवा करनेसे मेरे हृदयमें उल्लास होता है॥”97-98॥ रामदासके द्वारा निरन्तर रामनाम-जप :- एत बलि' झालि वहेन, करेन सेवने। रघुनाथेर तारकमन्त्र जपेन रात्रिदिने॥99॥ अनुवाद—यह कहकर वे श्रीरघुनाथ भट्टकी झोली वहन करके चलने लगे और उनकी अन्य सेवाएँ भी करने लगे। वे रात-दिन भगवान् श्रीरघुनाथके तारकमन्त्रका जप करते रहते॥99॥ श्रीरघुनाथका पुरीमें आगमन और महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- एमते रघुनाथ आइला नीलाचले। प्रभुर चरणे याञा मिलिला कुतूहले॥100॥ दण्ड-प्रणाम करि' भट्ट पड़िला चरणे। प्रभु 'रघुनाथ' बलि' कैला आलिङ्गने॥101॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ भट्ट श्रीजगन्नाथ पुरीमें आ पहुँचे। वे महाप्रभुके श्रीचरणोंमें उपस्थित होकर बड़े आनन्दसे उनसे मिले और उनके चरणोंमें

[ 13/100-110 तेरहवाँ अध्याय 343 दण्डवत् प्रणाम करते हुए लेट गये। महाप्रभुने—'ओह ! रघुनाथ'—कहकर उनका आलिङ्गन किया॥ 100-101 ॥ महाप्रभुके चरणोंमें श्रीतपनमिश्र और श्रीचन्द्रशेखरकी प्रणति-ज्ञापन, भगवान्‌के द्वारा अपने भक्तोंकी कुशलताकी जिज्ञासा :— मिश्र आर शेखरेर दण्डवत् जानाइला। महाप्रभु ताँ-सबार वार्त्ता पुछिला ॥ 102 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेकी आज्ञा और अपने वासस्थानपर भोजनके लिये निमन्त्रण :— “भाल हइल आइला, देख 'कमललोचन'। आजि आमार एथा करिबा प्रसाद भोजन॥” 103 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ भट्टने श्रीतपनमिश्र और श्रीचन्द्रशेखरकी ओरसे महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुने उनका समाचार पूछा और कहा,—“अच्छा हुआ कि तुम यहाँपर आये। अब तुम कमलनयन भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करो। आज तुम मेरे यहाँपर ही प्रसादका सेवन करना॥” 102-103 ॥ अनुभाष्य—'मिश्र आर शेखरेर',—तपनमिश्र और चन्द्रशेखरका ॥ 102 ॥ वासस्थान-प्रदान और श्रीस्वरूपादि भक्तोंके साथ मिलन :— गोविन्देरे कहि' एक वासा देओयाइला। स्वरूपादि भक्तगण-सने मिलाइला ॥ 104 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दको कहकर श्रीरघुनाथ भट्टके रहनेकी व्यवस्था करवा दी और उनको श्रीस्वरूप दामोदर आदि भक्तोंसे भी मिलवाया॥ 104 ॥ आठ मास तक महाप्रभुके साथमें रहना और महाप्रभुकी स्नेहरूपी कृपाकी प्राप्ति :— एइमत प्रभु-सङ्गे रहिला अष्टमास। दिने दिने प्रभुर कृपा बाड़ये उल्लास ॥ 105 ॥ श्रीरघुनाथका अपने वासस्थानपर महाप्रभुको निमन्त्रण :— मध्ये मध्ये महाप्रभुर करेन निमन्त्रण। घर-भात करेन, आर विविध व्यञ्जन ॥ 106 ॥ अमृतको भी निन्दित करनेवाले नैवेद्य बनानेकी विद्यामें पारदर्शी श्रीरघुनाथ :— रघुनाथ भट्ट—पाके अति सुनिपुण। येइ रान्धे, सेइ हय अमृतेर सम ॥ 107 ॥ भट्ट गोस्वामीको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :— परम सन्तोषे प्रभु करेन भोजन। प्रभुर अवशिष्ट पात्र भट्टेर भक्षण ॥ 108 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ भट्ट आठ मास तक महाप्रभुके सङ्गमें रहे। दिन-प्रतिदिन महाप्रभुकी कृपाको प्राप्त करनेके कारण उनका उल्लास वर्धित होता गया। वे बीच-बीचमें महाप्रभुको निमन्त्रण करते और वे स्वयं ही घरपर चावल तथा विविध व्यञ्जन बनाते। वे पाककलामें अति सुनिपुण थे। वे जो कुछ भी पकाते थे, वही अमृतके समान बनता था। महाप्रभु उनके द्वारा बनाये गये भोजनको बहुत सन्तुष्ट होकर ग्रहण करते थे। महाप्रभुका उच्छिष्ट ही उनका भोजन होता था॥ 105-108 ॥ रामदासके साथ साक्षात्कार होनेपर भी अन्तर्यामी महाप्रभुकी उसके प्रति उदासीनता :— रामदास यदि प्रथम प्रभुरे मिलिला। महाप्रभु अधिक ताँरे कृपा ना करिला ॥ 109 ॥ अनुवाद—जब रामदास विश्वास महाप्रभुसे पहली बार मिले, तब महाप्रभुने उनपर अधिक कृपा नहीं की॥ 109 ॥ उदासीनताका कारण :— अन्तरे मुमुक्षु तैं हो, विद्या-गर्ववान्। सर्वचित्त-ज्ञाता प्रभु—सर्वज्ञ भगवान् ॥ 110 ॥ अनुवाद—रामदास विश्वासके हृदयमें मुक्तिकी कामना

थी और उन्हें अपनी विद्याका अभिमान भी था। सर्वज्ञ भगवान् महाप्रभु सभीके हृदयके भावोंको जानते थे॥110॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मुक्ति-वाञ्छा और विद्या-गर्व-इन दो दोषोंने रामदासको 'शुद्धवैष्णव' बनने नहीं दिया॥110॥ तेरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य समाप्त। रामदासके द्वारा काव्य-शास्त्र-अध्यापन :- रामदास कैला तबे नीलाचले वास। पट्टनायक-गोष्ठीके पड़ाय 'काव्यप्रकाश' ॥111॥ अनुवाद-तब रामदास विश्वास जगन्नाथ पुरीमें ही वास करने लगे। वे वहाँ पट्टनायक-परिवारको (श्रीभवानन्द रायकी सन्तानोंको) 'काव्य-प्रकाश' पढ़ाते थे॥111॥ अनुभाष्य- 'पट्टनायक-गोष्ठीके', -भवानन्दकी सन्तानोंको ॥ 111॥ श्रीरघुनाथको उपलक्ष्य करके महाप्रभुके द्वारा संसारमें प्रवेश करनेमें अनिच्छुक और अप्रविष्ट साधकोंको उनके अपने स्थानपर रहकर स्त्रीसङ्गके द्वारा इन्द्रियसुखकी स्पृहापर आधारित अत्याहार, प्रयास अथवा लौल्यादिका निषेध :- अष्टमास रहि' प्रभु भट्टे विदाय दिला। “विवाह ना करिह” बलि' निषेध करिला ॥ 112 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ पुरीमें आठ मास रहनेके बाद श्रीरघुनाथ भट्टको महाप्रभुने विदायी दी और “विवाह मत करना”-उन्हें ऐसा कहकर निषेध किया॥112॥ अनुभाष्य-श्रीमन्महाप्रभुने रघुनाथभट्टको संसारमें प्रवेश करनेसे पूर्व ही कृष्ण-परायण होते देखकर उन्हें 'अत्याहार'रूप विवाह करके भोगोंके स्थान मायामय संसारमें प्रवेश करनेसे निषेध किया। विषयी पत्नी-परायण सांसारिक लोग गृहव्रत-धर्मको अपनाकर भोक्ता पुरुषाभिमान और भोगबुद्धिके वशीभूत होकर अधिकांश कृष्णसेवाविमुख हो जाते हैं, इसलिये उनकी हरिभक्तिकी सम्भावना बहुत कम होती है॥ 112 ॥ काशीमें जाकर वैष्णवोंकी सेवा करनेका आदेश एवं अनर्थमुक्त श्रीकृष्णसुखतत्पर भागवतसे ही श्रीकृष्णकी सेवाके लिये चिन्मय-भागवत अध्ययन करनेका आदेश :- “वृद्ध माता-पितार याइ' करह सेवन। वैष्णव-पाश भागवत कर अध्ययन ॥ 113 ॥ पुरीमें एकबार आनेका आदेश; कण्ठमाला-प्रसाद देना :- पुनरपि एकबार आसिह नीलाचले।” एत बलि' कण्ठमाला दिला ताँर गले ॥ 114 ॥ अनुवाद- “तुम काशी जाकर अपने वृद्ध [वैष्णव] माता-पिताकी सेवा करना और किसी वैष्णवसे श्रीमद्भागवतका अध्ययन करना तथा तुम एकबार पुनः नीलाचलमें आना।” ऐसा कहकर महाप्रभुने अपने गलेकी माला उतारकर उनके गलेमें डाल दी॥113-114॥ अनुभाष्य-इस स्थानपर जगद्गुरु लोकशिक्षक आचार्य श्रीरघुनाथ भट्टको उपलक्ष्य करके साधकको एकान्तिक परमगौरभक्त वैष्णव पिता-माताको अपनी हरिसेवाके अनुकूलरूपमें सेवा करनेके लिये ही आदेश दिया है; कृष्णभजनके इच्छुक साधकमात्रको ही हरि-गुरु-वैष्णव- विमुख पिता-माताकी सेवा करनेका आदेश नहीं दिया। इस प्रसङ्गमें निम्नलिखित दो श्लोक विचारणीय हैं, (भाः 5/5/18)- “गुरुर्न स स्यात् स्वजनो न स स्यात् पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्। दैवं न तत् स्यात् न पतिश्च स स्यात् न मोचयेद् यः समुपेतमृत्युम्॥” [अर्थात् “भगवद्-सम्बन्धज्ञानके उपदेशके द्वारा जो सामने उपस्थित मृत्युरूपी संसारसे उद्धार नहीं करवा पाते, वे-‘गुरु’ नहीं हैं, वे-‘स्वजन’ नहीं हैं, वे-‘पिता’ नहीं हैं, वे-‘माता’ नहीं हैं, वे-‘देवता’ नहीं हैं, वे-‘पति’ नहीं हैं।”] और (भःरःसिः पूःविः 2/200)- “लौकिकी वैदिकी वापि या क्रिया क्रियते मुने। हरिसेवानुकूलैव सा कार्या भक्तिमिच्छता॥”

[ 13/113-123 तेरहवाँ अध्याय 345 [अर्थात् “हे मुने! जगत्में लौकिकी अथवा वैदिकी जो समस्त क्रियाएँ की जाती हैं, भक्तिको प्राप्त करनेके इच्छुक व्यक्ति उन समस्त क्रियाओंका हरिसेवाके अनुकूलरूपमें ही अनुष्ठान करेंगे।”] व्याकरणके ज्ञाता अवैष्णवसे भागवतको पढ़नेपर जड़ीय काव्यग्रन्थका ही पाठ-श्रवण होता है; क्योंकि ऐसे समस्त पाठक स्वयं ही भागवतके तात्पर्यको समझनेमें समर्थ नहीं होनेके कारण संसार भोग करते हैं, तो वे अन्योंको किस प्रकार अनर्थोंसे मुक्त करानेमें समर्थ होंगे? महाभागवत वैष्णवगण-गृह-बन्धनसे मुक्त होते हैं, इसलिये वे स्वयं ही 'भागवत' होनेके कारण भागवतके वास्तविक अर्थको जाननेवाले और भक्तिके प्रभावसे संसारसे मुक्त हैं॥ 113 ॥ श्रीभट्टको विदायी देना, महाप्रभुके विरहमें श्रीभट्टका क्रन्दन :- आलिङ्गन करि' प्रभु विदाय ताँरे दिला। प्रेमे गर गर भट्ट कान्दिते लागिला॥ 115 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरघुनाथ भट्टको आलिङ्गन करके उन्हें विदायी दी। श्रीरघुनाथ भट्ट भावी विरहके कारण प्रेमके अभिभूत होकर रोने लगे॥ 115 ॥ भक्तोंसे आज्ञा लेकर श्रीरघुनाथका काशीमें आगमन :- स्वरूप-आदि भक्त-ठाञि आज्ञा मागिया। वाराणसी आइला भट्ट प्रभुर आज्ञा पाञा॥ 116॥ काशीमें वैष्णव पण्डितसे भागवतका अध्ययन :- चारिवत्सर घरे पिता-मातार सेवा कैला। वैष्णव-पण्डित-ठाञि भागवत पड़िला॥ 117॥ पिता-माताकी धाम-प्राप्तिके बाद विरक्त होकर पुनः महाप्रभुके निकट पुरीमें आगमन :- पिता-माता काशी पाइले उदासीन हञा। पुनः प्रभुर ठाञि आइला गृहादि छाड़िया॥ 118॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ भट्टने श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंसे भी वाराणसी (काशी) जानेकी अनुमति माँगी। महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीरघुनाथ भट्ट वाराणसी आ गये। उन्होंने चार वर्षोँ तक अपने घरमें रहकर माता-पिताकी सेवा की और एक वैष्णव पण्डितसे श्रीमद्भागवतका अध्ययन किया। अपने माता-पिताके काशीमें देह-त्यागनेके पश्चात् वे विरक्त होकर पुनः अपना घर त्यागकर महाप्रभुके पास श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये॥ 116-118॥ पहलेकी भाँति श्रीरघुनाथका आठ मास तक रहनेके बाद महाप्रभुके द्वारा व्रजमें श्रीरूप-सनातनका सङ्गी बननेका आदेश :- पूर्ववत् अष्टमास प्रभु-पाश छिला। अष्टमास रहि' पुनः प्रभु आज्ञा दिला॥ 119॥ “आमार आज्ञाय, रघुनाथ, याह वृन्दावने। ताँहा याञा रह रूप-सनातन-स्थाने॥ 120॥ वृन्दावनमें नित्यकृत्य कर्त्तव्यका उपदेश :- भागवत पड़, सदा लह कृष्णनाम। अचिरे करिबेन कृपा कृष्ण-भगवान्॥”121॥ अनुवाद-वे पहलेकी भाँति महाप्रभुके पास आठ मास तक रहे। आठ मास रहनेके पश्चात् महाप्रभुने पुनः श्रीरघुनाथ भट्टको आज्ञा दी,-“हे रघुनाथ! तुम वृन्दावन जाओ। वहाँ जाकर तुम रूप-सनातनके सान्निध्यमें रहना। तुम भागवत पढ़ना और सदैव कृष्णनामका जप-कीर्तन करना, भगवान् श्रीकृष्ण शीघ्र ही तुमपर कृपा करेंगे॥”119-121॥ महाप्रभुका कृपालिङ्गन; श्रीरघुनाथकी कृष्णप्रेम-मत्तता :- एत बलि' प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैला। प्रभुर कृपाते कृष्णप्रेमे मत्त हैला॥ 122॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने श्रीरघुनाथ भट्टको आलिङ्गन किया। महाप्रभुकी कृपासे वे कृष्णप्रेममें मत्त हो गये॥ 122॥ जपके लिये तुलसी-माला आदि प्रदान :- चौद्द-हात जगन्नाथेर तुलसीर माला। छुटा-पान-बिड़ा महोत्सवे पाञाछिला॥ 123॥

346 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/123-131 ] अनुवाद-महाप्रभुको भगवान् श्रीजगन्नाथकी चौदह हाथ लम्बी तुलसीकी माला और मसाला-रहित विशेष पानका बीड़ा महोत्सवमें मिला था॥123॥ अनुभाष्य-‘छुटा-पान-बिड़ा,’-मसाला आदि सामग्रीसे रहित अन्य प्रकारका ताम्बुल (पान)॥123॥ श्रीरघुनाथके द्वारा प्रतिदिन मालाकी सेवा :- सेइ माला, छुटा-पान प्रभु ताँरे दिला। 'इष्टदेव' करि' माला धरिया राखिला॥ 124 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरघुनाथ भट्टको वह माला और पानका बीड़ा प्रदान किया और श्रीरघुनाथ भट्टने उस तुलसी-मालाको अपना 'इष्टदेव' मानकर रख लिया॥ 124 ॥ वृन्दावनमें आकर श्रीरूप-सनातनके साथमें रहना :- प्रभुर ठाञि आज्ञा लञा गेला वृन्दावने। आश्रय करिला आसि' रूप-सनातने ॥ 125 ॥ अनुवाद-महाप्रभुसे अनुमति लेकर श्रीरघुनाथ भट्ट वृन्दावन चले गये। उन्होंने वृन्दावन पहुँचकर श्रीरूप गोस्वामी और श्रीसनातन गोस्वामीका आश्रय ग्रहण किया॥ 125 ॥ श्रीरूपप्रभुके निकट रूपानुगवर श्रीरघुनाथके द्वारा भागवत-पाठ :- रूप-गोसाञिर सभाय करेन भागवत-पठन। भागवत पड़िते प्रेमे आउलाय ताँर मन ॥ 126 ॥ श्रीरघुनाथमें अष्टसात्त्विक भाव :- अश्रु, कम्प, गद्गद प्रभुर कृपाते। नेत्र रोध करे वाष्प, ना पारेन पड़िते ॥ 127 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ भट्ट श्रीरूप गोस्वामीके सान्निध्यमें श्रीमद्भागवतका पाठ करने लगे। श्रीमद्भागवतको पढ़ते समय उनका मन प्रेममें व्याकुल हो जाता। भागवतका पाठ करते समय महाप्रभुकी कृपासे उनके नेत्रोंसे अश्रुओँकी धारा, शरीरमें कम्पन और कण्ठ गद्गद हो जाता। नेत्रोंमें अश्रु भर जानेके कारण दिखना बन्द होनेपर वे श्रीमद्भागवतको पढ़ नहीं पाते थे॥ 126-127 ॥ अनुभाष्य- 'आउलाय,'-अलग्न, शिथिल, आकुल, अस्थिर, उन्मत्त होना ॥ 126 ॥ अतीव मधुर कण्ठवाले श्रीभट्टगोस्वामी :- पिकस्वर-कण्ठ, ताते रागेर विभाग। एकश्लोक पड़िते फिराय तिन-चारि राग ॥ 128 ॥ श्रीकृष्ण-स्मरणमें आत्मविस्मृत श्रीरघुनाथ :- कृष्णेर सौन्दर्य-माधुर्य यबे पड़े, शुने। प्रेमेते विह्वल तबे, किछुइ ना जाने ॥ 129 ॥ अनुवाद-कोयलके स्वरकी भाँति उनका मधुर कण्ठ था, उसपर भी वे अनेक प्रकारके रागोंमें अलाप करते थे। वे श्रीमद्भागवतके एक-एक श्लोकको तीन-चार प्रकारके रागोंमें पढ़ते थे। वे जब भी श्रीकृष्णके सौन्दर्य और माधुर्यके विषयमें पढ़ते अथवा सुनते, वे प्रेममें भाव-विभोर हो जाते, उन्हें अन्य किसी वस्तुका ज्ञान ही नहीं रहता ॥ 128-129 ॥ एकमात्र श्रीगोविन्दमें समर्पित प्राण श्रीरघुनाथ :- गोविन्द-चरणे कैला आत्मसमर्पण। गोविन्द-चरणारविन्द-याँर प्राणधन ॥ 130 ॥ अपने शिष्यके द्वारा श्रीगोविन्द-मन्दिर और विग्रहके आभूषणादिका निर्माण :- निज शिष्ये कहि' गोविन्देर मन्दिर कराइला। वंशी, मकर, कुण्डलादि 'भूषण' करि' दिला ॥ 131 ॥ अनुवाद-उन्होंने भगवान् श्रीगोविन्ददेवके श्रीचरणकमलोंमें आत्मसमर्पण कर दिया था। भगवान् श्रीगोविन्ददेवके चरणकमल ही उनके प्राणधन थे। उन्होंने अपने शिष्यसे कहकर भगवान् श्रीगोविन्ददेवका मन्दिर बनवाया। उन्होंने श्रीगोविन्ददेवके लिये वंशी,

[ 13/130-137 तेरहवाँ अध्याय 347

मकरके आकारके कुण्डलादि आभूषण बनवाकर दिये॥ 130-131॥

महाभागवत श्रेष्ठ विरक्तकुलचुड़ामणि श्रीरघुनाथभट्ट गोस्वामी :- ग्राम्यवार्त्ता ना शुने, ना कहे जिह्वाय। कृष्णकथा-पूजादिते अष्टप्रहर याय॥ 132॥

श्रीरघुनाथकी अन्योंकी निन्दादि-शून्यता, सर्वत्र कृष्णभक्त दर्शन और अनुभूति :- वैष्णवेर निन्द्य-कर्म नाहि पाड़े काणे। सबे कृष्ण भजन करे, - एइमात्र जाने॥ 133॥

अनुवाद-वे सांसारिक बातोंको न तो सुनते थे और न ही अपनी जिह्वासे वैसी बात कहते थे। भगवान् श्रीकृष्णकी कथा-पूजा आदिमें ही उनके आठों प्रहर व्यतीत हो जाते। वे कभी भी अपने कानोंसे किसी वैष्णवकी निन्दाको नहीं सुनते थे। वे केवल इतना जानते थे कि सभी श्रीकृष्णका भजन कर रहे हैं॥ 132-133॥

अनुभाष्य- 'वैष्णवेर निन्द्य-कर्म', -जिस अनुष्ठानके द्वारा वैष्णवताकी हानि होती है अर्थात् कृष्णभजनविमुखता और स्त्री-सङ्ग-ये वैष्णवोंके लिये दो प्रकारके दूषणीय विषय हैं। ये दो विषय वैष्णवताके विरुद्ध हैं। वैष्णव-आचार्योंका कर्त्तव्य है कि वे उपदेश देकर अपने आश्रित हरिभजनके उन्मुख वैष्णवों अथवा कृपापात्रोंकी रक्षाका प्रयास करें जिससे ये दो दुराचार उन्हें भजनसे विमुख नहीं करवा सकें। रघुनाथ भट्टका मध्यमाधिकारी भागवतकी भाँति किसी भी अश्रद्धालुके निन्दनीय चरित्रको शोधित करनेका प्रयास नहीं था। वे जानते थे कि सभी कृष्णभजन करते हैं अर्थात्- “केह माने, केह ना माने, सब ताँर दास। ये ना माने, तार हय सेइ पापे नाश॥” (आदिलीला 6/83) [“कोई माने अथवा ना माने, सब उनके दास हैं। जो यह नहीं मानता है, इस पापके (अपराधके) कारण उसका नाश हो जाता है।”]॥ 133 ॥

श्रीरघुनाथकी कृष्णस्मरणकी प्रक्रिया :- महाप्रभुर दत्त माला मननेर काले। प्रसाद-कड़ार-सह बान्धि' लेन गले॥ 134॥

अनुवाद-वे श्रीकृष्णके स्मरणके समय महाप्रभुके द्वारा दी गयी मालाको श्रीजगन्नाथजीके प्रसादी चन्दन आदिके साथ बाँधकर गलेमें धारण कर लेते थे॥ 134॥

अनुभाष्य- 'मननेर काले',-स्मरणके समयमें॥ 134॥

तेरहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।

श्रीरघुनाथका निरन्तर कृष्णप्रेम :- महाप्रभुर कृपाय कृष्णप्रेम अनर्गल। एइ त' कहिलुँ ताते चैतन्य-कृपाफल॥ 135॥

अनुवाद-इस प्रकार मैंने श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीके प्रति श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपाके फलके विषयमें वर्णन किया है जिसके द्वारा श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीमें निरन्तर कृष्णप्रेम उमड़ता था॥ 135 ॥

इस अध्यायमें वर्णित विषयोंकी संक्षेपमें पुनरुक्ति :- जगदानन्देर कहिलुँ वृन्दावन-गमन। तार मध्ये देवदासीर गान-श्रवण॥ 136 ॥

महाप्रभुर रघुनाथे कृपा-महाफल। एक परिच्छेदे तिन कथा कहिलुँ सकल॥ 137॥

अनुवाद-मैंने इस अध्यायमें श्रीजगदानन्द पण्डितके वृन्दावन जानेके विषयमें, बीचमें महाप्रभुके द्वारा एक देवदासीके गानको श्रवण करनेके प्रसङ्ग और श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीपर महाप्रभुकी कृपाके महाफलका वर्णन किया। इस प्रकार मैंने इस एक अध्यायमें तीन प्रसङ्गोंका वर्णन किया है॥ 136-137॥

348 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/138-139 ] श्रीगौर और श्रीगौरभक्तकथाके श्रवणसे इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे जगदानन्द- श्रीगौरकी कृपासे श्रीकृष्णप्रेमका उदय :- वृन्दावन-गमनं नाम त्रयोदशः परिच्छेदः । ये इसकल कथा सुने श्रद्धा करि'। ताँरे कृष्णप्रेमधन देन गौरहरि ॥ 138 ॥ अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी अनुवाद—जो व्यक्ति इन समस्त कथाओंका श्रद्धापूर्वक कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका श्रवण करता है उसे श्रीगौरहरि कृष्णप्रेमरूपी धन प्रदान वर्णन कर रहा है ॥ 139 ॥ करते हैं ॥ 138 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें जगदानन्द-वृन्दावन-गमन चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 139 ॥ नामक तेरहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।

चौदहवाँ अध्याय

कथासार—महाप्रभुका श्रीकृष्णविरहमें अधिरूढ़- दिव्योन्माद प्रलाप वर्णित हो रहा है। जिस समय महाप्रभु गरुड़-स्तम्भके निकट खड़े होकर श्रीजगन्नाथका दर्शन कर रहे थे, कोई एक वृद्धा उड़िया स्त्री उनके कन्धेपर पैर रखकर महा-आर्त्तिके साथ श्रीजगन्नाथको देखने लगी, श्रीगोविन्द उसे मना करनेका प्रयास करने लगे। महाप्रभु उसकी आर्त्तिकी प्रशंसा करके महाप्रेम प्रकाशित करने लगे। पहले महाप्रभुको प्रेममय अवस्थाके समय श्रीकृष्णका दर्शन हो रहा था, किन्तु इस स्त्रीके द्वारा ऐसा करनेपर महाप्रभु बाह्यदशामें आ जानेके कारण श्रीकृष्णको नहीं देखकर श्रीजगन्नाथ, बलदेव और सुभद्राको देखने लगे। स्वप्नमें प्राप्त कृष्णदर्शनको खो देनेपर महाप्रभुमें रागका उदय हुआ; उसके कारण उन्होंने स्वयंको योगीकी उपमा दी; और उस योगीभावमें किस प्रकार उनका वृन्दावन-वास हो रहा है, उसका वर्णन किया। समय-समयपर प्रसिद्ध दस दशाएँ महाप्रभुमें उपस्थित होने लगीं। एकदिन महाप्रभु तीन द्वार बन्द करके रात्रिमें भीतरके प्रकोष्ठमें सो रहे थे, कुछ समयके बाद श्रीगोविन्द और श्रीस्वरूपने देखा, —द्वार सब बन्द हैं, किन्तु महाप्रभु दिखायी नहीं दे रहे! ऐसा देखकर श्रीस्वरूपादि भक्तोंको सिंहद्वारकी उत्तर-दिशामें महाप्रभु अस्थियोंके जोड़ खुल जानेसे महा-दीर्घाकार और अचेतन अवस्थामें मिले। श्रीस्वरूपादि भक्त कृष्णनाम करते करते महाप्रभुके चेतन होनेपर उन्हें पुनः घरपर ले गये। अन्य किसी समय चटक-पर्वतमें गोवर्धनके भ्रमवशतः द्रुतगतिसे जाते-जाते स्तम्भित होकर कदम्बकी भाँति महाप्रभुकी रोमावली खड़ी होने आदि महाभावयुक्त एक दशा दिखलायी दी थी; तब भक्तगण हरिनाम-कीर्तन करके उन्हें शीतल करके घर ले आये। —(अमृतप्रवाह भाष्य)

महाप्रभुके विप्रलम्भ रसमें अधिरूढ़ महाभाव-वशतः दिव्योन्माद (उद्घूर्णा और चित्रजल्पादि)का वर्णन :— कृष्णविच्छेदविभ्रान्त्या मनसा वपुषा धिया। यद्यद्व्यधत्त गौराङ्गस्तल्लेशः कथ्यतेऽधुना ॥ 1 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौराङ्गचन्द्रने कृष्णवियोगमें भ्रमके द्वारा [सङ्कल्प-विकल्पात्मक] मन, [निश्चयात्मिका] बुद्धि और शरीरके द्वारा जो-जो कार्य किये थे, अब मैं उनका कुछ-कुछका वर्णन कर रहा हूँ॥ 1 ॥

अनुभाष्य— गौराङ्गः कृष्णविच्छेदविभ्रान्त्या (कृष्णस्य विच्छेदेन विरहेण या विभ्रान्तिः भ्रममयी चेष्टा तया सङ्कल्पविकल्पात्मकेन) मनसा वपुषा (देहेन) धिया (निश्चयात्मिकया बुद्ध्या) यत् यत् (अनुष्ठानं) व्यधत्त (चेष्टादिकं चकार), अधुना (साम्प्रतं) तल्लेशः (यत्किञ्चित्) कथ्यते (उच्यते)।

श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥

जय जय श्रीचैतन्य स्वयं भगवान्। जय जय गौरचन्द्र भक्तगण-प्राण ॥ 2 ॥

अनुवाद—स्वयं भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। भक्तोंके प्राण-स्वरूप श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो॥ 2 ॥

जय जय नित्यानन्द चैतन्य-जीवन। जयाद्वैताचार्य जय गौरप्रियतम ॥ 3 ॥

350 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/3-8 ] अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके जीवन-स्वरूप केवल वे ही उसे समझकर उसका वर्णन कर सकते श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीगौरहरिके हैं॥ ६॥ प्रियतम श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो॥ ३॥ श्रीस्वरूप और श्रीरघुनाथ-इन दो प्रभुओंका कड़चा ही चैतन्यचरित-वर्णन करनेके लिये गौरलीलाको वर्णित करनेका मूल-ग्रन्थ :— गौरभक्तोंसे कृपा-याचना :— स्वरूप-गोसाञि आर रघुनाथ-दास। जय स्वरूप, श्रीवासादि प्रभुभक्तगण। एइ दुइर कड़चाते ए-लीला प्रकाश ॥ ७॥ शक्ति देह',—करि येन चैतन्यवर्णन ॥ ४॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी और श्रीरघुनाथदास अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीवासादि महाप्रभुके गोस्वामी—इन दोनोंके कड़चामें ही महाप्रभुकी विरह-उन्मादकी भक्तोंकी जय हो। आप मुझे शक्ति प्रदान करें, जिससे दशाकी गम्भीर लीलाओंका प्रकाश हुआ है॥ ७॥ मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंका वर्णन कर सकूँ॥ ४॥ अनुभाष्य—श्रीदामोदर-स्वरूप और श्रीरघुनाथदास गौरकृपाके बिना महाविद्वान् व्यक्तिके लिये भी महाप्रभुके गोस्वामीके कड़चा अर्थात् निदर्शन-ज्ञापिका (प्रमाणित अप्राकृत दिव्योन्मादको समझनेमें असमर्थता :— करनेवाली) टिप्पणियोंमें ही महाप्रभुकी इन गम्भीर प्रभुर विरहोन्माद-भाव—गम्भीर। लीलाओंके उद्देश्य सूचित हुए हैं। जो इन दो बुझिते ना पारे केह, यद्यपि हय 'धीर' ॥ ५॥ गौरपार्षदोंके श्रीचरणोंका परित्याग करके अपनी-अपनी अनुवाद—महाप्रभुका विरह-उन्मादरूपी भाव अत्यन्त इन्द्रियोंके सुखकी लालसासे मायामय संसारमें, गौरभक्तिका गम्भीर है, प्राकृत बुद्धिमान व्यक्ति भी उसे नहीं समझ नाम लेकर मनोधर्मके द्वारा चालित होकर 'रङ्ग-बिरङ्ग' सकता ॥ ५॥ जैसे घूमते रहते हैं, वे श्रीमहाप्रभुकी लीलाको समझनेमें असमर्थ होकर गौरसेवासे विमुख होते हैं॥ ७॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुके कृष्णविरहसे उत्पन्न अप्राकृत अलौकिक गम्भीर उन्माद-भावको बुद्धिमान् व्यक्ति श्रीस्वरूप और श्रीरघुनाथ-दोनों प्रभुओंके अपने-अपने अक्षजज्ञानके द्वारा नहीं समझ पायेंगे। प्रमाणिक होनेका कारण :— वर्तमान समयमें नये भक्त-अभिमानियोंमें भक्तिसिद्धान्त- सेकाले ए दुइ रहेन महाप्रभुर पाशे। विरुद्ध व्यभिचारी 'नदीया-नागरी'-भाव और विष्णुप्रियादेवीकी आर सब कड़चा-कर्त्ता रहेन दूरदेशे ॥ ८॥ अभिनव कल्पित उपासना उनके गौरलीलामें प्रवेशके अभावको ही प्रकाशित करते हैं॥ ५॥ अनुवाद—महाप्रभुकी जब जगन्नाथ पुरीमें विरह-उन्मादकी दशा प्रकाशित हो रही थी, उस समय महाप्रभुकी कृपाके बलसे ही महाप्रभुकी श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरघुनाथदास गोस्वामी ही उनके अप्राकृत-लीलाकी उपलब्धि :— साथ रहते थे। अपने-अपने कड़चामें महाप्रभुकी बुझिते ना पारि याहा, वर्णिते के पारे? लीलाओंको लिखनेवाले अन्य सभी भक्त अन्यान्य दूर सेइ बुझे, वर्णे, चैतन्य शक्ति देन याँरे ॥ ६॥ स्थानोंपर रहते थे॥ ८॥ अनुवाद—महाप्रभुके भावोंकी गम्भीरता जो समझ अनुभाष्य—इस पद्यसे यह जाना जाता है कि ही नहीं सकता, वह उसका कैसे वर्णन कर सकता श्रीरघुनाथ और अन्यान्य अनेक भक्तोंने महाप्रभुकी है? श्रीचैतन्य महाप्रभु जिन्हें शक्ति प्रदान करते हैं, अन्तिम दिव्योन्माद-लीलाके सम्बन्धमें बहुत-सी कथाएँ

[ 14/8-12 चौदहवाँ अध्याय 351 अपने-अपने द्वारा रचित कड़चा-ग्रन्थोंमें लिखकर रखी थीं और उनके द्वारा जगत्का परम उपकार साधित होता। यह दुःखका विषय है कि वे सब कड़चा आज तक भी लोगोंके नेत्रोंके अगोचर रहकर जीवोंके दुर्भाग्यका ही परिचय प्रदान कर रहे हैं॥ 8 ॥ क्षणे क्षणे अनुभवि' एइ दुइ जन। संक्षेपे बाहुल्ये करेन कड़चा-ग्रन्थन ॥ ९॥ अनुवाद-महाप्रभुकी विरह-उन्माद दशाकी क्षण-क्षणकी लीलाओंको अनुभव करके श्रीस्वरूप दामोदर अपने कड़चामें उनको संक्षेपमें और श्रीरघुनाथदास गोस्वामी अपने कड़चामें उनको विस्तृतरूपमें लिखते थे ॥ ९॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'संक्षेपे बाहुल्ये', – स्वरूप-गोस्वामीने संक्षेपमें एवं रघुनाथदास-गोस्वामीने विस्तृत रूपसे कड़चाकी रचना की है॥ 9 ॥ अनुभाष्य-इन दो गोस्वामियोंने महाप्रभुकी लीलाओंको सदैव अनुभव करके उन लीलाओंकी थोड़ी-बहुत कड़चाके आकारमें रचना की है, परन्तु यथारीति (प्रचलित प्रथाके अनुकूल) ग्रन्थकी रचना नहीं की ॥ 9 ॥ स्वरूप- 'सूत्रकर्त्ता', रघुनाथ- 'वृत्तिकार' । तार बाहुल्य वर्णि-पाँजि-टीका-व्यवहार ॥ 10 ॥ अनुवाद - श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुकी लीलाओंके सूत्रकर्त्ता (सूत्ररूपमें लिखनेवाले) और श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी उन लीलाओंके वृत्तिकार (विस्तारसे लिखनेवाले) थे। मैं उन दोनों कड़चाके भावोंको ही कुछ विस्तार करके अब लिख रहा हूँ, जैसे रूईको धुननेसे वह कुछ फूल जाती है ॥ 10 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीस्वरूप गोस्वामीने सूत्र और श्रीरघुनाथने उनकी वृत्ति लिखी है; मैं उन दोनोंके द्वारा वर्णित विषयको ही थोड़ा-सा विस्तृत करके पाँजिटीकाकी (प्रस्तावनाकी) भाँति लिख रहा हूँ। 'पाँजिटीका' अथवा 'पञ्जितीका'का अर्थ यह है कि वृत्तिकारके मूल आकर-ग्रन्थके (ग्रन्थ जिसमें अनेक तथ्योंका विवरण दिया हो) विचारोंको रूईकी भाँति धुनकर कुछ वर्धित करके वर्णन किया गया है ॥ 10 ॥ अनुभाष्य- 'सूत्र',- “स्वल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद् विश्वतोमुखम्। अस्तोभमनवद्यञ्च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥” [अर्थात् “सूत्र-बहुत कम अक्षरोंसे युक्त, सन्देहरहित, सारवान्, सर्वतोगामी (जिसका सम्पूर्ण ग्रन्थमें सर्वत्र अधिकार है), सफल और निर्दोष वचनोंको ही पण्डितगण 'सूत्र' कहते हैं।”] 'वृत्ति', – वृत्तिका अर्थ कारिका है; “कारिका यातना-वृत्त्योः” इत्यमरः ; [अर्थात् “अमरकोषमें 'कारिका'का अर्थ नरक-यातना और श्लोक कहा गया है।”] उसकी टीकामें- “संक्षेपेण श्लोकैर्विवरणं वृत्तिः ॥” [उसकी टीकामें कहा गया है, - “संक्षेपमें श्लोकसमूहके द्वारा विवरण ही 'वृत्ति' है।”] ॥ 10 ॥ अप्राकृत श्रद्धाके साथ अप्राकृत विप्रलम्भ-भाव श्रवण करके उसके अनुसरणसे ही प्रेमकी प्राप्ति :- ताते विश्वास करि' शुन भावेर वर्णन। हइबे भावेर ज्ञान, पाइबा प्रेमधन ॥ 11 ॥ अनुवाद-कृपापूर्वक आप सभी विश्वासके सहित महाप्रभुके विरह-उन्मादरूपी भावोंके वर्णनको श्रवण करें। इससे आपको विरह-उन्मादरूपी भावका ज्ञान होगा और आप प्रेमरूपी धनको प्राप्त करेंगे ॥ 11 ॥ अन्तर-दशामें महाप्रभुके हृदयमें कृष्णविरहिणी श्रीराधादि गोपियोंके भावोंका उदय, अन्तिम सात अध्यायोंमें ही 'गौरनागरवाद' का खण्डन :- कृष्ण मथुराय गेले गोपीर ये-दशा हैल। कृष्णविच्छेदे प्रभुर से-दशा उपजिल ॥ 12 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके मथुरा चले जानेपर गोपियोंकी जो सुदीर्घ विप्रलम्भमयी दशा हुई थी, श्रीकृष्णविरहमें महाप्रभुकी भी वैसी दशा उत्पन्न हुई ॥ 12 ॥

352 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/12-16 ] अनुभाष्य—'ये-दशा हैल',—सुदीर्घ विप्रलम्भ ॥ 12 ॥ उद्धव-दर्शने यैछे राधार विलाप। क्रमे क्रमे हैल प्रभुर से उन्माद-विलाप ॥ 13 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका सन्देश लेकर व्रजमें आनेपर उद्धवको देखकर जैसे श्रीराधाका विलाप था, महाप्रभु भी क्रमशः उसी प्रकारका उन्माद-विलाप करने लगे॥ 13 ॥ अनुभाष्य—'राधार विलाप',—भाः (10/47/12-21) श्लोकोंमें भ्रमरगीत देखें ॥ 13 ॥ कृष्णविरहिणी श्रीराधाके भावमें ही विभावित महाप्रभु, इसलिये उनमें कृष्णसे सम्भोग-आङ्काङ्क्षा-वृत्तिका अभाव :— राधिकार भावे प्रभुर सदा 'अभिमान'। सेइ भावे आपनाके हय 'राधा'-ज्ञान ॥ 14 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सदा श्रीराधिकाके भावमें ही विभावित रहते थे, उस भावको वे अपना भाव ही मानते थे, इसलिये वे स्वयंको श्रीराधा ही समझते थे॥ 14 ॥ अनुभाष्य—अभिमान—(उःनीः)— “अभिमानो निजप्रेमोत्कर्षाख्यानं तु भङ्गितः।”—(उःनीः 9/23) [अर्थात् “भङ्गिमापूर्वक स्वपक्षके प्रेमके उत्कर्षका वर्णन ही 'अभिमान' कहलाता है।”] “सन्तु रम्याणि भूरीणि प्रार्थ्यं स्यादिदमेव सः। इति यो निर्णयो धीरैरभिमानः स उच्यते॥”—(उःनीः 14/19) [अर्थात् “ 'संसारमें नाना प्रकारकी मनोरम वस्तुएँ हैं, वे रहें, किन्तु मेरे लिये केवल यही प्रार्थनीय हैं'—इस प्रकार स्थिरीकरणको पण्डितगण 'अभिमान' कहते हैं।”] 'सदा अभिमान',—सर्वदा अप्राकृत सेवकाभिमान। यद्यपि श्रीगौरसुन्दर—स्वयं कृष्ण हैं, तथापि श्रीमती राधिका-सम्मिलित तनु होनेके कारण सर्वदा श्रीमतीके भावमें अभिन्न भावसे निमग्न थे। सम्भोगमय श्रीकृष्णभावमें अवस्थित होनेसे उन्हें अपने उद्देश्यकी सिद्धिमें बाधा होती। वर्तमान समयमें श्रीगौरविद्वेषी अवैष्णव विपरीत बुद्धिसे उनके द्वारा आचरित और प्रचारित भजन-प्रणालीके विचारोंको उलटा समझकर, श्रीगौरसुन्दरको अपनी मनगढ़न्त कल्पनाके द्वारा 'प्राकृत नागर' बनाकर, स्वयंको 'रङ्गेर नदीयानागरी' कहकर कृष्णभक्तिसे विच्युत हो रहे हैं। वर्तमान समयमें 'Theosophist अर्थात् ब्रह्मविद्यावादी'-सम्प्रदायके कुछ व्यक्ति ऐसा मानते हैं कि श्रीगौरसुन्दर तो स्वयं भगवान् हैं और उनके द्वारा जीवोंके मङ्गलके लिये 'विप्रलम्भ साधनको ही सिद्धिका एकमात्र पथ' कहकर प्रदर्शित करनेपर भी वह पथ जीवोंके लिये दुर्लभ है। अतएव जिस जीवकी जैसी इच्छा है, वह उसीके अनुरूप उपादानसे श्रीगौरसुन्दरको बनाकर और सजाकर इन्द्रियतर्पण-परायण अपने-अपने मनोकल्पित उपादान अर्थात् जिस किसी भी प्रकारके उपायसे भजन कर सकता है। इसका निषेध करते हुए श्रीगौरसुन्दरने अप्राकृत-विप्रलम्भभावमें कृष्णसेवाकी परम चमत्कारिताको प्रदर्शित करके जगत्का मङ्गल विधान किया है ॥ 14 ॥ महाप्रभुका अधिरूढ़-महाभावमें दिव्योन्माद :— दिव्योन्मादे ऐछे हय, कि इहा विस्मय ? अधिरूढ़-भावे दिव्योन्माद-प्रलाप हय ॥ 15 ॥ अनुवाद—दिव्योन्माद अवस्थामें ऐसा ही होता है, इसमें आश्चर्यकी क्या बात है ? अधिरूढ़ भावमें दिव्योन्माद-प्रलाप ही होता है ॥ 15 ॥ दिव्योन्मादकी संज्ञा और उसके प्रकारका भेद :— उज्ज्वलनीलमणिमें स्थायिभाव-प्रकरणमें (190) श्लोक— एतस्य मोहनाख्यस्य गतिं कामप्युपेयुषः। भ्रमाभा कापि वैचित्री दिव्योन्माद इतीर्यते। उद्घूर्णा-चित्रजल्पाद्यास्तद्भेदा बहवो मताः ॥ 16 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 16 ॥

[ 14/16-24 चौदहवाँ अध्याय 353 अमृतप्रवाह भाष्य—मोहनाख्य-भावकी किसी प्रकारकी अवस्थामें भ्रमकी आभा होनेपर 'वैचित्री'-नामक दिव्योन्मादका उदय होता है। उद्घूर्णा और चित्रजल्पादि—दिव्योन्मादके बहुतसे विशेष भेद हैं॥ 16॥ अनुभाष्य— कामपि (अनिर्वचनीयां) गतिम् (अवस्थाम्) उपेयुषः (प्राप्तस्य) सतः एतस्य मोहनाख्यस्य (मोहनम् आख्या यस्य तस्य) भ्रमाभा (भ्रमस्य इव आभा यस्याः सा) कापि (अपूर्वा) वैचित्री (चमत्कारिता-प्रतिपादिका-वृत्तिविशेषरूपा) दिव्योन्मादः इति ईर्य्यते (कथ्यते); उद्घूर्णाचित्रजल्पाद्याः बहवः तद्भेदाः (दिव्योन्मादभेदाः) मताः (कथिताः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 16॥ श्रीराधाकी दासीके अभिमानमें महाप्रभुके दिव्योन्माद (उद्घूर्णा) का दृष्टान्त :— एकदिन महाप्रभु करियाछेन शयन। कृष्ण रासलीला करे,—देखिला स्वपन॥ 17॥ त्रिभङ्ग-सुन्दर-देह, मुरलीवदन। पीताम्बर, वनमाला, मदनमोहन॥ 18॥ मण्डलीबन्धे गोपीगण करेन नर्त्तन। मध्ये राधासह नाचे व्रजेन्द्रनन्दन॥ 19॥ देखि' प्रभु सेइ रसे आविष्ट हैला। 'वृन्दावने कृष्ण पाइनुं'—एइ ज्ञान कैला॥ 20॥ अनुवाद—एकदिन जब महाप्रभु शयन कर रहे थे, तब उन्होंने स्वप्नमें देखा कि श्रीकृष्ण रासलीला कर रहे हैं। श्रीकृष्णकी त्रिभङ्ग-सुन्दर देह है, उनके मुखपर मुरली विद्यमान है, उन्होंने पीताम्बर धारण किया हुआ है, उनके गलेमें वनमाला है और वे मदनको (कामदेवको) भी मोहित करनेवाले हैं। गोपियाँ मण्डलाकारमें नृत्य कर रही हैं और उनके मध्यमें श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीराधाके साथ नृत्य कर रहे हैं। इस लीलाको देखकर महाप्रभु उस रसमें आविष्ट हो गये और उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ—'मुझे वृन्दावनमें कृष्ण प्राप्त हुए हैं।'॥ 17-20॥ अनुभाष्य—'रसे आविष्ट हैला',—तन्मयता प्राप्त कर ली॥ 20॥ जागृत-अवस्थामें (बाह्यदशामें) महाप्रभुका कृष्ण-विच्छेदमें दुःख :— प्रभुर विलम्ब देखि' गोविन्द जागाइला। जागिले 'स्वप्न'-ज्ञान हैल, प्रभु दुःखी हैला॥ 21॥ अनुवाद—प्रातःकालमें महाप्रभुके उठनेमें देर होते देखकर श्रीगोविन्दने उन्हें जगाया। जागृत होनेपर महाप्रभु यह जानकर कि रासलीलामें उन्हें जो कृष्ण मिले थे, वह स्वप्न था, इसलिये वे बहुत दुःखी हुए॥ 21॥ अभ्यासवशतः नित्यकृत्य करना :— देहाभ्यासे नित्यकृत्य करि' समापन। काले याइ' कैला जगन्नाथ-दरशन॥ 22॥ अनुवाद—परन्तु महाप्रभुने अभ्यासवशतः देहसे सम्बन्धित नित्यकृत्य समाप्त करके समयपर जाकर भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन किया॥ 22॥ गरुड़-स्तम्भसे महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ-दर्शन :— यावत्काल दर्शन करेन गरुड़ेर आगे। प्रभुर आगे दर्शन करे लोक लाखे लाखे॥ 23॥ अनुवाद—जिस समय महाप्रभु गरुड़ स्तम्भके पीछे खड़े होकर भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन कर रहे थे, उस समय महाप्रभुके आगे खड़े होकर लाखों-लाखों लोग भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन कर रहे थे॥ 23॥ एक उड़िया स्त्रीके द्वारा अनजानेमें महाप्रभुके कन्धेपर पैर रखकर श्रीजगन्नाथ-दर्शन :— उड़िया एक स्त्री भीड़े दर्शन ना पाञा। गरुड़े चड़ि' देखे प्रभुर स्कन्धे पद दिया॥ 24॥ अनुवाद—एक उड़िया स्त्री भीड़में भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन नहीं कर पानेके कारण गरुड़-स्तम्भपर चढ़ गयी

354 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/24-30 ] और वह अपना एक पैर महाप्रभुके कन्धेपर रखकर जगन्नाथजीके दर्शन करने लगी ॥ 24 ॥ यह देखकर श्रीगोविन्दके द्वारा उस स्त्रीको मना करना :- देखिया गोविन्द व्यस्ते सेइ स्त्रीरे वर्जिला। तारे नामाइते प्रभु गोविन्दे निषेधिला ॥ 25 ॥ अनुवाद—यह देखकर श्रीगोविन्दने तुरन्त उस स्त्रीको ऐसा करनेसे मना किया। किन्तु महाप्रभुने श्रीगोविन्दको उस स्त्रीको नीचे उतारनेके लिये मना किया ॥ 25 ॥ अनुभाष्य—गरुड़के ऊपर चढ़नेसे वैष्णवापराध और महाप्रभुके कन्धेके ऊपर पैर रखनेसे भगवान्‌के चरणकमलोंमें अपराध—इस आशङ्कासे शीघ्रतापूर्वक गोविन्दने उस स्त्रीको मना किया अर्थात् उसे नीचे उतार दिया ॥ 25 ॥ कृष्णदर्शनके द्वारा कृष्णके सेवासुखका विधान करने हेतु स्त्री-मूर्तिको अप्राकृत कृष्णभक्त मानना :- “'आदिवस्या' एइ स्त्रीरे ना कर वर्जन। करुक यथेष्ठ जगन्नाथ-दरशन ॥” 26 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दसे कहा, —“दर्शनके लिये अतिव्यग्र इस स्त्रीको ऐसा करनेसे मत रोको, उसे जी भरकर भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करने दो॥” 26 ॥ अनुभाष्य—'आदिवस्या',—अन्त्यलीला 10/116 संख्या देखें ॥ 26 ॥ उस स्त्रीका तत्क्षणात् नीचे उतरना और महाप्रभुको प्रणाम करके अपनी दैन्यरूपी उक्तिका ज्ञापन :- आस्ते-व्यस्ते सेइ नारी भूमेते नामिला। महाप्रभुरे देखि' ताँर चरण वन्दिला ॥ 27 ॥ अनुवाद—उस स्त्रीको अपने कियेका जब ज्ञान हुआ, तब वह तुरन्त ही नीचे उतर गयी और उसने महाप्रभुको देखकर उनके चरणकमलोंकी वन्दना की ॥ 27 ॥ उसकी प्रेम भरी उत्कण्ठाको देखकर उसे गुरु मानकर महाप्रभुके द्वारा दैन्यपूर्वक स्तुति :- तार आर्त्ति देखि' प्रभु कहिते लागिला। “एत आर्त्ति जगन्नाथ मोरे नाहि दिला ! ! 28 ॥ अनुवाद—उस स्त्रीकी भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शनोंके लिये उत्कण्ठा देखकर महाप्रभु कहने लगे, —“मुझे भगवान् जगन्नाथने अपने दर्शनके लिये इतना आग्रह प्रदान नहीं किया ! ! 28 ॥ अनुभाष्य—'आर्त्ति',—दर्शनका आग्रह; जगन्नाथके दर्शनके आग्रहके कारण [उस स्त्रीने] हित-अहितके विचारसे रहित होकर परम-वन्दनीय महाप्रभुके उत्तम अङ्गपर अनजानेमें चरण रखा था ॥ 28 ॥ इन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञानके द्वारा श्रीकृष्णके सेवकको 'स्त्री-पुरुषादि' रूपी बाह्य परिचयसे देखनेके निषेधकी शिक्षा देना :- जगन्नाथे आविष्ट इहार तनु-मन-प्राणे। मोर स्कन्धे पद दियाछे, ताहा नाहि जाने ॥ 29 ॥ अनुवाद—इस स्त्रीके देह-मन और प्राण भगवान् श्रीजगन्नाथमें इतने आविष्ट हैं कि इसे यह तक भी पता नहीं चला कि इसने मेरे कन्धेपर अपना पैर रखा है॥ 29 ॥ अहो भाग्यवती एह, वन्दि इहार पाय। इहार प्रसादे ऐछे आर्त्ति आमार वा हय ! ! 30 ॥ अनुवाद—अहो ! यह परम सौभाग्यशालिनी है, मैं इसके चरणोंकी वन्दना करता हूँ। मुझमें भी इसकी कृपासे ऐसी उत्कण्ठा उत्पन्न हो ! ! 30 ॥ अमृताणुकणिका—महाप्रभु विचार कर रहे हैं कि यदि उस स्त्रीके समान मेरा आवेश हो, तो मेरा जीवन धन्य हो जाय। ऐसा ही आवेश जीवनका प्रयोजन होना चाहिये। इसे सिखलानेके लिये महाप्रभुने कहा कि श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये उस स्त्रीमें इतना आवेश आ