श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2366, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय
कथासार—महाप्रभुका श्रीकृष्णविरहमें अधिरूढ़- दिव्योन्माद प्रलाप वर्णित हो रहा है। जिस समय महाप्रभु गरुड़-स्तम्भके निकट खड़े होकर श्रीजगन्नाथका दर्शन कर रहे थे, कोई एक वृद्धा उड़िया स्त्री उनके कन्धेपर पैर रखकर महा-आर्त्तिके साथ श्रीजगन्नाथको देखने लगी, श्रीगोविन्द उसे मना करनेका प्रयास करने लगे। महाप्रभु उसकी आर्त्तिकी प्रशंसा करके महाप्रेम प्रकाशित करने लगे। पहले महाप्रभुको प्रेममय अवस्थाके समय श्रीकृष्णका दर्शन हो रहा था, किन्तु इस स्त्रीके द्वारा ऐसा करनेपर महाप्रभु बाह्यदशामें आ जानेके कारण श्रीकृष्णको नहीं देखकर श्रीजगन्नाथ, बलदेव और सुभद्राको देखने लगे। स्वप्नमें प्राप्त कृष्णदर्शनको खो देनेपर महाप्रभुमें रागका उदय हुआ; उसके कारण उन्होंने स्वयंको योगीकी उपमा दी; और उस योगीभावमें किस प्रकार उनका वृन्दावन-वास हो रहा है, उसका वर्णन किया। समय-समयपर प्रसिद्ध दस दशाएँ महाप्रभुमें उपस्थित होने लगीं। एकदिन महाप्रभु तीन द्वार बन्द करके रात्रिमें भीतरके प्रकोष्ठमें सो रहे थे, कुछ समयके बाद श्रीगोविन्द और श्रीस्वरूपने देखा, —द्वार सब बन्द हैं, किन्तु महाप्रभु दिखायी नहीं दे रहे! ऐसा देखकर श्रीस्वरूपादि भक्तोंको सिंहद्वारकी उत्तर-दिशामें महाप्रभु अस्थियोंके जोड़ खुल जानेसे महा-दीर्घाकार और अचेतन अवस्थामें मिले। श्रीस्वरूपादि भक्त कृष्णनाम करते करते महाप्रभुके चेतन होनेपर उन्हें पुनः घरपर ले गये। अन्य किसी समय चटक-पर्वतमें गोवर्धनके भ्रमवशतः द्रुतगतिसे जाते-जाते स्तम्भित होकर कदम्बकी भाँति महाप्रभुकी रोमावली खड़ी होने आदि महाभावयुक्त एक दशा दिखलायी दी थी; तब भक्तगण हरिनाम-कीर्तन करके उन्हें शीतल करके घर ले आये। —(अमृतप्रवाह भाष्य)
महाप्रभुके विप्रलम्भ रसमें अधिरूढ़ महाभाव-वशतः दिव्योन्माद (उद्घूर्णा और चित्रजल्पादि)का वर्णन :— कृष्णविच्छेदविभ्रान्त्या मनसा वपुषा धिया। यद्यद्व्यधत्त गौराङ्गस्तल्लेशः कथ्यतेऽधुना ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौराङ्गचन्द्रने कृष्णवियोगमें भ्रमके द्वारा [सङ्कल्प-विकल्पात्मक] मन, [निश्चयात्मिका] बुद्धि और शरीरके द्वारा जो-जो कार्य किये थे, अब मैं उनका कुछ-कुछका वर्णन कर रहा हूँ॥ 1 ॥
अनुभाष्य— गौराङ्गः कृष्णविच्छेदविभ्रान्त्या (कृष्णस्य विच्छेदेन विरहेण या विभ्रान्तिः भ्रममयी चेष्टा तया सङ्कल्पविकल्पात्मकेन) मनसा वपुषा (देहेन) धिया (निश्चयात्मिकया बुद्ध्या) यत् यत् (अनुष्ठानं) व्यधत्त (चेष्टादिकं चकार), अधुना (साम्प्रतं) तल्लेशः (यत्किञ्चित्) कथ्यते (उच्यते)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य स्वयं भगवान्। जय जय गौरचन्द्र भक्तगण-प्राण ॥ 2 ॥
अनुवाद—स्वयं भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। भक्तोंके प्राण-स्वरूप श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो॥ 2 ॥
जय जय नित्यानन्द चैतन्य-जीवन। जयाद्वैताचार्य जय गौरप्रियतम ॥ 3 ॥