भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2365

348 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/138-139 ] श्रीगौर और श्रीगौरभक्तकथाके श्रवणसे इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे जगदानन्द- श्रीगौरकी कृपासे श्रीकृष्णप्रेमका उदय :- वृन्दावन-गमनं नाम त्रयोदशः परिच्छेदः । ये इसकल कथा सुने श्रद्धा करि'। ताँरे कृष्णप्रेमधन देन गौरहरि ॥ 138 ॥ अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी अनुवाद—जो व्यक्ति इन समस्त कथाओंका श्रद्धापूर्वक कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका श्रवण करता है उसे श्रीगौरहरि कृष्णप्रेमरूपी धन प्रदान वर्णन कर रहा है ॥ 139 ॥ करते हैं ॥ 138 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें जगदानन्द-वृन्दावन-गमन चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 139 ॥ नामक तेरहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।