भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2364

[ 13/130-137 तेरहवाँ अध्याय 347

मकरके आकारके कुण्डलादि आभूषण बनवाकर दिये॥ 130-131॥

महाभागवत श्रेष्ठ विरक्तकुलचुड़ामणि श्रीरघुनाथभट्ट गोस्वामी :- ग्राम्यवार्त्ता ना शुने, ना कहे जिह्वाय। कृष्णकथा-पूजादिते अष्टप्रहर याय॥ 132॥

श्रीरघुनाथकी अन्योंकी निन्दादि-शून्यता, सर्वत्र कृष्णभक्त दर्शन और अनुभूति :- वैष्णवेर निन्द्य-कर्म नाहि पाड़े काणे। सबे कृष्ण भजन करे, - एइमात्र जाने॥ 133॥

अनुवाद-वे सांसारिक बातोंको न तो सुनते थे और न ही अपनी जिह्वासे वैसी बात कहते थे। भगवान् श्रीकृष्णकी कथा-पूजा आदिमें ही उनके आठों प्रहर व्यतीत हो जाते। वे कभी भी अपने कानोंसे किसी वैष्णवकी निन्दाको नहीं सुनते थे। वे केवल इतना जानते थे कि सभी श्रीकृष्णका भजन कर रहे हैं॥ 132-133॥

अनुभाष्य- 'वैष्णवेर निन्द्य-कर्म', -जिस अनुष्ठानके द्वारा वैष्णवताकी हानि होती है अर्थात् कृष्णभजनविमुखता और स्त्री-सङ्ग-ये वैष्णवोंके लिये दो प्रकारके दूषणीय विषय हैं। ये दो विषय वैष्णवताके विरुद्ध हैं। वैष्णव-आचार्योंका कर्त्तव्य है कि वे उपदेश देकर अपने आश्रित हरिभजनके उन्मुख वैष्णवों अथवा कृपापात्रोंकी रक्षाका प्रयास करें जिससे ये दो दुराचार उन्हें भजनसे विमुख नहीं करवा सकें। रघुनाथ भट्टका मध्यमाधिकारी भागवतकी भाँति किसी भी अश्रद्धालुके निन्दनीय चरित्रको शोधित करनेका प्रयास नहीं था। वे जानते थे कि सभी कृष्णभजन करते हैं अर्थात्- “केह माने, केह ना माने, सब ताँर दास। ये ना माने, तार हय सेइ पापे नाश॥” (आदिलीला 6/83) [“कोई माने अथवा ना माने, सब उनके दास हैं। जो यह नहीं मानता है, इस पापके (अपराधके) कारण उसका नाश हो जाता है।”]॥ 133 ॥

श्रीरघुनाथकी कृष्णस्मरणकी प्रक्रिया :- महाप्रभुर दत्त माला मननेर काले। प्रसाद-कड़ार-सह बान्धि' लेन गले॥ 134॥

अनुवाद-वे श्रीकृष्णके स्मरणके समय महाप्रभुके द्वारा दी गयी मालाको श्रीजगन्नाथजीके प्रसादी चन्दन आदिके साथ बाँधकर गलेमें धारण कर लेते थे॥ 134॥

अनुभाष्य- 'मननेर काले',-स्मरणके समयमें॥ 134॥

तेरहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।

श्रीरघुनाथका निरन्तर कृष्णप्रेम :- महाप्रभुर कृपाय कृष्णप्रेम अनर्गल। एइ त' कहिलुँ ताते चैतन्य-कृपाफल॥ 135॥

अनुवाद-इस प्रकार मैंने श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीके प्रति श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपाके फलके विषयमें वर्णन किया है जिसके द्वारा श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीमें निरन्तर कृष्णप्रेम उमड़ता था॥ 135 ॥

इस अध्यायमें वर्णित विषयोंकी संक्षेपमें पुनरुक्ति :- जगदानन्देर कहिलुँ वृन्दावन-गमन। तार मध्ये देवदासीर गान-श्रवण॥ 136 ॥

महाप्रभुर रघुनाथे कृपा-महाफल। एक परिच्छेदे तिन कथा कहिलुँ सकल॥ 137॥

अनुवाद-मैंने इस अध्यायमें श्रीजगदानन्द पण्डितके वृन्दावन जानेके विषयमें, बीचमें महाप्रभुके द्वारा एक देवदासीके गानको श्रवण करनेके प्रसङ्ग और श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीपर महाप्रभुकी कृपाके महाफलका वर्णन किया। इस प्रकार मैंने इस एक अध्यायमें तीन प्रसङ्गोंका वर्णन किया है॥ 136-137॥